तंजावुर में प्रसिद्द बृहदेश्वर मंदिर की दीवारों पर खुदी हुई प्राचीन तमिल भाषा की लिखावट; फोटो: आईस्टॉक 
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75,000 से 7,500 भाषाओं पर सिमटी दुनिया: जानिए कैसे दफन हो गई 90 फीसदी भाषाएं

जब कोई भाषा मरती है, तो सिर्फ शब्दों का अंत नहीं होता; उसके साथ मूक हो जाता है सदियों पुराना ज्ञान, लोरी गाती मां की ममता, लोककथाओं की मिठास और उस माटी का इतिहास जो कभी इन बोलियों में रचा बसा था।

Lalit Maurya

  • कभी दुनिया में 30,000 से 75,000 भाषाओं की अनगिनत आवाजों से गूंजती थी। लेकिन आज यह संख्या सिमटकर करीब 7,500 रह गई है।

  • प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल साइंस में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने खुलासा किया है कि मानव इतिहास की करीब 90 प्रतिशत भाषाएं समय की धूल में खो चुकी हैं।

  • स्पेन, अमेरिका और जर्मनी के वैज्ञानिकों ने पिछले 12,000 वर्षों के भाषाई इतिहास का गणितीय मॉडल तैयार कर दिखाया कि भाषाओं का सबसे बड़ा स्वर्णिम दौर ईसा पूर्व पहली शताब्दी से पहली शताब्दी ईस्वी के बीच था।

  • अध्ययन यह भी बताता है कि भाषाओं का पतन केवल यूरोपीय उपनिवेशवाद से नहीं, बल्कि उससे सदियों पहले बड़े राज्यों, साम्राज्यों और सत्ता के विस्तार के साथ शुरू हो गया था।

  • देखा जाए तो हर विलुप्त भाषा के साथ केवल शब्द नहीं मिटते, बल्कि लोककथाएं, पारंपरिक ज्ञान, प्रकृति की समझ, सांस्कृतिक स्मृतियां और पीढ़ियों की विरासत भी हमेशा के लिए खो जाती है।

  • भारत जैसे भाषाई विविधता वाले देश के लिए यह अध्ययन गंभीर चेतावनी है कि यदि मातृभाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को नहीं बचाया गया, तो मानव सभ्यता की बची-खुची सांस्कृतिक धरोहर भी इतिहास के सन्नाटे में खो सकती है।

भाषाएं केवल संवाद या विचारों को प्रकट करने का माध्यम मात्र नहीं हैं, वे हमारी संस्कृति का ह्रदय हैं, जो अपने भीतर सभ्यता की यादें, संस्कृति, परंपराएं, जीवन-दर्शन और पीढ़ियों से पुरखों द्वारा संजोए ज्ञान और संवेदनाओं को समेटे रहती हैं।

हर भाषा-बोली में अपने लोगों का इतिहास, प्रकृति की समझ, जीवन जीने का अनुभव और पूर्वजों की विरासत बसती है। ऐसे में जब दुनिया के किसी कोने में कोई भाषा दम तोड़ती है, तो केवल कुछ शब्द नहीं खोते, बल्कि पूरी मानव जाति अपनी चेतना का एक अनमोल हिस्सा हमेशा के लिए खो देती है।

दुर्भाग्य से आज दुनिया की यही अमूल्य भाषाई धरोहर लगातार हमारी आंखों के सामने सिमटती जा रही है और हम एक मूक दर्शक बने खड़े हैं।

रिसर्च से पता चला है कि मानव सभ्यता में एक ऐसा दौर भी आया था, जब धरती पर भाषाओं-बोलियों का एक अनदेखा, अकल्पनीय मेला सजा करता था। एक ऐसा स्वर्णिम युग, जहां हजारों-लाखों आवाजें अपने-अपने अनूठे अंदाज में जिंदगी के तराने गाती थीं।

प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल 'साइंस' में प्रकाशित एक स्टडी ने मानव इतिहास के इसी बेहद खूबसूरत और दर्दभरे पहलू से पर्दा उठाया है। स्पेन, अमेरिका और जर्मनी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में पिछले 12,000 वर्षों के भाषाई इतिहास को दोबारा गढ़ा गया है।

इसके सतह ही वैज्ञानिकों ने भाषाई विविधता का गणितीय मॉडल तैयार कर मानव इतिहास की उस तस्वीर को सामने लाने की कोशिश की है, जिसके बारे में करीब-करीब लिखित प्रमाण तक मौजूद नहीं हैं।

