समुद्रों में जमा होता प्लास्टिक; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
पर्यावरण

'पाताल' तक पहुंचा माइक्रोप्लास्टिक, 2000 मीटर की गहराई में मौजूदगी के मिले सबूत

गहरे समुद्र में अध्ययन किए गए 92 फीसदी जीवों में माइक्रोप्लास्टिक्स की मौजूदगी के सबूत मिले हैं। चिंता की बात है कि हिंद महासागर के जीवों में इसकी मात्रा दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर की तुलना में 14.7 गुणा अधिक थी।

Lalit Maurya

  • समुद्र की अथाह गहराइयों को लंबे समय तक मानव गतिविधियों से अछूता माना जाता था, लेकिन नई रिसर्च ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है।

  • अध्ययन में पहली बार वैज्ञानिक प्रमाण मिले हैं कि माइक्रोप्लास्टिक समुद्र की सतह से 2,000 मीटर से अधिक गहराई तक पहुंच चुका है और वहां अध्ययन किए गए 92 फीसदी जीवों के शरीर में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है।

  • सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हिंद महासागर के जीवों में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर की तुलना में 14.7 गुना अधिक पाया गया, जो इस क्षेत्र में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण की गंभीरता को दर्शाता है।

  • हर साल समुद्र में पहुंचने वाले करीब 1.1 करोड़ टन प्लास्टिक के महीन कण अब उन पारिस्थितिकी तंत्रों तक भी पहुंच रहे हैं, जहां सूर्य की रोशनी तक नहीं पहुंचती। यह केवल समुद्री जैव विविधता के लिए खतरा नहीं है, बल्कि पूरी खाद्य श्रृंखला और अंततः मानव स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर चेतावनी है।

  • अध्ययन स्पष्ट करता है कि यदि प्लास्टिक कचरे पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो पृथ्वी के सबसे दुर्लभ और संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र भी इस प्रदूषण से सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।

कभी माना जाता था कि समुद्र की अथाह गहराई में मौजूद दुनिया इंसानी गतिविधियों से पूरी तरह सुरक्षित है। लेकिन अब यह भरोसा भी टूटता दिख रहा है।

एक नई रिसर्च में सामने आया है कि महासागरों में 2,000 मीटर से भी अधिक गहराई तक इंसानों का फैलाया प्लास्टिक पहुंच चुका है। वहां रहने वाले दुर्लभ समुद्री जीवों के शरीर में प्लास्टिक के महीन कणों की मौजूदगी से यह साफ हो चुका है कि धरती पर अब शायद ही कोई ऐसा कोना बचा है, जो इस प्रदूषण की गिरफ्त से अछूता बचा हो।

हर साल समुद्र में पहुंच रहा है 1.1 करोड़ टन प्लास्टिक

आपको जानकर हैरानी होगी कि हर साल दुनिया भर से करीब 1.1 करोड़ टन प्लास्टिक समुद्र में पहुंचता है। समय के साथ यही प्लास्टिक टूटकर बेहद छोटे-छोटे कणों में बदल जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है।

प्लास्टिक के यही महीन कण समुद्री धाराओं के साथ पूरी समुद्री दुनिया में फैल रहे हैं। चिंता की बात है कि ये कण न केवल समुद्री जीवों के लिए खतरा बन चुके हैं, बल्कि धीरे-धीरे हमारी आहार श्रृंखला तक भी पहुंच रहे हैं।

इस विषय पर किए नए अध्ययन में सामने आया है कि समुद्र में 2,000 मीटर से भी अधिक गहराई में स्थित हाइड्रोथर्मल वेंट्स (गर्म जल स्रोतों) के आसपास रहने वाले जीव भी माइक्रोप्लास्टिक की चपेट में आ चुके हैं। ये ऐसे स्थान हैं जहां सूर्य की रोशनी तक नहीं पहुंचती और जिन्हें पृथ्वी के सबसे अलग-थलग पारिस्थितिकी तंत्रों में गिना जाता है।

