ऑक्सफैम की नई रिपोर्ट ने वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की एक तीखी और असहज तस्वीर सामने रखी है, जहां एक ओर दुनिया ऊर्जा संकट और महंगे बिजली बिलों से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर फॉसिल फ्यूल कंपनियों का मुनाफा तेजी से बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में दुनिया की छह सबसे बड़ी फॉसिल फ्यूल कंपनियां शेवरॉन, शेल, बीपी, कोनोकोफिलिप्स, एक्सॉन और टोटलएनर्जीज हर सेकंड करीब 2,967 डॉलर का मुनाफा कमा सकती हैं। यह कमाई ऊर्जा संकट के बीच रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है, जबकि दुनिया भर में करोड़ों लोग बढ़ते बिजली बिलों और ऊर्जा गरीबी से जूझ रहे हैं।
रिपोर्ट बताती है कि 2026 में इन कंपनियों का कुल मुनाफा करीब 8.9 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है, जो इतना बड़ा है कि इससे अफ्रीका के लगभग पांच करोड़ लोगों को सौर ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है।
सात देशों में किए गए सर्वे में अधिकांश लोगों ने अक्षय ऊर्जा में निवेश और बड़ी तेल कंपनियों पर अधिक टैक्स लगाने का समर्थन किया है। वहीं ऑक्सफैम का कहना है कि फॉसिल फ्यूल से होने वाला मुनाफा मुख्य रूप से सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों तक पहुंच रहा है, जिससे वैश्विक असमानता और बढ़ रही है।
रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि कुछ बड़ी कंपनियां स्वच्छ ऊर्जा निवेश से पीछे हट रही हैं, जिससे जलवायु संकट और गहरा हो सकता है। ऑक्सफैम ने सरकारों से अपील की है कि वे अमीर प्रदूषकों पर टैक्स लगाएं, सार्वजनिक जलवायु वित्त बढ़ाएं और ऊर्जा परिवर्तन को न्यायपूर्ण बनाएं, ताकि भविष्य में ऊर्जा सभी के लिए समान और सुलभ हो सके।
क्या यह हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना नहीं है कि एक तरफ जहां दुनिया के लाखों-करोड़ों परिवार बिजली बिलों को भरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ तेल-गैस कंपनियों का मुनाफा हर सेकंड नई ऊंचाइयों को छू रहा है।
इस बारे में अंतराष्ट्रीय संगठन ऑक्सफैम ने अपनी नई रिपोर्ट में खुलासा किया है कि ऊर्जा संकट के बीच 2026 में दुनिया की छह दिग्गज तेल-गैस कंपनियां हर सेकंड 2,967 डॉलर का लाभ कमाने की राह पर हैं। इन कंपनियों में शेवरॉन, शेल, बीपी, कोनोकोफिलिप्स, एक्सॉन और टोटलएनर्जीज शामिल हैं।
यह 2025 के मुकाबले इन कंपनियों के मुनाफे में हर दिन करीब 350 करोड़ रुपए (3.7 करोड़ डॉलर) की बढ़ोतरी को दर्शाता है।
प्रदूषण से बढ़ता मुनाफा
ऑक्सफैम का अनुमान है कि 2026 में इनका जीवाश्म ईंधन से होने वाला कुल मुनाफा 8.9 लाख करोड़ रुपए (9,400 करोड़ डॉलर) तक पहुंच जाएगा। यह रकम कितनी ज्यादा है इसी बात से समझा जा सकता है कि इसकी मदद से अफ्रीका में करीब पांच करोड़ लोगों की ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए सौर ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है।
देखा जाए तो यह महज एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस गहरी खाई का आईना है जो अमीर और गरीब के बीच दिन-ब-दिन और गहरी होती जा रही है।
तस्वीर तब और गंभीर हो जाती है जब दुनिया एक गहरे ऊर्जा संकट से गुजर रही है। ऑक्सफैम द्वारा सात देशों में कराए गए सर्वे में सामने आया कि तीन गुणा अधिक लोग चाहते हैं कि सरकारें जीवाश्म ईंधन का उत्पादन बढ़ाने के बजाय अक्षय ऊर्जा में निवेश करें।
वहीं करीब दो-तिहाई (68 फीसदी) लोगों का मानना है कि बड़ी तेल-गैस कंपनियों के मुनाफे पर अधिक टैक्स लगाया जाना चाहिए, ताकि इस पैसे की मदद से स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।