भाषाओं का स्वर्णिम युग: जब गूंजती थीं हजारों आवाजें

आज दुनिया में करीब 7,500 भाषाएं बोली और सांकेतिक रूप से इस्तेमाल की जाती हैं। पहली नजर में यह आंकड़ा बहुत बड़ा लगता है, लेकिन वैज्ञानिक मॉडल्स बताते हैं कि यह आज से एक से तीन हजार साल पहले मौजूद भाषाई विविधता का महज एक छोटा सा हिस्सा है।

अध्ययन के अनुसार, करीब 12,000 साल पहले, जब मानव समाज मुख्य रूप से शिकारी और खाद्य-संग्रहकर्ता समुदायों में बंटा था, तब दुनिया में करीब 4,500 से 6,200 भाषाएं बोली जाती थीं। यानी उस समय भाषाओं की संख्या आज की तुलना में भी कम थी।

इसके बाद कृषि, स्थाई बस्तियों और बढ़ती आबादी के साथ नई-नई सामाजिक इकाइयां बनीं, जिससे हजारों वर्षों तक नई भाषाओं का जन्म होता रहा और भाषाई विविधता लगातार बढ़ती गई।

वैज्ञानिकों के मुताबिक ईसा पूर्व पहली शताब्दी से पहली शताब्दी ईस्वी के बीच हमारी धरती भाषाओं के सबसे बड़े 'स्वर्णिम युग' की गवाह बनी थी, जब दुनिया भर में 30 से 75 हजार तक भाषाएं जीवंत थीं।

येल विश्वविद्यालय की भाषाविद् प्रोफेसर क्लेयर बोवर्न के अनुसार, यह निष्कर्ष बेहद अप्रत्याशित है। लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि भाषाई विविधता का सबसे बड़ा दौर बहुत प्राचीन काल में रहा होगा, लेकिन नए विश्लेषण से संकेत मिलता है कि यह शिखर अपेक्षाकृत हाल के इतिहास में आया।

फिर क्यों मिटने लगीं हजारों भाषाएं?

इसके बाद भाषाओं का तेजी से लोप होना शुरू हुआ और यह प्रक्रिया यूरोपीय उपनिवेशवाद से भी सदियों पहले बड़े राज्यों और साम्राज्यों के विस्तार के साथ शुरू हो चुकी थी।

हम अक्सर यह मानते आए हैं कि भाषाओं के विनाश का दौर केवल 500 साल पहले यूरोपीय उपनिवेशवाद के साथ शुरू हुआ था, लेकिन इस अध्ययन ने इस भ्रम को तोड़ दिया है।

भाषाओं का यह अनमोल खजाना बहुत पहले ही छिनने लगा था। अध्ययन बताता है कि जैसे-जैसे दुनिया में बड़े राज्यों, राजनीतिक व्यवस्थाओं और विशाल साम्राज्यों का विस्तार हुआ, शक्तिशाली संस्कृतियों ने छोटी-छोटी आवाजों को अपने में निगलना शुरू कर दिया। प्रशासन, व्यापार, सत्ता और संस्कृति के प्रभाव से कुछ भाषाएं मजबूत होती गईं, जबकि छोटी और स्थानीय भाषाएं धीरे-धीरे गायब होने लगीं।

शासन, व्यापार और युद्ध के बल पर वर्चस्वशाली भाषाएं थोपी जाने लगीं। यूरोपीय औपनिवेशिक काल से सदियों पहले ही, प्राचीन साम्राज्यों की धमक में अनगिनत छोटी भाषाएं घुट-घुट कर खामोश हो चुकी थीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यूरोपीय उपनिवेशवाद ने इस प्रक्रिया को निश्चित रूप से तेज किया, लेकिन भाषाओं के लुप्त होने की शुरुआत उससे बहुत पहले हो चुकी थी।

इसका अर्थ है कि आज दिखाई देने वाला भाषाई संकट केवल पिछले 500 वर्षों की कहानी नहीं, बल्कि लगभग दो हजार वर्षों से चल रही एक ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है।

भारत में एक मशहूर कहावत है, 'कोस-कोस में बदले पानी, चार कोस में बदले वाणी।' यह बदली वाणी देश में भाषाई विविधता को दर्शाती है, जिसका आज तेजी से लोप हो रहा है। कहीं न कहीं अंग्रेजी-हिंदी से बढ़ता लगाव भारत में भी स्थानीय भाषाओं-बोलियों को निगलता जा रहा है।

आज की भाषाएं हैं इतिहास की 'बची विरासत'

