अर्थव्यवस्था

मंदी की मार और महंगाई के दबाव से कैसे बचेगी अर्थव्यवस्था? राह दिखाने वाले दो अर्थशास्त्रियों को नोबेल

रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड ने ऐसे आर्थिक मॉडल विकसित करने में योगदान दिया है, जो मंदी और महंगाई के दौर में सही समय पर नीतिगत फैसले लेने का आधार देते हैं।

Lalit Maurya

  • महंगाई की मार और मंदी का संकट केवल अर्थव्यवस्था के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, परिवारों के बजट, रोजगार और कारोबार पर पड़ता है। ऐसे में सरकारों और केंद्रीय बैंकों के लिए यह समझना जरूरी है कि आर्थिक संकट के समय कौन-से फैसले राहत दे सकते हैं और उनका असर कितनी जल्दी दिखाई देगा।

  • इसी चुनौती को समझने और आर्थिक नीतियों को मजबूत आधार देने में अहम योगदान के लिए अमेरिकी अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड को 2026 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

  • दोनों अर्थशास्त्रियों के काम ने ऐसे आर्थिक मॉडल विकसित करने की दिशा में योगदान दिया, जो यह समझने में मदद करते हैं कि परिवारों और कंपनियों के फैसले, भविष्य को लेकर उनकी उम्मीदें और सरकार की नीतियां मिलकर पूरी अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करती हैं।

  • 1970 के दशक के तेल संकट के दौरान धीमी आर्थिक वृद्धि और बढ़ती महंगाई ने पुराने आर्थिक मॉडलों की सीमाएं उजागर की थीं। इसके बाद आर्थिक उतार-चढ़ाव को बेहतर ढंग से समझने की जरूरत और बढ़ गई।

  • हॉल और वुडफोर्ड के शोध का महत्व इस बात में है कि यह नीतिगत फैसलों को लोगों के वास्तविक व्यवहार और उनकी भविष्य संबंधी उम्मीदों से जोड़ता है।

  • इससे मंदी के दौरान मांग और रोजगार को सहारा देने तथा महंगाई बढ़ने पर उचित कदम उठाने की रणनीतियां बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, ये मॉडल संकट खत्म करने की गारंटी नहीं देते, लेकिन उनके संभावित असर को समझने और समय पर बेहतर फैसले लेने का आधार जरूर प्रदान करते हैं।

आर्थिक संकट का असर केवल बाजार के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। जब महंगाई बढ़ती है, तो परिवारों का बजट बिगड़ता है। जब मंदी आती है, तो कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ती है, नई नौकरियों के अवसर घटते हैं और कई लोगों के सामने रोजगार खोने की चुनौती खड़ी हो जाती है।

ऐसे में सरकारों और केंद्रीय बैंकों के लिए यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि अर्थव्यवस्था को कब और कैसे सहारा दिया जाए।

इसी चुनौती से निपटने के लिए अर्थव्यवस्था को समझने और उसे स्थिर रखने की दिशा में अहम योगदान देने वाले दो अमेरिकी अर्थशास्त्रियों को 2026 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई है। रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड को यह सम्मान ‘व्यापक अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने की नीतियों के सूक्ष्म आर्थिक आधार’ पर उनके काम के लिए दिया गया है।

स्वीडन की रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने 12 अक्टूबर 2026 को पुरस्कार विजेताओं के नाम की औपचारिक घोषणा कर दी है। गौरतलब है कि हॉल कैलिफोर्निया स्थित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं, जबकि वुडफोर्ड न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं।

पुरस्कार समिति के मुताबिक, दोनों अर्थशास्त्रियों ने ऐसे नए आर्थिक मॉडल विकसित करने में योगदान दिया, जिनसे सरकारों और केंद्रीय बैंकों की आर्थिक उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता बेहतर हुई। इन मॉडलों के आधार पर सही समय पर लिए गए राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों से जुड़े फैसले मंदी और तेज आर्थिक उछाल के असर को कम करने में मदद कर सकते हैं।

लोगों के फैसलों से कैसे बदलती है पूरी अर्थव्यवस्था?

