फोटो सौजन्य: जसिंता केरकेट्टा
जलवायु

“लेखन ने तोड़ी मेरे भीतर डर की दीवार”

अपनी पत्रकारिता और कविता में जसिंता केरकेट्टा झारखंड के उरांव आदिवासी समुदाय से जुड़े विस्थापन के अनुभवों को प्रकृति के विनाश के साथ पिरोती हैं। आदिवासी अधिकारों के लिए उनकी गहरी और भावनात्मक पक्षधरता के लिए पहचाना जाने वाला उनका लेखन दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है। प्रीथा बनर्जी को दिए एक साक्षात्कार में केरकेट्टा बताती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उन्होंने प्रकृति से गहरा रिश्ता बनाकर खुद को ‘पागलपन’ में डूबने से बचाए रखा

Preetha Banerjee

आपकी कई कविताएं पूंजीवाद के आदिवासी समुदायों और उनके प्राकृतिक परिवेश पर पड़ने वाले असर को छूती हैं। किन निजी अनुभवों ने आपको इस संघर्ष को अपनी आवाज देने के लिए प्रेरित किया?

मैं आठवीं कक्षा में थी, जब मैं झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर में रहती थी। मेरा स्कूल जिले के मनोहरपुर प्रखंड में स्थित मेरे गांव से ट्रेन द्वारा लगभग एक घंटे की दूरी पर था। इस क्षेत्र में मैंने कोल्हान राज्य और हो आदिवासी समुदाय के इतिहास से जुड़ी कई कहानियां सुनीं। हो आदिवासी एक ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार मुंडा समुदाय हैं, जिनका भूमि और प्रकृति से गहरा रिश्ता है। इनकी समृद्ध संस्कृति है और अपनी विशिष्ट पारंपरिक शासन व्यवस्था है। मनोहरपुर प्रखंड सरंडा जंगल के दायरे में है, जो एशिया का सबसे बड़ा साल वन है और आदिवासी लोग साल के पेड़ की पूजा करते हैं। बाद में यहीं पर चिरिया गांव में भारत की सबसे बड़ी लौह अयस्क खदान स्थापित की गई और हावड़ा–नागपुर रेल लाइन बिछाई गई। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात से बहुत से लोग यहां आकर बस गए। सरंडा जंगल के पेड़ काटकर रेलवे की पटरियां बिछाई गईं। इसी दौर में गुजरात से आए लोगों ने मनोहरपुर में आरा मिलें स्थापित कीं। आदिवासी बहुल इलाका होने के कारण इन आरा मिलों में बड़ी संख्या में आदिवासी काम करने लगे। इससे पहले मारवाड़ क्षेत्र के व्यापारी भी व्यापार करने यहां आ चुके थे। समय के साथ मनोहरपुर एक कस्बे में बदल गया। लेकिन सत्ता उन्हीं लोगों के हाथ में रही, जो राजस्थान से आए थे। वह इस आदिवासी इलाके में राजा और जमींदार बन बैठे।

मनोहरपुर क्षेत्र का प्रशासन पोड़ाहाट के राजा के परिवार के एक सदस्य के हाथ में था, जो लोगों से कर वसूलता था। जमींदारी प्रथा और राजशाही के खत्म होने के बाद भी इस परिवार के लोग यहां व्यापार करते रहे। इसी बीच मनोहरपुर खनन, बाजार, लकड़ी और तेंदूपत्ता के कारोबार से जुड़े गुंडागर्दी और दहशत का केंद्र बन गया। इसी कस्बे में जमीन विवाद को लेकर प्रभावशाली और ऊंची जाति के लोगों ने मेरे चाचा की भीड़ द्वारा हत्या कर दी। मेरी मंझली दादी को जेल में डाल दिया गया। दोषियों ने आदिवासियों पर अच्छी फसल के लिए नरबलि देने का झूठा आरोप लगाया और यह मनगढ़ंत कहानी अखबारों में छपी। जब मेरे गांव के लोग विरोध करने आगे आए तो पूरे केरकेट्टा कबीले को इलाके से खत्म कर देने की धमकी दी गई।

इस संघर्ष के दौरान सरंडा जंगल क्षेत्र के कुछ नक्सली समूह आदिवासियों की रक्षा में सामने आए। उन्होंने ऐलान किया कि अगर केरकेट्टा कबीले का कोई और सदस्य मारा गया तो ऊंची जाति के दोषियों को इलाके से खदेड़ दिया जाएगा। कई दिनों तक माहौल बेहद तनावपूर्ण बना रहा।