वैज्ञानिकों के अनुसार, आज बोली जाने वाली 7,500 भाषाएं कभी अस्तित्व में रही विशाल भाषाई दुनिया का केवल एक छोटा-सा हिस्सा हैं। जो भाषाएं शक्तिशाली और विस्तार करने वाले समाजों से जुड़ी थीं, उनके बचने की संभावना अधिक रही, जबकि छोटे समुदायों की असंख्य भाषाएं इतिहास में हमेशा के लिए खो गईं।

अध्ययन के प्रमुख लेखक डेमियन ब्लासी का कहना है, "आज हम जो भाषाएं हम बोलते हैं, वे अतीत की उस विशाल विविधता के बचे हुए अवशेष मात्र हैं। इतिहास के एक बहुत बड़े और दर्दनाक दौर से गुजरकर जो भाषाएं खुद को बचा सकीं, वही आज हमारे बीच हैं।"

भाषाओं के साथ खो गई संस्कृति और पुरखों का ज्ञान

हमे समझना होगा कि जब कोई भाषा मरती है, तो सिर्फ शब्दों का अंत नहीं होता; उसके साथ मूक हो जाता है सदियों पुराना ज्ञान, लोरी गाती मां की ममता, लोककथाओं की मिठास और उस माटी का इतिहास जो कभी इन बोलियों में रचा बसा था।

येल यूनिवर्सिटी की भाषाविद क्लेयर बॉवरन सही मायने में याद दिलाती हैं कि भाषाएं महज संवाद का जरिया नहीं। वे इंसानी यादों, अनुभवों और प्रकृति को समझने की एक अनमोल तिजोरी हैं। जब एक भाषा खोती है, तो इंसानी सभ्यता अपनी विरासत का एक पूरा पन्ना हमेशा-हमेशा के लिए खो देती है।

चूंकि हजारों वर्ष पहले की भाषाओं का कोई प्रत्यक्ष रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, इसलिए वैज्ञानिकों ने मानव आबादी, भाषाविज्ञान और सामाजिक संरचनाओं से जुड़े आंकड़ों को मिलाकर गणितीय मॉडल तैयार किया। उन्होंने अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के 171 शिकारी-संग्रहकर्ता समुदायों के आंकड़ों का भी विश्लेषण किया, ताकि शुरुआती मानव समाजों की भाषाई संरचना का अनुमान लगाया जा सके।

हालांकि शोधकर्ता मानते हैं कि यह प्रागैतिहासिक भाषाओं की सटीक गणना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों पर आधारित एक वैज्ञानिक पुनर्निर्माण है। इसके बावजूद विभिन्न मॉडलों में एक बात लगातार समान रही—मानव इतिहास में भाषाओं की संख्या पहले तेजी से बढ़ी, फिर अपने शिखर पर पहुंची और उसके बाद वैश्विक स्तर पर भारी गिरावट आई।

मानव सभ्यता के लिए क्या हैं मायने?

आज की हिंदी, अंग्रेजी, मंदारिन या स्पेनिश जैसी भाषाएं इसलिए बची हैं क्योंकि इन्हें बोलने वाले साम्राज्यों और आबादियों का विस्तार हुआ, न कि इसलिए कि वे किसी खो चुकी बोली से श्रेष्ठ थीं। यह अध्ययन हमें एक गंभीर चेतावनी देता है, आज बची हुई भाषाएं इतिहास के अंतिम झरोखे हैं।

यह अध्ययन याद दिलाता है कि हर खोती भाषा के साथ मानवता अपनी साझा विरासत का एक अनमोल अध्याय भी खो रही है। हमे समझने होगा कि भाषाओं का इतिहास केवल संचार का इतिहास नहीं है, बल्कि मानव सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान के विकास का भी इतिहास है। आज जब दुनिया की सैकड़ों भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं।

हाल ही में द ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी (एएनयू) द्वारा किए एक अन्य अध्ययन में भी सामने आया है कि सदी के अंत तक दुनिया की करीब 1,500 भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी, जिसका मतलब है कि इनको बालने और जानने वाला कोई शेष नहीं होगा। एक अनुमान है कि हर साढ़े तीन महीने में दुनिया में कोई न कोई भाषा मर रही है।

इस भाषा के खत्म होने के साथ ही सदियों से फल फूल रही संस्कृति और उस ज्ञान का भी लोप रहा है जिसकी भरपाई असंभव है।

ऐसे में अगर हमने अपनी क्षेत्रीय बोलियों, मातृभाषाओं और लोक-संस्कृतियों को सहेजने की कोशिश नहीं की, तो इंसानी सभ्यता की यह बची-खुची आवाजें भी इतिहास के सन्नाटे में सदा के लिए दफन हो जाएंगी।