अर्थव्यवस्था को समझने के लिए केवल महंगाई, उत्पादन, बेरोजगारी और आर्थिक विकास के आंकड़ों को देखना पर्याप्त नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि इन आंकड़ों के पीछे लोगों और कंपनियों के कौन-से फैसले काम कर रहे हैं।

इसे एक आसान उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर किसी परिवार को लगता है कि आने वाले महीनों में उसकी आमदनी घट सकती है, तो वह आज से ही खर्च कम करना शुरू कर सकता है। जब बहुत से परिवार ऐसा करते हैं, तो बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की मांग घट सकती है। इसका असर कंपनियों के उत्पादन, निवेश और रोजगार पर पड़ सकता है।

इसी तरह, अगर कंपनियों को आशंका है कि आने वाले समय में कच्चे माल, ऊर्जा या दूसरी चीजों की लागत बढ़ेगी, तो वे अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाने का फैसला कर सकती हैं। इससे महंगाई पर असर पड़ सकता है।

रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड के काम का महत्व इसी बात में है कि यह अर्थव्यवस्था की बड़ी तस्वीर को समझने के लिए परिवारों और कंपनियों के फैसलों को आधार बनाता है। अर्थशास्त्र में इस दृष्टिकोण को ‘माइक्रोइकोनॉमिक फाउंडेशन’ यानी सूक्ष्म आर्थिक आधार कहा जाता है।

1970 के दशक के तेल संकट ने क्यों उठाए पुराने आर्थिक मॉडलों पर सवाल?

करीब एक सदी पहले अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने आर्थिक मंदी से निपटने में सरकारी खर्च और मांग की भूमिका पर जोर दिया था। कीन्स के विचारों से प्रभावित आर्थिक मॉडलों ने लंबे समय तक सरकारों को यह समझने में मदद की कि मंदी के दौरान अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।

आमतौर पर मंदी के समय सरकारें खर्च बढ़ाकर और केंद्रीय बैंक ब्याज दरें घटाकर आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की कोशिश करते हैं। इसके उलट, जब अर्थव्यवस्था में मांग बहुत तेजी से बढ़ती है और महंगाई का दबाव बढ़ता है, तो खर्च और कर्ज की रफ्तार धीमी करने वाले कदम उठाए जा सकते हैं।

लेकिन 1970 के दशक के तेल संकट ने पुराने आर्थिक मॉडलों की सीमाएं उजागर कर दीं। पश्चिमी देशों में आर्थिक विकास धीमा पड़ गया, बेरोजगारी बढ़ी और महंगाई भी ऊंचे स्तर पर बनी रही। यानी अर्थव्यवस्था एक ऐसी स्थिति में पहुंच गई, जहां धीमी वृद्धि और बढ़ती कीमतें एक साथ लोगों को परेशान कर रही थीं।

इन हालात ने सवाल खड़ा किया कि जब अर्थव्यवस्था में कई समस्याएं एक साथ पैदा हों, तो नीतियां किस आधार पर बनाई जाएं। केवल महंगाई, उत्पादन और बेरोजगारी जैसे बड़े आर्थिक आंकड़ों के बीच पुराने संबंधों पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं था।

हॉल और वुडफोर्ड के काम ने अर्थव्यवस्था को समझने के लिए नए सैद्धांतिक आधार विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे आर्थिक नीतियों को इस बात से जोड़कर देखने का रास्ता मजबूत हुआ कि परिवार और कंपनियां आज के फैसले लेते समय भविष्य की परिस्थितियों को किस तरह ध्यान में रखती हैं।

भविष्य की उम्मीदें भी तय करती हैं आर्थिक नीतियों का असर

हॉल और वुडफोर्ड के शोध से जुड़ा एक अहम विचार यह है कि लोग और कंपनियां केवल आज की परिस्थितियों को देखकर फैसले नहीं लेते। वे आने वाले समय की संभावनाओं और सरकार की नीतियों को लेकर अपनी उम्मीदों के आधार पर भी निर्णय करते हैं।

मसलन, अगर केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बदलाव करने की योजना बताता है, तो लोग और कारोबारी उस जानकारी के आधार पर अपने खर्च, बचत और निवेश की योजनाएं बदल सकते हैं। इसी तरह, सरकार की भविष्य की आर्थिक नीतियों के बारे में स्पष्ट जानकारी भी बाजार के फैसलों को प्रभावित कर सकती है।

माइकल वुडफोर्ड ने इस बात पर जोर दिया है कि आर्थिक नीति केवल ब्याज दरों जैसे साधनों को बदलकर अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का मामला नहीं है। सरकारों और केंद्रीय बैंकों को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वे क्या कर रहे हैं और आगे किस तरह की नीति अपना सकते हैं।

इस दृष्टिकोण को केंद्रीय बैंकों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण माना जाता है। जब लोग और कंपनियां नीति निर्माताओं की योजनाओं को समझ पाते हैं, तो उनके फैसलों पर उसका असर पड़ सकता है। इससे आर्थिक गतिविधियों को स्थिर रखने की कोशिशों को मदद मिल सकती है।

मंदी और महंगाई से निपटने में कैसे मदद करते हैं ये मॉडल?