उस समय मैं एक बाल-पत्रिका के लिए कहानियां और कविताएं लिखा करती थी। यह घटनाएं मुझे भीतर तक हिला गईं। मुझे एहसास हुआ कि हमारे बारे में हम खुद नहीं लिख रहे हैं और हमारे पास उस प्रभुत्वशाली विमर्श को चुनौती देने के साधन नहीं हैं। इसी दौर में मैंने लेखन को गंभीरता से लेना शुरू किया। यही वह मोड़ था, जब मैंने लिखना शौक नहीं बल्कि अपने लोगों की आवाज को मजबूत करने का जरिया बना लिया।

कविताएं आपके गुस्से और भावनाओं को कैसे दिशा देती हैं और दूसरों को प्रेरित कैसे करती हैं?

अगर मैंने कलम न उठाई होती तो मैं निश्चित रूप से हथियार उठा लेती। बचपन से ही मैंने अपने भीतर काम करना शुरू कर दिया था। उस समय भावनाएं मेरे अंदर तूफान की तरह उमड़ती थीं। मैंने सालों तक मौन साधा लेकिन शब्द कागज पर चीखते हुए फूट पड़ते थे।

स्कूल की लड़कियां कहा करती थीं, “तुम्हारे शब्द तीर जैसे हैं, सीधे दिल में चुभते हैं।” अगर स्कूल में किसी से मेरी अनबन हो जाती तो वे बोलकर गुस्सा जाहिर करतीं लेकिन मैं कुछ लिखकर उन्हें भेज देती। वह कहतीं, “बोलकर लड़ो, लिखो मत क्योंकि लिखना ज्यादा चोट पहुंचाता है।”

प्रकृति और लेखन दोनों ने मुझे बचाया है। मैं अपने चारों ओर की हिंसा का जवाब हिंसा से नहीं दे सकी बल्कि मैंने लेखन को चुना क्योंकि यह एक ऐसा रास्ता है, जो नदी की तरह बहते हुए कई दिलों के समंदर तक पहुंचता है। लेखन ने मेरे भीतर का डर मिटाया। इसने मुझे अपने शरीर और ब्रह्मांड से रिश्ता बनाना सिखाया। इसने मुझे बेहतर इंसान बनाया। मेरा मानना है कि लेखन या कोई भी कला तब तक अर्थहीन है, जब तक वह हमें बेहतर मनुष्य न बनाए।

आदिवासी समुदाय अपने पर्यावरण में हो रहे बदलावों और क्षरण को कैसे देखते हैं? क्या आपने इन अनुभवों को दर्ज किया है?

आदिवासी लोग अपनी सहजता, मासूमियत, ईमानदारी, सच्चाई और निश्छल हंसी इसलिए बचा पाए हैं क्योंकि हम प्रकृति के बेहद करीब रहते हैं। लेकिन प्रकृति के दोहन और आदिवासी समुदायों के लगातार विस्थापन के विनाशकारी परिणाम सामने आ रहे हैं।

आदिवासी समाज में भ्रष्टाचार, नफरत, गुस्सा, आत्महत्या, महिलाओं का शोषण, सामूहिक बलात्कार और अन्य अत्याचार बढ़ रहे हैं।

मैं इसका कारण हमें मुख्यधारा में शामिल न किया जाना, विकास के नाम पर हमारे प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करना और राष्ट्रीय हित के नाम पर हमारे इलाकों की उपेक्षा को मानती हूं। इस प्रक्रिया में आदिवासियों को इस देश के नए दलितों में बदला जा रहा है। यह तब्दीली एक ऐसी मजदूर आबादी में है, जो देश बनाती है, नालियां साफ करती है और बेहद अमानवीय परिस्थितियों में जीती है।

इन सबके बीच, मेरी जीवित रहने की ताकत प्रकृति से गहरे जुड़ाव और उसके साथ काम करने से आती है। आदिवासी होने के नाते, हमेशा प्रकृति से घिरे इलाकों में रहना मेरे लिए किसी घाव को भरने जैसा है। इसने मुझे मानसिक रूप से टूटने से भी बचाया है।

आपने जंगलों और नदियों पर हमलों के जरिये धर्म, लैंगिक असमानता और सामाजिक अन्याय पर भी टिप्पणी की है। यह सब कैसे जुड़े हुए हैं?

