केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना अपनी तमाम लंबित विसंगतियों की बुनियाद पर खड़ी होकर अब उस दौर में पहुंच गयी है जहां हर परियोजना की तरह, प्रभावित स्थानीय प्रभावित लोगों की असहमतियों की आवाजों और जायज मांगों को दमन से कुचला जाता है।
परियोजना के लिए प्रस्तावित ढोंढ़न गांव के निकट बन रहे बांध का निर्माण अपने उरूज पर है। स्थानीय आदिवासी समुदायों के विस्थापन की बलात कोशिशें तेज हो गयी हैं। इस विस्थापन के खिलाफ और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्थानीय समुदाय लामबंद हुए हैं और बीते दो महीने से अपनी मांगें मनवाए जाने की मुहिम, सत्याग्रह के तमाम स्वरूपों मसलन धरने, प्रदर्शन, रास्ता रोको और कलेक्टर के दफ्तर के घेराव के जरिये कर रहे हैं। इस आंदोलन का नेतृत्व जय किसान संगठन और पूर्व में आम आदमी पार्टी से सम्बद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर कर रहे हैं।
अपनी मांगों का निराकरण होते न देख, कुछ आंदोलनकारी 5 अप्रैल 2026 को दिल्ली कूच कर गए हैं और ज़्यादातर स्थानीय लोग विशेष रूप से महिलाएं अपनी धरती पकड़ कर बैठी हैं। 8 अप्रैल 2026 को इन स्थानीय आदिवासी महिलाओं ने सांकेतिक अर्थी सजाकर ‘चिता आंदोलन’ किया और प्रशासन को यह बतलाने की कोशिश की है कि जिन हालात में उन्हें पहुंचा दिया गया है वो अर्थी और चिता से कम नहीं हैं बल्कि उससे बदतर हैं और वो अपनी अंतिम सांस तक अपने हक हुकूक के लिए लड़ेंगीं । स्थानीय आदिवासी महिलाओं के इस सांकेतिक प्रदर्शन ने मीडिया का ध्यान खींचा है। आज दैनिक भास्कर और टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
परियोजना के लिए जहां बांध बन रहा है उसके दायरे में कुल 24 गांव सदियों से बसे हैं। इनमें से 8 गांव बांध के कारण सम्पूर्ण रूप से डूब में आने वाले हैं और 16 गांवों को पन्ना टाइगर रिजर्व में शामिल किया जा रहा है। यह परियोजना अपने आप में देश के नीति-निर्धारकों की समझ और विवेक के प्रति एक कौतूहल उत्पन्न करती है और शुरुआत से ही विवादों में रही है।
उल्लेखनीय है कि इस परियोजना में देश के महत्वपूर्ण पन्ना टाइगर रिजर्व का तकरीबन 30 प्रतिशत कोर ज़ोन सीधे तौर पर प्रभावित हो रहा है जहां टाइगर का मुख्य पर्यावास रहा है। यही वजह है कि देश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने इस परियोजना के विचार और डिजाइन पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की थीं।
खुद सुप्रीम कोर्ट ने इस परियोजना को लेकर देश के पर्यावरणीय कानूनों और विवेक के तकाजे से यह स्पष्ट चेतावनी दी थी कि-“किसी भी परियोजना को स्वीकृति देते समय इस बात को अनिवार्य रूप से तवज्जो देना चाहिए कि हमारी कोशिश (एप्रोच) इको-सेंट्रिक हो न कि एंथ्रोपोसेंट्रिक यानी पारिस्थितिकी केन्द्रित हो न कि केवल मानव-केन्द्रित। इसके साथ ही यह भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है कि उस पर तमाम प्रजातियों के मानक नैसर्गिक हित सुरक्षित हो रहे हैं कि नहीं क्योंकि सभी प्रजातियों को धरती पर रहने के समान अधिकार हैं”।
हालांकि अब परियोजना इन तमाम असहमतियों व चेतावनियों के बावजूद पूरे ठाट के साथ जमीन पर उतर रही है और लोगों का बलात विस्थापन शुरू हो चुका है। छतरपुर कलेक्टर ने परियोजना स्थल पर धारा 144 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा -163) लगा दी है। एहतियातन किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश को निषिद्ध किया चुका है। इसके अलावा जिले के अपर सचिव ने इस परियोजना से स्थल से महज 20 किलोमीटर दूर एक गांव के निवासी अमित भटनागर पर प्रशासन पर हमले किए जाने और स्थानीय भोले- भाले, मासूम लोगों को बरगलाने की ज़िम्मेदारी डालते हुए उन्हें विकास विरोधी करार दे दिया है।
स्थानीय आदिवासियों की आपत्तियां क्या हैं?
