प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
विकास

मिडिल ईस्ट की आग में झुलसता बचपन, गरीबी की चपेट में आ सकते हैं और 2.34 करोड़ बच्चे: यूनिसेफ

यूनिसेफ ने चेताया है कि यदि मध्य पूर्व का संघर्ष और आर्थिक संकट नहीं थमा, तो साल के अंत तक दुनिया के और 2.34 करोड़ बच्चे गरीबी की चपेट में आ सकते हैं।

Lalit Maurya

  • पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसका सबसे गहरा असर दुनिया के करोड़ों बच्चों के जीवन पर पड़ रहा है।

  • यूनिसेफ ने अपनी नई रिपोर्ट में चेताया है यदि युद्ध और उससे पैदा हुआ आर्थिक संकट नहीं थमा, तो साल के अंत तक दुनिया में 2.34 करोड़ अतिरिक्त बच्चे गरीबी की चपेट में आ सकते हैं।

  • बढ़ती महंगाई, महंगा ईंधन और खाद्यान्न संकट सबसे पहले गरीब परिवारों के बच्चों से उनकी थाली, पढ़ाई, इलाज और सुरक्षित बचपन छीन रहे हैं। एशिया और अफ्रीका इस संकट का सबसे बड़ा बोझ उठाएंगे, जहां पहले से ही लाखों परिवार गरीबी से जूझ रहे हैं।

  • सोमालिया, इथियोपिया, नाइजीरिया और बांग्लादेश जैसे देशों में इसके गंभीर संकेत दिखाई देने लगे हैं।

  • यूनिसेफ ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकारों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने समय रहते बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा में निवेश नहीं बढ़ाया, तो वर्षों की विकास यात्रा पलभर में पीछे चली जाएगी। यह केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि पूरी एक पीढ़ी के भविष्य को बचाने की चुनौती है, जिस पर दुनिया को तुरंत सामूहिक कार्रवाई करनी होगी।

मध्य पूर्व में जारी तनाव और जहाजों की आवाजाही में रुकावट सिर्फ जंग के मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने दुनिया में करोड़ों मासूमों के भविष्य पर भी हमला कर दिया है।

यूनिसेफ की नई रिपोर्ट ने चेताया है कि यदि हालात नहीं सुधरे तो इस साल के अंत तक दुनिया में और 2.34 करोड़ बच्चे आर्थिक गरीबी के दलदल में समा सकते हैं। इससे उनके लिए भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य जैसी बुनियादी जरूरतें पहले से कहीं ज्यादा दूर होती जाएंगी।

यूनिसेफ की यह नई रिपोर्ट 'द इम्पैक्ट ऑफ द वॉर इन द मिडिल ईस्ट ऑन चिल्ड्रेन इन मॉनेटेरिली पुअर हाउसहोल्ड्स' 167 से अधिक देशों के आंकड़ों पर आधारित है।

रिपोर्ट बताती है कि युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में शिपिंग के बाधित होने से दुनिया में खाद्यान्न, ईंधन और अन्य जरूरी चीजों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। इसका सबसे बड़ा बोझ उन परिवारों पर पड़ रहा है, जो पहले ही गरीबी से जूझ रहे हैं।

जब महंगाई बचपन से छीन ले रोटी और किताब

यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक कैथरीन रसेल का इस बारे में कहना है, "मध्य पूर्व में बढ़ता संघर्ष सिर्फ वहां ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के बच्चों को इसकी कीमत चुकाने पर मजबूर कर रहा है। महंगाई के कारण कई परिवारों के लिए अन्न और शिक्षा तक पहुंच मुश्किल होती जा रही है। ऐसे में बचपन में मिलने वाला यह जख्म इन बच्चों को जीवन भर के लिए पीछे ढकेल देगा।"

उनके मुताबिक यह तनाव जितने लंबे समय तक खिंचेगा, बच्चों का भविष्य उतना ही अंधकारमय होता जाएगा।