इस स्टडी में कोरिया रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ बायोसाइंस एंड बायोटेक्नोलॉजी और कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियन साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर के नॉर्थ फिजी बेसिन और हिंद महासागर के सेंट्रल इंडियन रिज में 2,000 मीटर से अधिक गहराई में रहने वाले समुद्री घोंघों (स्नेल) और मसल्स (सीप जैसे जीवों) का अध्ययन किया है।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल वाटर रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।

गहरे समुद्री के 92 फीसदी जीवों में मिला माइक्रोप्लास्टिक

अध्ययन में जांचे गए 92 फीसदी जीवों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक्स की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। प्रत्येक जीव में औसतन माइक्रोप्लास्टिक के औसतन 3.42 कण पाए गए।

इनमें सबसे अधिक मात्रा पॉलीस्टाइरीन की मिली, जिसका उपयोग पैकेजिंग सामग्री, डिस्पोजेबल कप और रोजमर्रा के कई सिंगल-यूज उत्पादों में किया जाता है।

खान-पान का तरीका तय करता है प्लास्टिक कहां जमा होगा

रिसर्च में इस बात का भी पता चला है कि जीवों के भोजन करने का तरीका यह तय करता है कि उनके शरीर में माइक्रोप्लास्टिक कहां जमा होगा। उदाहरण के लिए समुद्र तल पर मौजूद सूक्ष्मजीवों की परत को चरने वाले समुद्री घोंघों में माइक्रोप्लास्टिक मुख्य रूप से पाचन तंत्र में जमा मिला।

वहीं पानी को छानकर भोजन करने वाली मसल्स के शरीर के अलग-अलग ऊतकों में यह लगभग समान रूप से फैला हुआ था। इससे स्पष्ट होता है कि प्रत्येक प्रजाति की जैविक विशेषताएं माइक्रोप्लास्टिक के शरीर में प्रवेश और उसके जमा होने को प्रभावित करती हैं।

हिंद महासागर के जीवों में कहीं अधिक प्रदूषण

अध्ययन में सबसे चिंताजनक तथ्य यह सामने आया कि हिंद महासागर के जीवों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर की तुलना में करीब 15 गुणा अधिक थी।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इसकी बड़ी वजह हिंद महासागर के तटीय क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती मानवीय गतिविधियां और नदियों के जरिए समुद्र में भारी मात्रा में पहुंचने वाला प्लास्टिक कचरा है। यह कचरा धीरे-धीरे टूटकर बेहद छोटे कणों में बदल जाता है और समुद्री धाराओं के साथ हजारों किलोमीटर दूर गहरे समुद्र तक पहुंच जाता है।

अब गहरे समुद्र भी नहीं रहे सुरक्षित

वैज्ञानिकों का कहना है कि अध्ययन पहली बार वैज्ञानिक प्रमाण देता है कि समुद्र की सतह पर फैला प्लास्टिक हजारों मीटर नीचे तक पहुंचकर पृथ्वी के सबसे सुदूर और संवेदनशील समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों को भी प्रदूषित कर चुका है।

वैज्ञानिकों को भरोसा है कि यह अध्ययन भविष्य में गहरे समुद्र की निगरानी, समुद्री खनन परियोजनाओं के पर्यावरणीय आकलन और इन अनमोल पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण की रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

देखा जाए तो यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि प्लास्टिक का बढ़ता प्रदूषण अब केवल समुद्र तटों या सतह पर पसरा संकट नहीं रह गया है। इंसानी लापरवाही का असर समुद्र की उन गहराइयों तक पहुंच चुका है, जहां जीवन करोड़ों वर्षों से अपने अलग संसार में फलता-फूलता रहा है।

ऐसे में यदि प्लास्टिक कचरे पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में समुद्र की सबसे अनमोल और संवेदनशील पारिस्थितिक प्रणालियां भी इससे अछूती नहीं बच पाएंगी।