स्विट्जरलैंड में तेजी से पिघलते ग्लेशियर; फोटो: ईटीएच ज्यूरिख 
जलवायु

पिघलते ग्लेशियरों का दर्द: स्विट्जरलैंड में एक साल में 5 फीसदी से ज्यादा बर्फ गायब

कम बर्फबारी और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों को गहरी चोट पहुंचाई है। रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल में यहां बर्फ का करीब 20 फीसदी भंडार खत्म हो चुका है।

Lalit Maurya

  • स्विट्जरलैंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। 2026 में यहां ग्लेशियरों में जमा कुल बर्फ का 5 फीसदी से अधिक हिस्सा खत्म हो गया, जबकि पिछले पांच वर्षों में करीब 20 फीसदी बर्फ भंडार नष्ट हो चुका है।

  • कम बर्फबारी और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी ने इस नुकसान को और बढ़ा दिया। कई ग्लेशियरों की मोटाई 2.5 से 4 मीटर तक घट गई, जबकि कुछ छोटे ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो गए।

  • देखा जाए तो यह संकट केवल स्विट्जरलैंड तक सीमित नहीं है। आईसीआईएमओडी की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 2000 के बाद दोगुनी हो गई है।

  • 1975 के बाद से निगरानी किए गए ग्लेशियरों की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है। इस क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं, जिनसे एशिया की कम से कम 10 प्रमुख नदी प्रणालियों को पानी मिलता है।

  • 2023 की आईसीआईएमओडी रिपोर्ट ने चेताया था कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन मौजूदा रफ्तार से जारी रहा, तो सदी के अंत तक हिमालयी ग्लेशियरों के मौजूदा आयतन का करीब 80 फीसदी हिस्सा खत्म हो सकता है।

  • इसका असर नदियों के जल प्रवाह, खेती, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन पर पड़ेगा। साथ ही, ग्लेशियल झीलों के फटने से विनाशकारी बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है। पिघलती बर्फ चेतावनी दे रही है कि ग्लेशियरों को बचाना दरअसल भविष्य के पानी और करोड़ों लोगों की आजीविका बचाने का सवाल है।

दुनिया के पहाड़ों पर जमी बर्फ केवल खूबसूरत नजारों का हिस्सा नहीं है। यही बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर नदियों को पानी देती है, खेतों को सहारा देती है और करोड़ों लोगों की प्यास बुझाने में अहम भूमिका निभाती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर के बीच यह प्राकृतिक जल भंडार तेजी से सिमट रहे हैं। स्विट्जरलैंड से सामने आए ताजा आंकड़े इसी खतरे की गंभीर तस्वीर को उजागर करते हैं।

नई रिपोर्ट में सामने आया है कि 2026 में स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों में जमा कुल बर्फ का 5 फीसदी से ज्यादा हिस्सा पिघलकर खत्म हो गया। इसकी बड़ी वजह सर्दियों में कम बर्फबारी और मई से सितंबर के बीच गर्म व शुष्क मौसम रहा।

हालात कितने गंभीर हैं, अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले पांच वर्षों में ही देश के ग्लेशियरों का करीब 20 फीसदी हिस्सा गायब हो चुका है। यानी हजारों वर्षों में जमा इस बर्फ का करीब पांचवां हिस्सा महज पांच साल में खत्म हो गया।

स्विस एकेडमी ऑफ साइंसेज द्वारा जारी इस वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल ग्लेशियरों की मोटाई औसतन ढाई से 4 मीटर तक कम हुई। वहीं कुछ ग्लेशियरों के निचले हिस्सों में बर्फ की मोटाई 10 मीटर तक घट गई। रोन, आलेत्श और क्लारिडेन सहित कई ग्लेशियरों में अब तक का सबसे अधिक पिघलाव दर्ज किया गया। वहीं, बेला टोला और ग्रीसफिर्न जैसे छोटे ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो गए।

सर्दियों में कम बर्फ, गर्मियों में आग बरसाती गर्मी

वैज्ञानिकों के मुताबिक इन ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के पीछे मौसम का असामान्य बदलाव बड़ी वजह रहा। 2025-26 की सर्दी स्विट्जरलैंड में रिकॉर्ड शुरू होने के बाद सबसे कम बर्फबारी वाली दस सर्दियों में शामिल रही। इसके बाद मई से सितंबर तक गर्म और शुष्क मौसम ने बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ा दी।

2026 की गर्मियों में गर्मी ने ऐसा रिकॉर्ड तोड़ा कि 76 दिनों तक 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर भी तापमान शून्य डिग्री से ऊपर रहा। यह सामान्य से दोगुने से भी ज्यादा था।