पहली आपत्ति जो परियोजना जनित विस्थापन के मामलों में होती है कि हम सदियों से अपने गांव में बसे हैं। इसे नहीं छोड़ना चाहते। अगर छोड़ना ही एक मात्र विकल्प है तो हमें इसी की तरह एक गांव बसाकर दिया जाये और जीवन यापन के लिए इतना मुआवजा दिया जाये ताकि हमें भूखा न रहना पड़े।
इनकी आपत्ति ये भी है कि उन्हें अंधेरे में रखकर नितांत अपारदर्शी तरीके से ग्राम सभा से सहमतियां ली गयी हैं। और सबसे बड़ी आपत्ति तो यही है कि उनकी आपत्तियों को सुना नहीं जा रहा है बल्कि प्रशासन द्वारा निरंतर उनका दमन किया जा रहा है।
इनकी मांगें क्या हैं?
इनकी पहली मांग है कि इनके गांव न उजाड़े जाएँ। ये गांव सदियों से यहाँ बसे हैं। उनका एक सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है।
इनकी दूसरी मांग है कि अगर विस्थापन ही एकमात्र विकल्प है तो भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास व पुनर्स्थापना में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार कानून, 2013 का पूर्ण पालन किया जाये।
तीसरी मांग है कि प्रभावित और विस्थापित होने जा रहे सभी गांव आदिवासी समुदायों के हैं अत: इनका पुनर्वास आदिवासी संस्कृति व परंपरा के संरक्षण के मद्देनजर किया जाये।
चौथी, मांग है कि प्रभावित परिवारों को जमीन के बदले जमीन व गांव के बदले गांव दिया जाये ताकि वे अपने सामाजिक-सांकृतिक जीवन गरिमापूर्ण आजीविका के माध्यम से जी सकें।
अंतिम मांग, विस्थापन व पुनर्वास की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता हो, उन्हें भरोसे में लेकर ही कोई कार्यवाही हो। ग्राम सभा की सहमति फर्जी और गुप-चुप तरीके से ली गयी है, दुबारा पारदर्शी ढंग से ग्राम सभा आयोजित की जाये।
अब तक क्या हुआ?
दैनिक भास्कर ने तफसील से अब तक हुई प्राशासनिक कार्यवाहियों का ब्यौरा दिया है। इसके अनुसार- ग्राम सभा की सहमति जो भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास व पुनर्स्थापना में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार कानून, 2013 की धारा 11 के अनुसार निर्धारित है। प्रशासन ने यह प्रक्रिया, बांध की मंजूरी से आठ साल पहले ही ले पूरी कर ली। गांव वालों का कहना है कि तब उन्हें इस परियोजना की कोई जानकारी ही नहीं थी।
जब गांव विस्थापित ही किए जा रहे हैं तब इन्हें 2013 के कानून के मुताबिक पुनर्वास का अधिकार है लेकिन प्रशासन ने उन्हें 12.5 लाख के नकद पैकेज का ही अधिकारी माना और लगभग 40 प्रतिशत परिवारों के बैंक खातों में यह राशि जमा करवा दी।
अठारह वर्ष की उम्र पार कर चुके सभी वयस्कों को एक अलग इकाई मानकर उन्हें भी पुनर्वास के समस्त अधिकार हैं लेकिन प्रशासन ने 18 साल के व्यक्ति को तो एक इकाई माना है लेकिन इसका निर्धारण सन 2022-23 तय किया गया है। इस वजह से कितने ही युवा इस अधिकार से वंचित किए गए हैं।
ज़ाहिर है, जमीन के बदले जमीन और गांव बसाने की मांग को प्रशासन ने तरजीह नहीं दी है।
क्या प्रावधान हैं?
इस परियोजना की विशिष्टता यह है कि यहाँ दो परियोजनाएं एक साथ विस्थापन का कारण बनी हुई हैं। जिन चौबीस गांवों का विस्थापन किया जाना तय किया गया है उनमें से 16 गांवों को क्रिटिकल टाइगर रिजर्व के लिए किया जाना है जो वन्य जीव संरक्षण कानून, 1972 के दायरे में आता है और शेष 8 गांवों का विस्थापन बांध निर्माण के लिए किया जाना है। दोनों ही परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण के लिए अलग-अलग कायदे हैं।
इस परियोजना के तीन सबल पक्ष हैं जिनका निराकरण किया जाना जरूरी है।
जिन 16 गांवों का अधिग्रहण पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए किया जाना है उन्हें वन्य जीव संरक्षण कानून, 1972 के तहत विस्थापित या रीलोकेट किया जाना चाहिए। इस कानून में इसके लिए दो प्रवाधान हैं- या तो भूमि अधिग्रहण या गांव के निवासियों के साथ स्वैच्छिक समझौता। दिलचस्प है कि ये वे गांव हैं जो पन्ना टाइगर रिजर्व के साथ सह-अस्तित्व में रहते आए हैं। इनसे अभी तक वन्य जीवों को कोई खतरा नहीं रहा लेकिन अब टाइगर रिजर्व का के कोर ज़ोन का एक तिहाई डूब में आ रहा है तो उसके क्षेत्रफल की प्रतिपूर्ति के लिए इन गांवों का अधिग्रहण किया जा रहा है।
स्वैच्छिक समझौते की आड़ में उन्हें 12.5 लाख का नकद पैकेज दिया जा रहा है। सवाल है कि जब इतने सालों तक ये गांव टाइगर रिजर्व के लिए खतरा नहीं थे यानी अब तक मानव उपस्थिति टाइगर के संरक्षण के लिए बाधक नहीं थी?
