फाइल फोटो: तरूण झा 
अर्थव्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुली नई राह: श्रम के सम्मान के बाद अब ‘साझा जिम्मेदारी’ की बारी

गृहिणियों के श्रम की न्यायिक मान्यता से आगे चुनौती यह कि घर चलाने की योजना, निर्णय और देखभाल की जिम्मेदारियां भी पुरुषों सहित परिवार के सभी सदस्यों के बीच समान रूप से बांटी जाएं

Snehlata Shukla

मार्च 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर घरेलू कामकाज और वैवाहिक रिश्तों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि विवाह कोई ऐसा अनुबंध नहीं है जिसमें पत्नी का दायित्व केवल खाना बनाना, सफाई करना और घर संभालना हो। अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश और दुनिया में घरेलू तथा देखभाल संबंधी कार्यों में महिलाओं की भूमिका को लेकर बहस लगातार गहरी हो रही है। 

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में घरेलू कामों को लेकर समाज में एक सकारात्मक बदलाव दिखाई देता है। आज पहले की तुलना में अधिक पुरुष रसोई में दिखाई देते हैं, बच्चों की देखभाल करते हैं, घर की सफाई करते हैं और घरेलू जिम्मेदारियों में हाथ बंटाते हैं। विज्ञापनों से लेकर सोशल मीडिया तक, ऐसे दृश्य अब सामान्य हो चुके हैं। लेकिन क्या यह बदलाव वास्तव में महिलाओं के बोझ को कम कर रहा है? या फिर हम घरेलू काम के केवल उस हिस्से को देख रहे हैं जो दिखाई देता है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि घरेलू काम केवल झाड़ू-पोंछा, खाना बनाना, बच्चों को स्कूल छोड़ना या बीमार की सेवा करना भर नहीं है। घर चलाना अपने आप में एक जटिल प्रबंधन प्रक्रिया है। परिवार में किसे और कब डॉक्टर के पास जाना है, किसको कौन-सी दवा और किस समय दी जानी है, बच्चे की परीक्षा कब है, राशन कब खत्म हो रहा है, गैस सिलेंडर कब बुक करना है, किस रिश्तेदार के यहां कौन-सा कार्यक्रम है, घर का मासिक बजट कैसे बनेगा। इन सभी बातों को याद रखना और समय पर पूरा करवाना भी एक काम है। लेकिन इस काम को न तो कभी काम माना गया और न ही इसकी कोई गणना की गई।

महिलाओं के घरेलू श्रम को लेकर बहस नई नहीं है। कुछ वर्ष पहले सर्वोच्च न्यायालय ने एक दुर्घटना मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि गृहिणियों के श्रम का मूल्य किसी भी प्रकार से उनके पति के काम से कम नहीं है। अदालत ने यह भी माना था कि घर संभालने वाली महिलाओं के काम का आर्थिक मूल्यांकन होना चाहिए। उस समय इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ था क्योंकि पहली बार घरेलू काम की आर्थिक हैसियत पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा शुरू हुई। 

इस बहस को हाल ही में 11 जून 2026 को सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण आदेश ने और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले घरेलू एवं देखभाल संबंधी कार्यों के आर्थिक मूल्य को स्वीकार करते हुए उनके श्रम का अनुमानित मूल्य 30 हजार रुपये प्रतिमाह माना तथा इसमें प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत की वृद्धि को भी उचित माना। यह आदेश केवल मुआवजा निर्धारण का आधार नहीं है, बल्कि इस बात की न्यायिक स्वीकृति भी है कि घर के भीतर किया जाने वाला श्रम आर्थिक और सामाजिक जीवन के संचालन में उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कोई औपचारिक रोजगार। न्यायालय की यह टिप्पणी घरेलू कार्यों को “स्वाभाविक कर्तव्य” के बजाय वास्तविक श्रम के रूप में देखने की आवश्यकता को और मजबूत करती है।

इसके पहले ऑक्सफैम सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं यह बता चुकी हैं कि दुनिया भर में महिलाएं हर साल खरबों डॉलर मूल्य का बिना वेतन वाला काम करती हैं। भारत में भी समय उपयोग सर्वेक्षण (टाइम यूज सर्वे) से पता चलता है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों में लगाती हैं। 

लेकिन इन सभी चर्चाओं में एक महत्वपूर्ण पक्ष अक्सर छूट जाता है। हम घरेलू काम के श्रम की बात तो करते हैं, लेकिन घरेलू काम के “प्रबंधन” की बात नहीं करते। मान लीजिए किसी परिवार में पति और पत्नी दोनों नौकरी करते हैं। पति रोज सुबह बच्चों को स्कूल छोड़ देते हैं और सप्ताहांत में खाना भी बना लेते हैं। देखने में यह जिम्मेदारियों का बराबर बंटवारा लगता है। लेकिन क्या उन्हें यह भी पता है कि बच्चे की अगली पैरेंट्स-टीचर मीटिंग कब है? क्या उन्हें याद है कि घर में दाल, तेल या दूध कब खत्म होने वाला है? क्या उन्हें यह याद रहता है कि बुजुर्ग माता-पिता की अगली स्वास्थ्य जांच कब करानी है?

