जलवायु

बाढ़ के अनुभव ने बदला जीवन का नजरिया

ऐसी दुनिया में नई जिंदगी क्यों लाई जाए, जो उसकी सुरक्षा करना इतनी जल्दी भूल जाती है

DTE Staff

जब बाढ़ ने 2015 में चेन्नई को पूरी तरह से डुबो दिया था, तब मेरा परिवार वहीं फंसा हुआ था। मैं दिल्ली में अटका था और उनसे पूरी तरह कट गया था। मुझे उनके बारे में किसी प्रकार की जानकारी नहीं मिल पा रही थी। मैं बहुत अधिक परेशान था। मैं अपनी खुली आंखों से एक जलवायु आपदा को परदे पर घटते हुए देख रहा था। उस समय का वह बेबस डर दरअसल एक कठोर और नई सच्चाई जैसा महसूत हुआ, फिर भी हम ऐसी चीजें भूल जाते हैं।

इस घटना के कुछ साल के बाद जब मैं चेन्नई लौटा उस वक्त हमारे अपार्टमेंट की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने एक सरल लेकिन उस समय के लिए बेहद जरूरी प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव था कि अगली बाढ़ से बचाव के लिए इमारत की नींव को क्यों न और ऊंचा किया जाए। सुरक्षा के हिसाब से यह एक बहुत उपयोगी और अच्छी पहल थी और साथ ही यह उस वक्त के लिए एक व्यावहारिक फैसला भी था। इसमें सबसे जरूरी बात यह थी कि यह काम तुरंत करना जरूरी था जो कि एक कड़वे अनुभव से उपजा था। लेकिन यह प्रस्ताव गिर गया क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों ने केवल इमारत की “सुंदरता” के नाम पर अपनी-अपनी आपत्तियां दर्ज करा दीं। इससे मैं परेशान हो उठा लेकिन उस चकरा देने वाले बेतुकेपन ने मेरे एक निजी फैसले को पूरी तरह से पक्का कर दिया कि अब मैं बच्चों को नहीं पैदा करूंगा। आखिर ऐसी दुनिया में नई जिंदगी क्यों लाई जाए, जो उसकी सुरक्षा करना इतनी जल्दी भूल जाती है।

लगता है मेरी पीढ़ी एक तरह का घाटा छोड़कर जा रही है। घटते संसाधन, अस्थिर नौकरियां और ऐसी जलवायु जो मरम्मत से बाहर हो चुकी है। मीडिया के आसपास काम करने से यह भावना और तीखी हो गई है। एक ऐसे देश में, जहां जाति और धर्म आधारित भेदभाव के खिलाफ संघर्ष सही रूप से केंद्र में रहता है लेकिन धीरे-धीरे बढ़ने वाला जलवायु संकट आसानी से नजर नहीं आता।

यह अक्सर अनदेखा रह जाता है। वह तब तक नजरों से ओझल रहता है, जब तक अचानक और हिंसक रूप से आपके दरवाजे पर आ खड़ा न हो। यह विचार मेरे कैंसर के निदान से भी आकार लेते हैं। कीमोथेरेपी आपको बचाती है लेकिन पूरी तरह तोड़कर। अस्पताल के वार्ड्स में मैंने पीड़ा को उसके सबसे कच्चे रूप में देखा है, विशेषत से बच्चों के चेहरों पर। उसे फिर कभी भुलाया नहीं जा सकता। जीवनशैली और बीमारियों के बीच संबंध साफ है। यह हमारे फेफड़ों में समाया प्रदूषण, लगातार बना रहने वाला तनाव और वह प्रोसेस्ड फूड जिस पर हम निर्भर हैं यह सब मिलकर बीमारी में बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह एक साथ साफ भी लगती है और भयावह भी। जीवित बच जाना आपको फिर एक कर्ज में डूबी असली जिंदगी में लौटा देता है, जहां उधार मिले समय के लिए आभार जताने की उम्मीद की जाती है।

सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है। वह पूंजीवाद जो अंतहीन विकास की मांग करता है। जलवायु कार्रवाई पर राजनीतिक हिचकिचाहट और मुनाफे की तरह चलने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था दरअसल अलग-अलग समस्याएं नहीं हैं। यह सब उसी एक मशीन के हिस्से हैं, जिसने ऐसी दुनिया गढ़ी है, जिसमें मैं किसी बच्चे को नहीं लाना चाहता।

इस तरह बच्चे पैदा करना अब एक तरह की विलासिता बन गया है। यह उन लोगों के लिए ज्यादा आसान है जिनके पास पीढ़ियों की जमा पूंजी है, जो निजी स्वास्थ्य सेवाओं, साफ हवा और सुरक्षित इलाकों के सहारे खुद को बचा सकते हैं।

आखिरकार मेरी एंजाएटी इस समझ से जुड़ी है कि हम चाहे कितनी भी सावधानी से अपनी जिंदगी खड़ी करें, उसके नीचे की जमीन लगातार खिसक रही है। यह देखना कि समाज दीर्घकालिक अस्तित्व के बजाय तात्कालिक लाभ चुन रहा है और भारी मन से यह स्वीकार करना कि ऐसी अनिश्चितता में नई जिंदगी लाना मेरे लिए उम्मीद का वह कदम नहीं है, जो मैं उठा सकूं। कम से कम अभी तो नहीं।

यह लेख डाउन टू अर्थ, हिंदी मासिक पत्रिका के फरवरी माह अंक में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका की प्रतियां बुक कराने के लिए क्लिक करें