वन्य जीव संरक्षण कानून में भी भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास व पुनर्स्थापना में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार कानून, 2013 के तहत भूमि-अधिग्रहण किया जाना है लेकिन इसमें एक बड़ा सवाल वन अधिकार कानून, 2006 के समग्रता में क्रियान्वयन का है क्योंकि ये सभी गांव इस कानून के तहत अधिकारों की मान्यता के दायरे में आते हैं। कानून के अनुसार और गांव वालों का कहना है और रिकॉर्ड बताते हैं कि इन गांवों में बसे आदिवासियों को वन अधिकार कानून के तहत किसी भी प्रकार के अधिकारों को मान्यता हासिल नहीं हुई है।
क्या कहता है मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय
इस मामले में माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का एक निर्णय जो 19 जनवरी 2024 को आया, महत्वपूर्ण हो जाता है। ये निर्णय ओरछा वन्य जीव अभयारण्य के संदर्भ में दिया गया। कमलेश प्रजापति बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024)के नाम आए इस निर्णय में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने वन्यजीव संरक्षण के संदर्भ में किए गए “स्वैच्छिक पुनर्वास” की वैधता पर प्रश्न उठाया गया। इस निर्णय के अनुसार – उच्च न्यायालय ने माना कि विस्थापितों से जो सहमति ली गयी वो दबाव में ली गयी। सहमति के लिए दोनों पक्षों का बराबर होना जरूरी है लेकिन प्राय: ऐसे मामलों में प्रशासन दबावपूर्वक या छलपूर्वक सहमति हासिल कर लेता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात इस निर्णय में यह काही गयी कि गांव वालों के वन अधिकारों को मान्यता नहीं दी गयी। बिना समग्रता से इस कानून का पालन किए किसी भी प्रकार से विस्थापन नहीं किया जा सकता। तीसरी बात इस निर्णय में स्पष्ट तौर पर कही गयी कि भूमि-अधिग्रहण के साथ साथ पुनर्वास व पुनर्स्थापना के लिए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास व पुनर्स्थापना में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता का अधिकार कानून, 2013 का पारदर्शी तरीके से पालन नहीं किया गया।
केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से जुड़े प्रशासकों को इस निर्णय का तफसील से अध्ययन करना चाहिए और इसका अक्षरश: पालन किया जाना चाहिए। यह समझना चाहिए कि आदिवासी समुदायों के पास कोई अन्य विकल्प नहीं हैं और इस परियोजना के भी वे लाभार्थी नहीं हैं बल्कि इसका लाभ तमाम आशंकाओं के बावजूद उत्तर प्रदेश के किसानों को होगा।
यह आंदोलन और तीव्र होगा और दमन की नयी इंतिहां देखने को मिलेगी। वजह प्रशासन का रवैया और सामने देश का सबसे उत्पीड़ित समुदाय। ऐसा नहीं है कि इसका शांतिपूर्ण समाधान उपलब्ध नहीं है बल्कि यह प्रशासन के लिए भी यह सबसे आसान विकल्प है कि जो भी कार्यावाई हो वो संविधान और कानून सम्मत हो लेकिन जब प्रशासन ही इस ज़िद पर अड़ जाये कि बाकी सभी तरीके अपनाएं जाएंगे सिर्फ कानून के उचित क्रियान्वयन के तब ये स्थिति सभी के लिए नुकसानदेह होना तय है।
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(लेखक भारत सरकार के आदिवासी मंत्रालय के मामलों द्वारा गठित हैबिटेट राइट्स व सामुदायिक अधिकारों से संबन्धित समितियों में नामित विषय विशेषज्ञ के तौर पर सदस्य रहे हैं। जंगल-जमीन और आदिवासियों के अधिकारों पर काम करते हैं।)