पिछले दस वर्षों में धरती के गर्म होने की रफ्तार करीब दोगुनी हुई, वैज्ञानिकों ने पांच प्रमुख तापमान रिकॉर्ड का विश्लेषण किया।
2015 के बाद ग्लोबल वार्मिंग में तेज उछाल, तापमान बढ़ने की रफ्तार 0.35 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक पहुंची।
अल नीनो और सौर गतिविधियों का प्रभाव हटाने के बाद भी 2023 और 2024 सबसे गर्म साल बने रहे।
वैज्ञानिकों ने 98 प्रतिशत से अधिक सांख्यिकीय विश्वसनीयता के साथ ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार बढ़ने के प्रमाण पेश किए।
मौजूदा रफ्तार जारी रही तो 2030 से पहले दुनिया दीर्घकालिक आधार पर पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री सीमा पार कर सकती है।
धरती पहले भी गर्म हो रही थी, लेकिन अब उसकी तपिश बढ़ने की रफ्तार भी तेज हो गई है। जलवायु परिवर्तन को लेकर सामने आई एक नया वैज्ञानिक अध्ययन ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, पिछले करीब दस सालों में पृथ्वी का औसत तापमान हर दशक लगभग 0.35 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ा है।
इसके मुकाबले 1970 से 2015 के बीच तापमान बढ़ने की औसत रफ्तार 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक से कुछ कम थी। यानी धरती अब पहले के मुकाबले करीब दोगुनी तेजी से गर्म हो रही है।
जर्मनी के पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के नतीजे वैज्ञानिक पत्रिका 'जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स' में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि 2015 के आसपास से वैश्विक तापमान बढ़ने की रफ्तार में तेजी आने के मजबूत और सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं।
पांच बड़े रिकॉर्ड, एक ही चेतावनी
इस अध्ययन की खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने किसी एक तापमान रिकॉर्ड पर भरोसा नहीं किया। उन्होंने नासा, अमेरिकी मौसम एजेंसी नोआ, हेडकुर्त, बर्कले अर्थ और यूरोपीय ईआरए5 के पांच प्रमुख तापमान डेटासेट का विश्लेषण किया।
नतीजा चौंकाने वाला था। अलग-अलग आंकड़ों और सांख्यिकीय तरीकों के बावजूद सभी में तापमान बढ़ने की रफ्तार तेज होने के संकेत मिले। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस निष्कर्ष की सांख्यिकीय विश्वसनीयता 98 प्रतिशत से अधिक है। इसका मतलब यह नहीं कि हर साल तापमान एक समान तेजी से बढ़ेगा, बल्कि यह कि लंबे समय के आंकड़ों में गर्मी बढ़ने की गति पहले के मुकाबले तेज दिखाई दे रही है।
एल नीनो से लेकर सूरज की गर्मी तक, हटाया प्राकृतिक उतार-चढ़ाव का असर
जलवायु का मिजाज हर साल एक जैसा नहीं रहता। कभी अल नीनो के कारण प्रशांत महासागर की गर्मी वातावरण में पहुंचती है और तापमान बढ़ जाता है। कभी ज्वालामुखी विस्फोट से निकले कण सूर्य की किरणों को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते हैं, जिससे धरती कुछ ठंडी हो सकती है। सूर्य की गतिविधियों में बदलाव भी तापमान को प्रभावित करता है।
ऐसे प्राकृतिक बदलावों के बीच यह पता लगाना आसान नहीं होता कि धरती वास्तव में कितनी तेजी से गर्म हो रही है। इसीलिए वैज्ञानिकों ने तापमान के आंकड़ों से इन प्राकृतिक प्रभावों को गणितीय तरीकों से अलग करने की कोशिश की। इससे अस्थायी उतार-चढ़ाव का शोर कम हुआ और लंबे समय से चल रहे गर्मी के रुझान को समझना आसान हो गया।
2023 और 2024 की गर्मी भी नहीं थी पूरी कहानी
पिछले कुछ वर्षों में 2023 और 2024 ने गर्मी के रिकॉर्ड तोड़ दिए। सवाल उठा कि कहीं इन दो असाधारण वर्षों ने ही ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार को बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं दिखाया?
अध्ययन में इस पहलू की भी जांच की गई। अल नीनो और सूर्य की बढ़ी हुई गतिविधियों के प्रभाव को हटाने के बाद इन दोनों वर्षों का तापमान कुछ कम जरूर हुआ, लेकिन वे फिर भी आधुनिक तापमान रिकॉर्ड के सबसे गर्म साल बने रहे।
इतना ही नहीं, पांचों डेटासेट में 2013 या 2014 से ही तेजी के संकेत दिखाई देने लगे थे। इससे यह धारणा कमजोर पड़ती है कि तापमान में तेजी केवल 2023 और 2024 की असाधारण गर्मी का नतीजा है।
आखिर क्यों तेजी से तप रही है धरती?
यह अध्ययन तापमान बढ़ने की रफ्तार तो बताता है, लेकिन इसके पीछे के हर कारण की पहचान नहीं करता। वैज्ञानिकों के मुताबिक, हालिया तेजी जलवायु मॉडल में दिखाई देने वाली संभावित स्थितियों के अनुरूप है।
फिर भी एक बात साफ है कि जीवाश्म ईंधन यानी कोयला, तेल और गैस जलाने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण है। इस गैस के बढ़ते उत्सर्जन से वातावरण में गर्मी फंसती है और पृथ्वी का तापमान ऊपर जाता है।
2030 से पहले टूट सकती है 1.5 डिग्री की लक्ष्मण रेखा
इस अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू पेरिस जलवायु समझौते से जुड़ा है। दुनिया ने वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर के मुकाबले 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि पिछले दस वर्षों जैसी गर्मी बढ़ने की रफ्तार जारी रही, तो दुनिया 2030 से पहले ही इस सीमा को दीर्घकालिक आधार पर पार कर सकती है। हालांकि किसी एक साल का तापमान 1.5 डिग्री से ऊपर पहुंचना इस लक्ष्य के स्थायी रूप से टूटने के बराबर नहीं है। यह सीमा लंबे समय के औसत से तय होती है।
अब फैसला इंसान के हाथ में
धरती की बढ़ती तपिश अब केवल वैज्ञानिकों की रिपोर्ट या आंकड़ों का विषय नहीं रह गई है। इसका असर खेती, पानी, स्वास्थ्य, समुद्र के स्तर और मौसम की चरम घटनाओं पर पड़ता है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी साफ है- धरती कितनी तेजी से गर्म होगी, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया जीवाश्म ईंधन से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन को कितनी तेजी से कम करती है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि धरती कितनी गर्म हो चुकी है। असली सवाल है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे और गर्म होने से रोकने के वास्ते दुनिया कितनी जल्दी कदम उठाती है।