कुछ तस्वीरें जीवन भर आपके साथ रहती हैं। ऐसी ही मेरी एक याद कई दशक पुरानी है, जो राजस्थान के एक गांव से जुड़ी है। मुझे याद है, मैं उस दिन बहुत तड़के उठ गई थी, उस समय बस्ती पर अब भी धुंध छाई हुई थी। मैं पास की एक डेयरी तक पैदल गई, जिसे मैं पश्चिमी फिल्मों जैसी जगह समझ रही थी, जहां गायों और भैंसों की कतारें हों और उनका हाथ से दूध निकाला जा रहा हो (यह ऑटोमैटिक मिल्किंग मशीनों से पहले का समय था)।
लेकिन वहां पहुंचकर एक बिल्कुल साधारण-सी इमारत मिली। अंदर पारंपरिक शॉल में लिपटी महिलाएं कतार में खड़ी थीं। वे बारी-बारी से अपने बर्तन एक छोटे तराजू पर रखतीं, एक छपी हुई पर्ची लेतीं और फिर दूध को एक बड़े कंटेनर में उंडेल देतीं।
उनमें से कोई भी पढ़ना-लिखना नहीं जानती थीं। फिर भी उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझे बताया कि उस पर्ची में न केवल दिए गए दूध की मात्रा दर्ज होती है, बल्कि उसकी वसा (फैट) की मात्रा भी लिखी होती है, जिसके आधार पर उन्हें भुगतान मिलता है।
दूध से भरे बर्तनों को तेजी से छोटे वाहनों में लाद दिया जाता, जो गांव-गांव घूमकर दूध इकट्ठा करते और फिर उसे जिला या राज्य स्तर की डेयरियों तक पहुंचाते। यही था मशहूर अमूल मॉडल, जिसे अब पूरे भारत में अपनाया जा चुका है।
चाहे किसी डेयरी के पास कई गायें हों या किसी घर में एक-दो पशु ही क्यों न हों, सभी इस सहकारी व्यवस्था का हिस्सा बन सकते थे।
आज वह दृश्य और भी प्रासंगिक लगता है, जब दुनिया प्रतिद्वंद्विता से आकार लेती एक नई आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जो वैश्वीकरण की कब्रों पर खड़ी होती दिखाई देती है। जैसा कि मैंने अपने पिछले कॉलम में लिखा था, इस उभरते दौर में हर देश को अपने घरेलू संसाधनों और आर्थिक ताकत के आधार पर अपना भविष्य सुरक्षित करना होगा।
इसलिए अब समय है कि हम भी गंभीरता से विचार करें कि हमारे विकास का सबसे उपयुक्त रास्ता क्या हो सकता है और क्यों वह पुराने समृद्ध देशों के रास्ते से अलग होना चाहिए, जो आज अपनी आर्थिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए जूझ रहे हैं।
आइए, डेयरी क्षेत्र की ही बात करते हैं। इस क्षेत्र में पश्चिमी मॉडल भी बाकी अर्थव्यवस्था की तरह ही है। यह बड़े पैमाने पर उत्पादन, औद्योगिक ढांचे, भारी मशीनीकरण और बाहरी संसाधनों के व्यापक उपयोग पर आधारित है। इसकी तर्कशक्ति सीधी और आकर्षक है: जितना बड़ा उत्पादन, उतनी अधिक बिक्री और उतना ही ज्यादा मुनाफा।
लेकिन ये फायदे एक कीमत के साथ आए। कीटनाशकों और एंटीबायोटिक जैसे बाहरी संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता ने पर्यावरण प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं पैदा कीं। इसके बाद नियम-कानून कड़े किए गए, जिससे लागत और बढ़ गई।
दूध को सस्ता बनाए रखने के लिए सरकारों को सब्सिडी देनी पड़ी। लेकिन समस्या और गहरी हो गई, क्योंकि अब दूध की आपूर्ति मांग से ज्यादा हो चुकी है। ऐसे में उत्पादकों को नए बाजार तलाशने पड़ रहे हैं।
नतीजा यह है कि आज विवाद इस बात पर है कि कौन-सा देश इस कृत्रिम रूप से सस्ते किए गए उत्पाद के लिए अपना बाजार खोलेगा और ऐसे आयात का घरेलू उत्पादन व किसानों पर क्या असर पड़ेगा।
यूरोपीय किसान कहते हैं कि यूरोपीय संघ व मर्कोसुर के बीच हुआ व्यापार समझौता उन्हें कारोबार से बाहर कर देगा, क्योंकि लैटिन अमेरिकी किसानों ने गहन औद्योगिक खेती में महारत हासिल कर ली है।
