डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान; फोटो: रुबुल डेका/ विकीमीडिया कॉमन्स 
पर्यावरण

रिसर्च के लिए मिली है डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान में ड्रिलिंग की मंजूरी, ऑयल इंडिया ने किया स्पष्ट

आयल इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि ड्रिलिंग से मिले परिणामों का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं होगा और इसका मकसद केवल वन्यजीवों और वनस्पति पर इंसानी गतिविधियों के प्रभाव का अध्ययन करना है

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • आयल इंडिया लिमिटेड ने एनजीटी में दायर अपने जवाब में कहा है कि डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान में प्रस्तावित ड्रिलिंग परियोजना का उद्देश्य व्यावसायिक तेल उत्पादन नहीं, बल्कि वन्यजीवों और वनस्पतियों पर मानवीय गतिविधियों के असर का अध्ययन करना है।

  • यह मामला 2020 में राष्ट्रीय उद्यान के भीतर सात स्थानों पर हाइड्रोकार्बन ड्रिलिंग और परीक्षण के लिए दी गई पर्यावरण मंजूरी को चुनौती देने वाली अपील से जुड़ा है।

  • कंपनी के अनुसार, ड्रिलिंग के लिए एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग तकनीक अपनाई जाएगी, जिसमें राष्ट्रीय उद्यान की सीमा के बाहर से करीब 3,950 मीटर गहराई तक क्षैतिज बोरिंग की जाएगी।

  • ऑयल इंडिया ने कहा कि यह मंजूरी पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दी थी। कंपनी का तर्क है कि इसकी वैधता को केवल सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

  • उसने यह भी कहा कि परियोजना की तकनीक, उपकरण और प्रक्रियाएं पहले जैसी ही हैं, केवल इतना बदलाव है कि ड्रिलिंग के नतीजों का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए नहीं होगा। कंपनी के मुताबिक, 2020 में मिली पर्यावरण मंजूरी अब भी प्रभावी है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान में हाइड्रोकार्बन ड्रिलिंग को लेकर चल रही सुनवाई के बीच आयल इंडिया लिमिटेड ने 11 मई 2026 को अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उसे केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में केवल अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) के उद्देश्य से ड्रिलिंग की अनुमति दी है।

मामला डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के भीतर सात स्थानों पर ड्रिलिंग और हाइड्रोकार्बन परीक्षण के लिए 11 मई 2020 को दी गई पर्यावरण मंजूरी (एनवायरमेंट क्लीयरेंस) से जुड़ा है। इस मंजूरी को चुनौती देते हुए एनजीटी में अपील दायर की गई थी, जिस पर अब कंपनी ने अपना पक्ष रखा है।

यह परियोजना असम में तिनसुकिया जिले के बागजान पेट्रोलियम माइनिंग लीज के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में स्थित है।

क्या है डिब्रू-सैखोवा में ड्रिलिंग की योजना

ऑयल इंडिया ने ट्रिब्यूनल को बताया कि वह एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग (ईआरडी) तकनीक का इस्तेमाल करना चाहती है। कंपनी की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके तहत ड्रिलिंग पैड राष्ट्रीय उद्यान की मुख्य सीमा से डेढ़ किलोमीटर से अधिक दूरी पर, राजस्व गांव क्षेत्र में बनाए जाएंगे।

ईआरडी तकनीक में जमीन के नीचे लंबवत और फिर क्षैतिज दिशा में बोरिंग की जाती है। इसके जरिए करीब 3,950 मीटर की गहराई में लक्ष्य क्षेत्र तक पहुंचकर हाइड्रोकार्बन की खोज और परीक्षण किया जाएगा। यह तकनीक इसलिए अपनाई जा रही है ताकि डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के संवेदनशील क्षेत्र के भीतर सीधे प्रवेश किए बिना भूमिगत संसाधनों तक पहुंचा जा सके।

एनजीटी में चुनौती और कानूनी पक्ष

कंपनी ने अपने जवाब में कहा कि यह मंजूरी पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के 7 सितंबर 2017 के आदेश के बाद दी थी। इसके लिए कंपनी को 25 जुलाई 2017 को दिए गए अपने आश्वासन की शर्तें पूरी करनी थी।

आयल इंडिया ने अपने जवाब में यह भी तर्क दिया कि चूंकि यह मंजूरी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और 'नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ' की सिफारिशों के आधार पर दी गई है, इसलिए इसकी वैधता को केवल सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है, एनजीटी में नहीं। इस आधार पर कंपनी ने अपील को 'अमान्य' बताया है।

ऑयल इंडिया ने यह भी कहा कि पर्यावरण मंत्रालय ने वन सलाहकार समिति की सिफारिशों के बाद यह मंजूरी इस उद्देश्य से दी कि एक्सटेंडेड रीच ड्रिलिंग (ईआरडी) तकनीक का पौधों और वन्यजीवों पर क्या असर पड़ता है, इसका अध्ययन किया जा सके। कंपनी के अनुसार, सरकार ने स्पष्ट किया था कि यह काम केवल शोध और विकास के लिए है, इसका कोई व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

वन्यजीवों पर असर का अध्ययन या तेल खोज?

कंपनी ने कहा है कि ईआरडी तकनीक से होने वाली ड्रिलिंग में चाहे उद्देश्य तेल-गैस की खोज हो या शोध, दोनों में मशीनरी, तकनीक और प्रक्रियाएं एक जैसी रहती हैं। इसलिए परियोजना की प्रकृति और दायरा नहीं बदलता। ऐसे में पर्यावरण मंत्रालय ने ईआरडी तकनीक से ड्रिलिंग के लिए जो सामान्य और विशेष शर्तें लगाई थीं, वो सभी अब भी लागू रहेंगी।

ऑयल इंडिया ने स्पष्ट किया कि इस परियोजना में एकमात्र बदलाव यह है कि समिति ने जो शर्त रखी है उसके अनुसार ड्रिलिंग से प्राप्त परिणामों का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्य के लिए नहीं किया जाएगा।

इसका उद्देश्य केवल यह समझना है कि मानवीय गतिविधियों का जंगल और वन्यजीवों पर क्या असर पड़ता है। कंपनी ने यह भी कहा कि 2020 में मिली पर्यावरण मंजूरी अब भी प्रभावी है और उसका वैधता बरकरार है। ऐसे में परिस्थितियों में कोई ऐसा बदलाव नहीं हुआ है, जिससे मंजूरी खत्म मानी जाए।