धर्म, लैंगिक असमानता और सामाजिक अन्याय को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। दरअसल यह सब आपस में जुड़े हुए हैं। मेरा मानना है कि हम प्रकृति के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, वैसा ही इंसानों के साथ भी करते हैं। जिस पल इंसान ने खुद को प्रकृति से श्रेष्ठ समझना शुरू किया, उसी पल उसने कुछ इंसानों को भी दूसरों से श्रेष्ठ मानना शुरू कर दिया।

इस सोच से पैदा हुई ऊंच-नीच उस बुनियादी सच को नजरअंदाज कर देती है कि प्रकृति में हर चीज एक-दूसरे से जुड़ी है और इंसानी सहयोग के बिना जीवित नहीं रह सकती। इसलिए जब मैं नदियों, पहाड़ों और जंगलों पर हमलों या उनकी लूट और कब्जे के खिलाफ लिखती हूं तो वह सिर्फ प्रकृति के बारे में नहीं होता। वह उन लोगों या समुदायों के बारे में भी होता है, जो इन इलाकों में रहते हैं और जिनका जीवन इनसे गहराई से जुड़ा है। मेरा मानना है कि देर-सवेर पूरी मानव सभ्यता को इसके परिणाम भुगतने होंगे।

जलवायु और सामाजिक न्याय के लिए कविता कितनी प्रभावी है? सामाजिक बदलाव में स्थानीय भाषाओं की क्या भूमिका है?

मैंने भारत में ही कई लोगों को यह कहते सुना है कि वह आदिवासी मुद्दों के बारे में ज्यादा नहीं जानते। कविताओं के जरिये वह आदिवासी दुनिया से थोड़ा ही सही लेकिन जुड़ पाते हैं। कविता उन्हें आदिवासी दुनिया को महसूस करने, सुनने और दिल से समझने का मौका देती है।

भारत हो या विदेश, मैंने दोनों ही जगह लोगों को कविता सुनकर भावुक होते या फिर रोते हुए देखा है। कविता दरअसल लोगों को जोड़ती है और सीमाओं के पार एक रिश्ता कायम करने में मददगार बनती है। मेरी नजर में कविताएं सामाजिक न्याय की राह खोलती हैं। जहां तक भाषा की बात है, मैं सिर्फ हिंदी में लिखती हूं, हालांकि मैं संथाली बोल सकती हूं और कई सालों की मेहनत और कोशिश के बाद अब कुरुख भाषा समझ पाती हूं।

मेरी किताब का संथाली में अनुवाद हुआ है। मुझे आदिवासी भाषाएं हिंदी से बहुत अलग लगती हैं। वह ज्यादा लैंगिक-संवेदनशील हैं और प्रकृति से गहराई से जुड़ी हैं। आदिवासी भाषाएं अभिव्यक्ति में कहीं ज्यादा विस्तृत हैं। आदिवासी भाषाओं में गहरा ज्ञान समाया हुआ है। अगर ये भाषाएं खत्म हो गईं तो मुख्यधारा समाज इस अमूल्य ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा खो देगा।

आपके अनुभव में संरक्षण और निर्णय-प्रक्रिया में भारत के आदिवासी समुदायों की भूमिका और स्थिति क्या है?

आदिवासी समुदाय अपने इलाको में मौजूद जंगलों, नदियों और पहाड़ों की रक्षा के अपने प्राचीन अधिकारों को बचाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। लद्दाख में हजारों लोगों द्वारा अपने क्षेत्र को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग इस संघर्ष के एक बड़े उदाहरण के तौर पर है।

देश के भीतर ही दो परस्पर विरोधी सोच दिखाई देती हैं। एक विचार शोषण और मुनाफे पर आधारित है तो दूसरा विचार इस विश्वास पर टिका है कि इंसानों की रक्षा प्रकृति की रक्षा से अलग नहीं है। यह दोनों ही नजरिए आपस में टकरा रहे हैं और देश भर के आदिवासी समुदाय अपने-अपने कोनों में यह लड़ाई लड़ रहे हैं।

आदिवासी लोग ही हैं, जो हर परिस्थिति में इस जमीन से जुड़े रहेंगे। वह अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे। साथ ही प्रकृति और उसके लोगों के अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे। वह कई विशेषाधिकार हासिल करने वाली ऊंची जातियों की तरह अपने देश को कभी छोड़कर नहीं भागेंगे। आदिवासी लोग ही यहां शुरुआत से हैं और यही समुदाय इस धरती की विविधता को बचाने के लिए आखिर तक संघर्ष करता रहेगा।

यह साक्षात्कार डाउन टू अर्थ, हिंदी मासिक पत्रिका के फरवरी माह अंक में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका की प्रतियां बुक कराने के लिए क्लिक करें