भारत की बढ़ती बिजली की भूख के बीच ऊर्जा क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदल रही है। 2024 की पहली छमाही से 2026 की पहली छमाही के बीच देश में बिजली की मांग करीब 7 फीसदी बढ़ी और करीब 63 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली की जरूरत पड़ी।
खास बात यह है कि यह पूरी अतिरिक्त जरूरत कोयले से नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा ने पूरी की। इसी अवधि में स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों से करीब 70 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली मिली, जिसमें अकेले सौर ऊर्जा का योगदान 44 टेरावाट-घंटे रहा।
पवन, जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा से क्रमशः 13, 8 और 7 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली मिली।
विश्लेषण के मुताबिक, 50 से अधिक वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है जब बिजली की मांग बढ़ने के बावजूद लगातार दो वर्षों में कोयला-आधारित बिजली उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई। यानी घरों में पंखे-कूलर और एसी चलाने से लेकर उद्योगों की बढ़ती जरूरत तक, बिजली की अतिरिक्त मांग का बोझ इस बार मुख्य रूप से सूरज, हवा और पानी ने संभाला।
लेकिन तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। इसी दौरान 8.5 गीगावाट नई कोयला बिजली क्षमता जुड़ी और जून 2026 तक करीब 43 गीगावाट क्षमता निर्माणाधीन थी। वहीं 2026 की पहली छमाही में भारत का कुल सीओ₂ उत्सर्जन सालाना आधार पर 3.7 फीसदी बढ़ा, मुख्य रूप से स्टील और सीमेंट जैसे उद्योगों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण।
इसका मतलब साफ है, भारत के बिजली क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा ने बड़ी जगह बनाई है, लेकिन देश की पूरी ऊर्जा व्यवस्था अभी कोयले से मुक्त नहीं हुई है। आगे ग्रिड, बैटरी भंडारण और उद्योगों को स्वच्छ बिजली से जोड़ना इस बदलाव की असली परीक्षा होगी।
भारत में बिजली की बढ़ती मांग के बीच एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। यह सही है कि देश में बिजली की जरूरत लगातार बढ़ी है, लेकिन पिछले दो वर्षों में इस अतिरिक्त मांग को स्वच्छ ऊर्जा ने पूरा कर दिया है। इसके साथ ही देश में कोयले से बनने वाली बिजली में वृद्धि नहीं हुई है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
अच्छी खबर यह है कि इस दौरान स्वच्छ ऊर्जा के तेजी से हो रहे विस्तार ने बिजली क्षेत्र से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) उत्सर्जन को भी करीब-करीब स्थिर बनाए रखा है। यह जानकारी सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) और कार्बन ब्रीफ द्वारा जारी विश्लेषण में सामने आई है।
हालांकि, स्पष्ट कर दें कि बिजली क्षेत्र से उत्सर्जन स्थिर रहने और तेल-गैस से उत्सर्जन घटने के बावजूद भारत का कुल सीओ₂ उत्सर्जन 2026 की पहली छमाही में साल-दर-साल 3.7 फीसदी बढ़ा है। इसकी बड़ी वजह स्टील, सीमेंट और दूसरे औद्योगिक क्षेत्रों से बढ़ता उत्सर्जन है।
विश्लेषण के मुताबिक, 2024 की पहली छमाही से 2026 की पहली छमाही के बीच भारत में बिजली की मांग 7 फीसदी बढ़ी। इस दौरान करीब 63 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली की जरूरत पड़ी, जोकि लगभग स्विट्जरलैंड की कुल बिजली की खपत के बराबर है। खास बात यह है कि इस पूरी अतिरिक्त मांग को स्वच्छ ऊर्जा ने पूरा कर दिया।
यह भारत के बिजली क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव है। विश्लेषण के मुताबिक, 50 से अधिक वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है, जब बिजली की मांग बढ़ने के बावजूद दो वर्षों में कोयला-आधारित बिजली उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई है।