जनता बेबस, अमीरों की बढ़ती दौलत
विडंबना यह है कि आज दुनिया भर में परिवार 'ऊर्जा गरीबी' की खाई में धकेले जा रहे हैं। भू-राजनीतिक अस्थिरता, मध्य पूर्व में बढ़ती हिंसा के गंभीर असर, और अमीरों की तेजी से बढ़ती दौलत के बीच आम लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) से होने वाला मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा सीधे सबसे अमीर एक फीसदी लोगों की जेब में जा रहा है, जो ज्यादातर विकसित देशों में रहते हैं। ये लोग इन कंपनियों की वजह से हो रहे जलवायु संकट से भी फायदा कमा रहे हैं।
साथ ही अपनी दौलत और राजनीतिक पहुंच के दम पर दुनिया को अब भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
इस बारे में ऑक्सफैम की जलवायु नीति प्रमुख मारियाना पाओली का कहना है, “जीवाश्म ईंधन से दूर जाने की प्रक्रिया न्यायपूर्ण होनी चाहिए, ताकि गरीब देशों में लोगों को सहारा मिल सके। ये देश जलवायु आपदाओं का सबसे ज्यादा असर झेल रहे हैं, जबकि उनकी सरकारें शिक्षा और स्वास्थ्य से भी ज्यादा पैसा कर्ज चुकाने में खर्च करने को मजबूर हैं, जलवायु से निपटना तो दूर की बात है।“
उन्होंने जोर दिया कि, “स्वच्छ भविष्य में निवेश की इच्छा न रखने वाले सबसे अमीर प्रदूषकों पर कर लगाना ही न्यायपूर्ण बदलाव की बुनियाद है। सैंटा मार्टा में सरकारों को ‘प्रदूषण से चलने वाली राजनीति’ के दौर को खत्म करना चाहिए।“
गौरतलब है कि कोलंबिया के सैंटा मार्टा में इस सप्ताह जीवाश्म ईंधन से दूर जाने के मुद्दे पर पहला वैश्विक सम्मेलन हो रहा है।
स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में पीछे हट रही जीवाश्म ईंधन कंपनियां
वास्तविकता यह है कि कई बड़ी जीवाश्म ईंधन कंपनियां स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में पीछे हटती दिख रही हैं। साथ ही उनसे मुनाफा कमाने वाले सुपर-रिच लोग असमानता को और गहरा कर रहे हैं और जलवायु संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित लोगों से मुंह मोड़ रहे हैं।
अभी पिछले महीने ही एक्सॉनमोबिल ने स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में अपने तय निवेश में एक-तिहाई कटौती करने की घोषणा की है। इसी तरह टोटलएनर्जीज ने भी डेढ़ डिग्री के लक्ष्य के अनुरूप 'नेट-जीरो' योजना को अपनाने से इनकार कर दिया है।
ऐसे में सैंटा मार्टा में चल रहे वैश्विक सम्मेलन में ऑक्सफैम ने सरकारों से अपील की है कि वे सार्वजनिक जलवायु वित्त (क्लाइमेट फाइनेंस) को बढ़ाव दें। जीवाश्म ईंधन से मुनाफा कमाने वाली कंपनियों और अमीरों पर टैक्स लगाया जाए। साथ ही कर्ज में डूबे देशों को राहत दी जाए और ऊर्जा बदलाव को न्याय के सिद्धांतों पर आधारित बनाया जाए।
सरकारें और कंपनियां पर्यावरण को हुए नुकसान और लोगों की आजीविका पर पड़े असर की जिम्मेदारी लें, और प्रभावित समुदायों के अधिकार व भागीदारी सुनिश्चित करें। इसके साथ ही जीवाश्म ईंधन को खत्म करने के लिए ऐसा न्यायसंगत रोडमैप लागू किया जाए, जो अलग-अलग देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी, आर्थिक क्षमता और उन पर इसकी निर्भरता को ध्यान में रखे।
आखिरकार सवाल सिर्फ मुनाफे का नहीं है, असल सवाल यह है कि क्या दुनिया एक ऐसी ऊर्जा व्यवस्था बना पाएगी, जहां रोशनी हर घर तक पहुंचे, न कि सिर्फ कुछ कंपनियों के खजाने तक सीमित रह जाए।
अब समय आ गया है कि सरकारें और कंपनियां स्पष्ट फैसला लें कि वे इतिहास के किस पक्ष में खड़ी होंगी, कुछ चुनिंदा लोगों के मुनाफे और शक्ति के साथ, या पूरी मानवता और पृथ्वी के सुरक्षित, न्यायपूर्ण भविष्य के साथ।
1 डॉलर = 94.55 भारतीय रुपए