अधिकांश मामलों में इन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ होता है। यानी घर का काम कुछ हद तक साझा हो रहा है, लेकिन घर की जिम्मेदारी अभी भी पूरी तरह साझा नहीं हुई है। वैश्विक स्तर पर इसे “मेंटल लोड” या मानसिक बोझ कहा जाता है। यह वह अदृश्य श्रम है जिसमें लगातार परिवार की जरूरतों के बारे में सोचना, योजना बनाना, याद रखना और समन्वय करना शामिल है। कई शोध बताते हैं कि भले ही पुरुषों की घरेलू कार्यों में भागीदारी बढ़ी हो, लेकिन यह मानसिक बोझ अभी भी मुख्य रूप से महिलाओं के कंधों पर ही बना हुआ है। यही वजह है कि बहुत-सी महिलाएं अक्सर यह महसूस करती हैं कि परिवार के बाकी सदस्य घर के काम में मदद तो करते हैं, लेकिन जिम्मेदारी नहीं लेते। 

घरेलू कामों में समानता की चर्चा को आगे बढ़ाने में नागरिक समाज संगठनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी दिशा में आजाद फाउंडेशन द्वारा शुरू किया गया “घर का काम सबका काम” अभियान उल्लेखनीय है। इस अभियान का उद्देश्य केवल पुरुषों को झाड़ू लगाने या खाना बनाने के लिए प्रेरित करना नहीं है, बल्कि घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों को महिलाओं की स्वाभाविक जिम्मेदारी मानने वाली सोच को चुनौती देना भी है। अभियान यह सवाल उठाता है कि यदि घर-परिवार सभी का है, तो उसकी जिम्मेदारियां भी सभी की क्यों नहीं होनी चाहिए? 

आज़ाद फाउंडेशन के अनुभव बताते हैं कि जब पुरुष घरेलू कामों में भागीदारी करने लगते हैं तो परिवारों के भीतर संवाद बढ़ता है, महिलाओं के पास अपने लिए समय निकलता है और बच्चों के सामने लैंगिक समानता का बेहतर उदाहरण स्थापित होता है। आज़ाद फाउंडेशन यह भी रेखांकित करता है कि वास्तविक परिवर्तन केवल शारीरिक श्रम के बंटवारे से नहीं आएगा। इसके लिए घरेलू जिम्मेदारियों की योजना और निर्णय प्रक्रिया में भी पुरुषों की समान भागीदारी आवश्यक है। 

दरअसल, हमारे समाज में घरेलू काम को लेकर भाषा भी एक समस्या है। आज भी हम कहते हैं कि “पति पत्नी की मदद कर देता है” या “बेटा मां की मदद करता है”। लेकिन मदद वही करता है जिसकी मूल जिम्मेदारी न हो। यदि घर को चलाना केवल महिला की जिम्मेदारी नहीं है, तो फिर पुरुषों की भागीदारी को मदद क्यों कहा जाए? यह साझेदारी है, और साझेदारी में बराबर जवाबदेही भी शामिल होती है। 

भारत जैसे देश में, जहां महिलाओं की श्रम शक्ति में भागीदारी की दर अभी भी चिंता का विषय है, वहां घरेलू काम और देखभाल कार्यों का असमान बंटवारा केवल लैंगिक समानता का नहीं बल्कि आर्थिक विकास का भी प्रश्न है। जब महिलाएं अपने दिन का बड़ा हिस्सा बिना वेतन वाले कामों में लगाती हैं, तो उनके लिए रोजगार, उद्यमिता, शिक्षा और नेतृत्व के अवसर सीमित हो जाते हैं। इसलिए घरेलू कामों में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाना केवल परिवार का निजी मामला नहीं है। यह सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक समानता का प्रश्न है। 

लेकिन इस बहस को अब अगले चरण में ले जाने की आवश्यकता है। सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि घर में खाना कौन बनाता है। सवाल यह भी होना चाहिए कि खाना बनाने की जिम्मेदारी कौन उठाता है। सवाल केवल यह नहीं कि बच्चे को डॉक्टर के पास कौन ले गया। सवाल यह भी कि डॉक्टर की अपॉइंटमेंट याद किसने रखी। सवाल केवल यह नहीं कि घर का सामान कौन खरीदकर लाया। सवाल यह भी कि उसकी जरूरत सबसे पहले किसने महसूस की। घरेलू कामों में बराबरी की असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है। 

मुमकिन है आने वाले वर्षों में घरेलू श्रम की आर्थिक कीमत तय करने पर और बहस हो, नीतियां बनें और नए कानूनी प्रावधान भी सामने आएं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गृहिणियों के श्रम का मासिक मूल्य 30 हजार रुपये तथा उस पर 10 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि को मान्यता देना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन केवल कीमत तय कर देना पर्याप्त नहीं होगा। क्योंकि अभी भी ऐसे बहुत से काम हैं जिनका मूल्यांकन आंकड़ों में नहीं किया जा सकता—परिवार की चिंता, देखभाल की जिम्मेदारी, हर समय सजग रहने का दबाव और वह मानसिक श्रम जो घर को घर बनाए रखता है। 

यही वह अदृश्य दुनिया है जिसे अब दिखाई देने की जरूरत है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने घरेलू श्रम को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम  बढ़ाया है, लेकिन समानता की वास्तविक मंजिल तब हासिल होगी जब श्रम के साथ-साथ जिम्मेदारियां भी साझा होंगी। शायद घरेलू कामों में बराबरी की अगली लड़ाई यहीं से शुरू होती है।