स्वच्छ ऊर्जा से पूरी हुई बिजली की अतिरिक्त जरूरत
विश्लेषण दर्शाता है कि 2024 की पहली छमाही से 2026 की समान अवधि के बीच भारत में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई। इस दौरान स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों से करीब 70 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली मिली, जबकि बिजली की कुल मांग में 63 टेरावाट-घंटे की बढ़ोतरी दर्ज की गई। मतलब की बढ़ती मांग को स्वच्छ ऊर्जा ने पूरा कर दिया।
इसमें सौर ऊर्जा का योगदान सबसे ज्यादा रहा। इस दौरान सौर बिजली उत्पादन करीब 44 टेरावाट-घंटे बढ़ा। पवन ऊर्जा से 13 टेरावाट-घंटे, जलविद्युत से 8 टेरावाट-घंटे और परमाणु ऊर्जा से 7 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली मिली।
इन दो वर्षों में भारत ने करीब 77 गीगावाट नई सौर क्षमता, 11 गीगावाट पवन, 5 गीगावाट जलविद्युत और 0.6 गीगावाट परमाणु क्षमता जोड़ी है।
यानी जिस अतिरिक्त बिजली की जरूरत घरों, कारोबार और उद्योगों को पड़ी, उसका बोझ मुख्य रूप से नए कोयला संयंत्रों पर नहीं पड़ा। सूरज, हवा, पानी और परमाणु ऊर्जा ने मिलकर उस बढ़ती जरूरत को संभाल लिया।
वहीं 2026 में बिजली की मांग बढ़ने की एक वजह गर्मी भी रही। अल नीनो के प्रभाव से मानसून में देरी हुई और गर्मी की लहरें तेज हुईं, जिससे पंखों और कूलरों के साथ-साथ एयर कंडीशनर के इस्तेमाल से बिजली की मांग में बढ़ोतरी देखी गई।
कोयला क्षमता बढ़ी, लेकिन संयंत्र कम घंटे चले
दिलचस्प बात यह है कि कोयला आधारित बिजली उत्पादन स्थिर रहने के बावजूद इस अवधि में करीब 8.5 गीगावाट नई कोयला बिजली क्षमता जोड़ी गई। जून 2026 के अंत तक करीब 43 गीगावाट कोयला आधारित बिजली क्षमता निर्माणाधीन थी।
इसका मतलब है कि नई क्षमता जुड़ने के बावजूद मौजूदा और नए कोयला संयंत्रों को पहले की तुलना में कम घंटे चलाना पड़ा। इससे बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है, जिसका असर अंततः बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
विश्लेषण के मुताबिक, बिजली क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती हिस्सेदारी को बनाए रखने के लिए भारत को बिजली ग्रिड का विस्तार, ऊर्जा भंडारण और कोयला बिजली संयंत्रों में अधिक लचीलापन लाने की जरूरत होगी।
देखा जाए तो भारत में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ता बदलाव अब केवल नई सौर और पवन क्षमता जोड़ने का सवाल नहीं रह गया है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की नई रिपोर्ट ने भी चेताया है कि कोयला आधारित बिजलीघरों से जुड़े पुराने और लंबे बिजली खरीद समझौते (पीपीए) इस बदलाव की राह में आर्थिक बाधा बन सकते हैं।
आरटीआई के जरिए आठ राज्यों से जुटाई गई जानकारी के विश्लेषण से पता चला है कि सौर ऊर्जा बढ़ने के साथ दिन में कोयला बिजलीघरों का उपयोग घट रहा है, लेकिन लंबे पीपीए के तहत डिस्कॉम को तय भुगतान की जिम्मेदारी उठानी पड़ सकती है।
गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु में स्वच्छ ऊर्जा का बड़ा विस्तार
रुझान दर्शाते हैं कि देश के सभी राज्यों में बदलाव एक जैसा नहीं रहा। गुजरात में जीवाश्म ईंधन से बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी कमी देखी गई और वहीं स्वच्छ बिजली उत्पादन में सबसे बड़ी वृद्धि भी हुई। इसके बाद राजस्थान और तमिलनाडु में स्वच्छ बिजली उत्पादन तेजी से बढ़ा। इन राज्यों में जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन में भी कमी आई।
मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और पंजाब में जीवाश्म ईंधन से बिजली उत्पादन में कमी का एक कारण दूसरे राज्यों से बिजली का अधिक आयात रहा। वहीं कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में स्वच्छ बिजली उत्पादन बिजली की स्थानीय मांग से भी तेज बढ़ा।
महाराष्ट्र और तेलंगाना में बिजली की मांग में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई। दोनों राज्यों ने इस बढ़ती मांग को स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ी हुई आपूर्ति से लगभग पूरा किया।
तेल और गैस की खपत में भी लगातार कमी
बिजली के साथ तेल और गैस के क्षेत्र में भी एक अलग बदलाव देखने को मिल रहा है। 2026 की पहली छमाही में भारत की तेल खपत सालाना आधार पर 1.3 फीसदी घट गई। 2025 की इसी अवधि में यह कमी 0.7 फीसदी दर्ज की गई थी।
हालांकि दूसरी तरफ डीजल और पेट्रोल की खपत जरूर बढ़ी है। डीजल की मांग 4.1 फीसदी बढ़ी, जबकि पेट्रोल की खपत में 6.9 फीसदी की वृद्धि रिकॉर्ड की गई। रिपोर्ट के मुताबिक कृषि और माल ढुलाई में डीजल की बढ़ती जरूरत और दोपहिया तथा निजी वाहनों की बढ़ती आवाजाही इसका एक कारण रही।
लेकिन एलपीजी, पेटकोक और औद्योगिक कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोलियम उत्पादों की मांग घटने से तेल की कुल खपत में कमी आई है। इस दौरान एलपीजी की खपत 7 फीसदी घटी। वैश्विक एलपीजी बाजार में व्यवधान और कीमतों में बढ़ोतरी ने इस गिरावट में बड़ी भूमिका निभाई।
वहीं पेटकोक की खपत करीब 9.9 फीसदी कम हुई। सीमेंट उद्योग में पेटकोक की जगह कुछ हद तक कोयले का इस्तेमाल बढ़ा। तेल और गैस से होने वाला सीओ₂ उत्सर्जन सालाना आधार पर 7 फीसदी घटा, हालांकि परिवहन में पेट्रोल और डीजल की मांग बढ़ी है।
ईंधन की कमी ने बढ़ाई मुश्किल
विश्लेषण दर्शाता है कि हार्मुज संकट और वैश्विक ईंधन बाजार में आए व्यवधान का असर भारत के उद्योगों पर भी पड़ा। एलपीजी की कमी और महंगी होने के कारण कुछ औद्योगिक उपभोक्ता दोबारा कोयले और फर्नेस ऑयल जैसे ईंधनों की ओर लौटे।
गैस की कमी के दौरान मार्च और अप्रैल में कुछ जगह खाना पकाने के लिए भी कोयले के इस्तेमाल की भी खबरें सामने आईं। गौरतलब है कि सरकार ने संकट को देखते हुए होटल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र को सीमित अवधि के लिए कोयला, बायोमास और कुछ अन्य वैकल्पिक ईंधनों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी।
यह बदलाव बताता है कि ऊर्जा व्यवस्था में स्वच्छ विकल्पों की उपलब्धता बढ़ने के बावजूद जब आपूर्ति या कीमत का दबाव आता है, तो प्रदूषण फैलाने वाले पुराने ईंधनों की ओर लौटने का खतरा बना रहता है।
स्टील और सीमेंट ने बढ़ाया उत्सर्जन का बोझ
रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत के उत्सर्जन की सबसे बड़ी चिंता अब बिजली क्षेत्र के बाहर दिखाई दे रही है। 2026 की पहली छमाही में स्टील और सीमेंट उत्पादन क्रमशः 8 और 9 फीसदी बढ़ा। साथ ही इनके उत्सर्जन में करीब 8 फीसदी की वृद्धि हुई। दोनों क्षेत्रों का उत्सर्जन मिलकर भारत के कुल सीओ₂ उत्सर्जन का करीब 23 फीसदी हो गया।
रियल एस्टेट और निर्माण गतिविधियों में बढ़ोतरी से स्टील और सीमेंट की मांग में बढ़ोतरी दर्ज की गई। लेकिन कच्चे माल, खासकर आयातित कोकिंग कोयले और माल ढुलाई की बढ़ती लागत ने कंपनियों पर दबाव भी बनाए रखा।
यहीं भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती दिखाई देती है। बिजली क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उद्योगों में ऊर्जा की जरूरत अभी भी बड़े पैमाने पर कोयले और दूसरे जीवाश्म ईंधनों से पूरी होती है।