सितंबर तक हालात इतने बिगड़ गए कि 3,500 मीटर की ऊंचाई पर भी बर्फ की सुरक्षात्मक परत पूरी तरह गायब हो गई। सामान्य परिस्थितियों में सर्दियों में जमा होने वाली बर्फ गर्मियों में ग्लेशियरों को सीधी धूप और गर्म हवा से बचाती है। लेकिन जब यह परत ही खत्म हो जाती है, तो पुरानी बर्फ और ग्लेशियर की सतह तेजी से पिघलने लगती है।

पिघलती बर्फ से फिलहाल पानी, लेकिन भविष्य में बढ़ेगा संकट

ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से फिलहाल कुछ इलाकों में पानी की कमी दूर हो सकती है, लेकिन यह राहत ज्यादा दिनों तक नहीं रहेगी। रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई से सितंबर 2026 के बीच स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों से करीब 220,000 करोड़ लीटर लीटर पानी निकला। यह देश में परिवारों की साल भर की घरेलू पेयजल खपत के चार गुने से भी ज्यादा है।

लेकिन चिंता की बात यह है कि यदि बर्फ इसी रफ्तार से पिघलती रही, तो भविष्य में पानी का यह स्रोत तेजी से सिमट सकता है।

वैज्ञानिकों ने भी चेताया है कि इस पानी को स्थाई जल स्रोत समझना भूल होगी। ग्लेशियर जितने छोटे होते जाएंगे, भविष्य में नदियों को पानी देने की उनकी क्षमता भी उतनी ही घटती जाएगी। इसका असर पेयजल आपूर्ति, कृषि, जलविद्युत उत्पादन और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है।

हिमालय के लिए भी खतरे की घंटी

स्विट्जरलैंड में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना हिमालय के लिए भी एक अहम चेतावनी है। हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में हजारों ग्लेशियर एशिया की प्रमुख नदी प्रणालियों को पानी देते हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों के जल प्रवाह में हिमालय की बर्फ और ग्लेशियरों की अहम भूमिका है। इन नदियों पर भारत सहित कई देशों की बड़ी आबादी की पेयजल, सिंचाई और आजीविका संबंधी जरूरतें निर्भर हैं।

आईसीआईएमओडी की 2023 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, यदि दुनिया का तापमान इसी तरह से बढ़ता रहा तो हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर इस सदी के अंत तक अपना 30 से 50 फीसदी तक हिस्सा खो सकते हैं।

वहीं यदि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए, तब भी इस क्षेत्र में ग्लेशियरों का बड़ा हिस्सा पिघल सकता है।

इसी तरह आईसीआईएमओडी द्वारा मार्च 2026 में जारी जानकारी के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर 2000 के बाद से दोगुनी हो गई है। स्थिति यह है कि 1975 के बाद से कुछ आकलनों में ग्लेशियरों की मोटाई में कुल 27 मीटर तक की कमी सामने आई है।

पिछली रिपोर्टों से पता चला है कि 2010 से 2019 के बीच इस क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने की दर पिछले दशक की तुलना में 65 फीसदी अधिक रही। ऐसे में यदि उत्सर्जन के मौजूदा रुझान जारी रहे तो सदी के अंत तक इन ग्लेशियरों के मौजूदा आयतन का करीब 80 फीसदी हिस्सा खत्म हो सकता है।

इसका खतरा केवल भविष्य में पानी की कमी तक सीमित नहीं है। तेजी से पिघलते ग्लेशियरों और बढ़ती झीलों से ग्लेशियल झील फटने जैसी बाढ़ का जोखिम भी बढ़ सकता है। ऐसी घटनाएं पहाड़ी बस्तियों, सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और खेतों को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं।

केवल पहाड़ों की समस्या नहीं बर्फ का पिघलना

स्विट्जरलैंड और भारत के ये आंकड़े बताते हैं कि ग्लेशियरों का संकट अब पहाड़ों तक सीमित नहीं है। इसका असर उन शहरों, खेतों और समुदायों तक पहुंच सकता है, जिनका जीवन इनसे निकलने वाले पानी पर निर्भर है।

देखा जाए तो ग्लेशियरों का नुकसान एक ऐसा बदलाव है, जिसे आसानी से नहीं पलटा जा सकता। बर्फ का वर्षों में जमा हुआ भंडार कुछ गर्म मौसमों में तेजी से खत्म हो सकता है, लेकिन उसे दोबारा बनने में दशकों या सदियां लग सकती हैं।

ऐसे में ग्लेशियरों को बचाने का सवाल केवल बर्फ को बचाने का नहीं, बल्कि भविष्य के पानी, आजीविका और पर्वतीय पर्यावरण को सुरक्षित रखने का भी है। स्विट्जरलैंड और हिमालय में पिघलती बर्फ दुनिया को याद दिला रही है कि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना कितना जरूरी है।