अर्थव्यवस्था में मंदी आने पर सरकार और केंद्रीय बैंक अलग-अलग उपायों पर विचार करते हैं। सरकार सार्वजनिक खर्च बढ़ाकर मांग और रोजगार को सहारा दे सकती है। केंद्रीय बैंक ब्याज दरें घटाकर कर्ज लेना सस्ता करने की कोशिश कर सकता है। इससे परिवारों के खर्च और कंपनियों के निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है।

इसके उलट, जब महंगाई बहुत बढ़ जाती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाकर कर्ज और खर्च की रफ्तार कम करने की कोशिश कर सकता है। सरकार भी अपनी राजकोषीय नीतियों में बदलाव कर सकती है।

लेकिन इन कदमों का असर तत्काल नहीं दिखता। यदि कोई फैसला बहुत देर से लिया जाए या अर्थव्यवस्था की परिस्थितियों को ठीक से समझे बिना लिया जाए, तो समस्या और बढ़ सकती है। ब्याज दरों में बदलाव का असर लोगों के खर्च, कंपनियों के निवेश और कीमतों पर धीरे-धीरे पड़ सकता है।

हॉल और वुडफोर्ड के काम ने ऐसे आर्थिक मॉडलों के विकास में योगदान दिया, जो इन जटिल संबंधों को समझने और नीतिगत फैसलों के संभावित परिणामों का आकलन करने में मदद करते हैं।

पुरस्कार समिति के अध्यक्ष जॉन हासलर के मुताबिक, दोनों अर्थशास्त्रियों के काम ने उन मॉडलों को मजबूत सैद्धांतिक आधार दिया है, जिनका इस्तेमाल आज दुनिया भर की सरकारें और केंद्रीय बैंक करते हैं। इससे ऊर्जा संकट या परिवारों के खर्च में अचानक बदलाव जैसे आर्थिक झटकों से निपटने की तैयारी बेहतर हो सकती है।

हालांकि, ऐसे मॉडल किसी भी संकट को पूरी तरह खत्म करने की गारंटी नहीं देते। उनकी उपयोगिता यह समझने में है कि अलग-अलग परिस्थितियों में कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं और उनके क्या संभावित परिणाम हो सकते हैं।

आर्थिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार का इतिहास

अर्थशास्त्र के इस पुरस्कार का आधिकारिक नाम ‘अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में आर्थिक विज्ञान में स्वेरिजेस रिक्सबैंक पुरस्कार’ है। इसकी स्थापना स्वीडन के केंद्रीय बैंक ने 1968 में की थी और पहली बार यह पुरस्कार 1969 में दिया गया।

हालांकि यह अल्फ्रेड नोबेल की मूल वसीयत में शामिल पांच पुरस्कारों में से एक नहीं है। मूल पुरस्कार भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और शांति के क्षेत्रों में दिए जाते हैं। इसके बावजूद अर्थशास्त्र का यह पुरस्कार भी दुनिया के प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है।

इस वर्ष पुरस्कार की राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर है। दोनों विजेताओं को यह राशि साझा रूप से दी जाएगी।

देखा जाए तो रॉबर्ट ई हॉल और माइकल वुडफोर्ड को मिला यह सम्मान याद दिलाता है कि अर्थव्यवस्था केवल बाजारों और आंकड़ों का खेल नहीं है। इसके केंद्र में वे परिवार हैं जो अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाते हैं, वे कारोबारी हैं जो भविष्य की अनिश्चितताओं के बीच फैसले लेते हैं और वे नीतियां हैं जिनका असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है।

इन संबंधों को बेहतर ढंग से समझना ही आर्थिक संकट के समय अधिक जिम्मेदार और प्रभावी फैसले लेने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।