भारत में भी यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ हालिया व्यापार समझौतों में कृषि और डेयरी सबसे विवादास्पद मुद्दे रहे हैं और यह चिंता वाजिब है। इसीलिए यह समझना जरूरी है कि भारत का डेयरी मॉडल किस तरह अलग है, क्यों यह हमारी आर्थिक सुरक्षा के लिए अहम है और कैसे यह हमारे अलग तरीके से गढ़े जाने वाले भविष्य का हिस्सा बन सकता है।
आज भारत दुनिया के कुल दूध उत्पादन का लगभग एक-चौथाई उत्पादन करता है और इस तरह वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा उत्पादक है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, पिछले एक दशक में भारत का पशुपालन क्षेत्र 7 प्रतिशत की दर से बढ़ा है, जो मत्स्य और जलीय कृषि के बाद दूसरे स्थान पर है।
यह उत्पादन कुछ बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों से नहीं आता, बल्कि डेयरी से जुड़े लाखों परिवारों से आता है। ठीक वैसे ही जैसे राजस्थान के उस गांव की महिलाएं। इस वृद्धि की खास बात यह है कि यह सीधे लोगों के हाथ में आय पहुंचाती है, जिससे वे अपने जीवन स्तर में निवेश कर सकें और बढ़े हुए दूध के उपभोक्ता भी बन सकें।
इस आर्थिक मॉडल के दो और महत्वपूर्ण पहलू हैं। पहला, इसका मकसद लागत को कम रखना है, ताकि उपभोक्ताओं को सस्ता भोजन मिले और किसानों के हाथ में अधिक पैसा बचे। यह बात इस मॉडल में आंशिक रूप से पहले से ही शामिल है।
घर के स्तर पर, पिछवाड़े की डेयरी (बैकयार्ड डेयरी) में उत्पादन होने से श्रम लागत कम रहती है, लेकिन इसके अलावा भी बहुत कुछ किया जा सकता है। आज दुनिया खुले चरागाहों में पाले जाने वाले पशुओं (फ्री-रेंज) के महत्व को पहचान रही है। भारतीय किसान परंपरागत रूप से सिल्वो-एग्रो-पास्चरल प्रणाली अपनाते हैं, जिसमें भूमि प्रबंधन के जरिए प्राकृतिक चारा उपलब्ध होता है और गोबर का उपयोग मिट्टी को उर्वर बनाने में किया जाता है, जिससे उत्पादकता बढ़ती है। हमें इसी पद्धति को और मजबूत करने की जरूरत है।
दूसरा अहम पहलू है बाहरी संसाधनों का सीमित उपयोग। औद्योगिक डेयरी प्रणालियों में बीमारी प्रबंधन एक बड़ी लागत होती है, क्योंकि वहां पशुओं की घनत्व ज्यादा होता है और एंटीबायोटिक का नियमित इस्तेमाल किया जाता है। इसके विपरीत, भारतीय किसान अपने पारंपरिक पशुपालन तरीकों और देखभाल की पद्धतियों से बीमारियों की रोकथाम करते हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड भी पारंपरिक घरेलू उपायों को बढ़ावा देकर एंटीबायोटिक के कम उपयोग को सुनिश्चित करता है।
ऐसी पद्धतियों को बड़े स्तर पर अपनाने से किसानों के हाथ में ज्यादा पैसा रहेगा और उपभोक्ताओं को सस्ता भोजन मिल सकेगा।
अगर उत्पादन मुख्य रूप से निर्यात के लिए होगा, तो यह मॉडल काम नहीं करेगा। इसके लिए घरेलू खपत पर आधारित व्यवस्था जरूरी है। आज हमारे यहां स्थानीय बाजार सक्रिय हैं और दूध की खपत बढ़ रही है। स्थानीय उत्पादन से आय का वितरण इन्हीं बाजारों को मजबूत बनाता है। लेकिन यह “दूध” बाजार भी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। पैकेट वाले और ज्यादा प्रोसेस किए गए खाद्य पदार्थ, जैसे सॉफ्ट ड्रिंक और बिना असली फल वाले जूस, इसकी जगह ले रहे हैं।
हमें इस मॉडल को अपनाना और मजबूत करना होगा, ताकि लाखों लोगों की उद्यमशीलता के जरिए सबसे गरीब लोगों के हाथ में ज्यादा आय पहुंच सके।