इस रिपोर्ट में दो संभावित परिदृश्यों का आकलन किया गया है। इसमें पहले परिदृश्य में संघर्ष के चलते करीब 1.83 करोड़ अतिरिक्त बच्चे गरीबी के भंवर में फंस सकते हैं। वहीं गंभीर स्थिति में, यदि संघर्ष लंबा खिंचता है और आर्थिक संकट गहराता है, तो यह आंकड़ा बढ़कर 2.34 करोड़ तक पहुंच सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों की आर्थिक स्थिति वैश्विक आर्थिक झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील होती है। खाद्य और ईंधन की बढ़ती कीमतों के बीच कई देशों की सरकारों के पास राहत देने के लिए सीमित संसाधन हैं, जिससे परिवारों के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल होता जा रहा है।

एशिया-अफ्रीका पर सबसे गहरी चोट

रिपोर्ट में सामने आया है कि बच्चों की बढ़ती गरीबी का करीब  80 फीसदी बोझ एशिया और अफ्रीका पर पड़ेगा। इन क्षेत्रों में पहले से ही गरीबी का स्तर अधिक है और बाहरी आर्थिक संकटों का असर तेजी से महसूस होता है।

यही वजह है कि कुछ देशों में इसके गंभीर संकेत पहले ही दिखाई देने लगे हैं। उदाहरण के लिए सोमालिया में युद्ध बढ़ने के कुछ ही दिनों में ईंधन के दाम बढ़कर दोगुने से अधिक हो गए हैं। इससे अब वहां बच्चों के लिए पानी, खाना और दवाइयां पहुंचाना भी दूभर हो गया है।

इसी तरह इथियोपिया में डीजल की कीमतें 31 फीसदी तक बढ़ गई हैं। ऐसे में दूर-दराज के गांवों में फंसे बच्चों तक राहत सामग्री पहुंचाने का खर्च 50 से 70 फीसदी तक बढ़ गया है। कुछ ऐसी ही स्थिति नाइजीरिया में भी है, जहां गरीब परिवार अपनी आमदनी का 60-70 फीसदी हिस्सा भोजन और परिवहन पर खर्च करते हैं। ऐसे में मामूली महंगाई भी उनके बच्चों से निवाला छीन रही है।

क्या पलभर में मिट जाएगी वर्षों की मेहनत?

कुछ ऐसे ही हालात पड़ोसी बांग्लादेश के भी हैं जहां चावल, दाल, तेल और सब्जियों जैसी बुनियादी चीजों के दाम आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रहे हैं। आशंका है कि यहां करीब और 12 लाख जिंदगियां गरीबी की गर्त में गिर सकती हैं।

यूनिसेफ ने आगाह किया है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो बच्चों को गरीबी से बाहर निकालने की दिशा में सालों में हुई प्रगति कुछ समय में ही पीछे चली जाएगी।

इससे लाखों परिवारों के लिए भोजन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और बाल संरक्षण जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच और कठिन हो जाएगी, जिसका असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर लंबे समय तक रहेगा।

दांव पर पूरी पीढ़ी का भविष्य

यूनिसेफ ने सरकारों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि संकट की सबसे बड़ी कीमत बच्चों को न चुकानी पड़े। इसके लिए बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा के बजट में किसी भी तरह की कटौती न की जाए। गरीब परिवारों तक सीधे नकद सहायता (कैश ट्रांसफर) पहुंचाई जाए, महंगाई पर नियंत्रण रखकर आवश्यक वस्तुओं को सुलभ बनाया जाए और कर्ज के बोझ तले दबे गरीब देशों को ऋण से राहत दी जाए, ताकि वे अपने संसाधन बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण पर खर्च कर सकें।

साथ ही, भविष्य में ऐसे किसी भी वैश्विक संकट के दौरान बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत वैश्विक आपातकालीन व्यवस्था (ग्लोबल इमरजेंसी सिस्टम) विकसित करने की भी जरूरत बताई गई है।

देखा जाए तो यह संकट महज आंकड़ों का नहीं, मासूम जिंदगियों और उनके भविष्य का है। अगर दुनिया अब भी नहीं जागी, तो संघर्ष और महंगाई का यह जाल करोड़ों बच्चों को गहरे अन्धकार में धकेल देगा। ऐसे में हम अपने भविष्य को इस तरह तबाह होते नहीं देख सकते।