भारत की औद्योगिक ऊर्जा खपत में बिजली की हिस्सेदारी दुनिया के औसत से कम है। इसका अर्थ यह भी है कि उद्योगों को अधिक तेजी से बिजली आधारित बनाने की बड़ी गुंजाइश मौजूद है।
ऐसे में अगर उद्योगों में स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ता है, तो कोयले और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों की जगह बिजली ले सकती है और इससे औद्योगिक उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है।
स्वच्छ ऊर्जा के साथ कोयले में निवेश भी जारी
देखा जाए तो एक तरफ जहां स्वच्छ ऊर्जा बिजली की बढ़ती जरूरत पूरी कर रही है, दूसरी तरफ कोयला आधारित अर्थव्यवस्था में बड़े निवेश की योजनाएं जारी हैं। जून 2026 के अंत तक 43 गीगावाट कोयला बिजली क्षमता निर्माणाधीन थी। इसके अलावा कोयले से रसायन, उर्वरक और प्लास्टिक उद्योग के लिए कच्चा माल बनाने की योजनाएं भी आगे बढ़ रही हैं।
कोयले को गैसीफिकेशन के जरिए प्रोसेस करने की तकनीक भारत में अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई है, लेकिन सरकार ने अगले चार वर्षों में हर साल 10 करोड़ टन कोयला प्रोसेस करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। इसके साथ ही घरेलू कोकिंग कोयले का उत्पादन बढ़ाने और नई कोयला खदानों में निवेश की योजनाएं भी हैं। ऐसे निवेश आने वाले दशकों तक उद्योगों में कोयले के इस्तेमाल को बनाए रख सकते हैं।
आगे की राह में ग्रिड और बैटरी सबसे अहम
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन इनके साथ एक चुनौती भी है। सूरज हर समय नहीं चमकता और हवा भी लगातार एक जैसी नहीं चलती। इसलिए जब उत्पादन ज्यादा हो और मांग कम, तब अतिरिक्त बिजली को बचाकर रखने की जरूरत होती है। इसीलिए ऊर्जा भंडारण भारत की अगली बड़ी जरूरत बन रहा है।
राष्ट्रीय विद्युत योजना के अनुसार 2026-27 तक 82 गीगावाट-घंटे और 2031-32 तक 411 गीगावाट-घंटे ऊर्जा भंडारण क्षमता की जरूरत का अनुमान है। मई 2026 तक सरकार करीब 272 गीगावाट-घंटे भंडारण क्षमता के लिए निविदाएं जारी कर चुकी थी।
इसके साथ बिजली के ट्रांसमिशन नेटवर्क को भी मजबूत करना होगा। कुछ अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं को ग्रिड की क्षमता और कनेक्शन से जुड़ी दिक्कतों के कारण देरी का सामना करना पड़ा है।
बिजली क्षेत्र की सफलता, लेकिन पूरी तस्वीर अभी बाकी
अच्छी खबर यह है कि 2024 से 2026 के बीच भारत ने स्वच्छ ऊर्जा विस्तार का एक नया रिकॉर्ड बनाया है। बिजली की मांग बढ़ी, लेकिन कोयले से बिजली उत्पादन नहीं बढ़ा। तेल और गैस की खपत भी लगातार दो वर्षों से स्थिर या कम हुई है।
इस बदलाव से आयातित ईंधनों पर निर्भरता भी कम हुई। इस अवधि में बिजली उत्पादन के लिए आयातित कोयले की खपत करीब 38 फीसदी और गैस की खपत 35 फीसदी कम हुई। लेकिन भारत के कुल उत्सर्जन की कहानी अभी इतनी सरल नहीं है।
भले ही बिजली क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा ने उत्सर्जन को थाम लिया है, लेकिन उद्योगों में बढ़ता जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल इस उपलब्धि को कमजोर कर रहा है।
ऐसे में आगे भारत के लिए चुनौती सिर्फ ज्यादा सौर पैनल लगाने की नहीं होगी। उसे ऐसी बिजली व्यवस्था बनानी होगी जो सूरज और हवा से मिलने वाली बिजली को संभाल सके, ऊर्जा को जरूरत के समय तक बचाकर रख सके और उद्योगों तक स्वच्छ बिजली पहुंचा सके।
क्योंकि अगर घरों की बिजली साफ होती जाए, लेकिन कारखानों की ऊर्जा जरूरत कोयले से पूरी होती रहे, तो देश के कुल कार्बन उत्सर्जन को नीचे लाना मुश्किल होगा।
सच कहा जाए तो भारत की ऊर्जा कहानी अब सिर्फ यह नहीं है कि कितनी बिजली पैदा हो रही है। असल सवाल यह है कि वह बिजली कहां से आ रही है और उसके पीछे कितना कार्बन छिपा है।