आर्कटिक और अंटार्कटिक में पिघलती बर्फ के नीचे हजारों वर्षों से जमे सूक्ष्मजीव अब तेजी से सक्रिय हो रहे हैं और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड व मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा रहे हैं।
मैकगिल यूनिवर्सिटी से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय समीक्षा में चेतावनी दी गई है कि पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से न सिर्फ “कार्बन बम” सक्रिय हो सकता है, बल्कि पारे जैसे जहरीले तत्व भी मुक्त होकर नदियों और खाद्य श्रृंखला में फैल सकते हैं।
निष्कर्ष संकेत देते हैं कि जलवायु संकट अब सतह से कहीं गहराई में आकार ले रहा है।
धरती के सबसे सर्द और शांत ध्रुवीय इलाकों में जमी बर्फ के नीचे एक अदृश्य हलचल तेज हो रही है, चिंता की बात है कि यह हलचल जलवायु परिवर्तन को और खतरनाक बना सकती है। मैकगिल यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि जैसे-जैसे आर्कटिक और अंटार्कटिक में जमा बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे वहां हजारों वर्षों से छिपे सूक्ष्मजीव (माइक्रोब्स) तेजी से सक्रिय हो रहे हैं।
इनकी बढ़ती गतिविधि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का प्रवाह बढ़ा रही है, जिससे वैश्विक तापमान में और इजाफा हो सकता है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि यह बदलाव जलवायु संकट को नई दिशा दे सकता है।
बर्फ पिघली, तो बढ़ी माइक्रोब्स की रफ्तार
अध्ययन के मुताबिक जैसे-जैसे ग्लेशियर, पर्माफ्रॉस्ट (जमी हुई मिट्टी) और समुद्री बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे इन ठंडे इलाकों में रहने वाले सूक्ष्मजीवों की गतिविधि तेज हो रही है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि तापमान बढ़ने से इन सूक्ष्म जीवों का चयापचय (मेटाबॉलिज्म) तेज हो जाता है, जिससे वे मिट्टी में जमे कार्बनिक पदार्थ को तेजी से तोड़ते हैं। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें वातावरण में पहुंच रही हैं, जो वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) को और तेज कर सकती हैं।
वैज्ञानिकों ने इस बात की भी आशंका जताई है कि पिघलती बर्फ में लम्बे समय से जमा पारे (मरकरी) जैसे जहरीले तत्व भी मुक्त हो सकते हैं। ये नदियों और खाद्य श्रृंखला के जरिए दूर-दराज के इलाकों तक फैल सकते हैं, जिससे मानव स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता स्कॉट सुग्डेन का इस बारे में कहना है, "ठंडे पारिस्थितिक तंत्रों में छिपी सूक्ष्म दुनिया अब तेजी से करवट ले रही है।"
उन्होंने आगाह किया कि, "इन बदलावों का असर केवल वैश्विक कार्बन चक्र तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव मानव समुदायों, खाद्य, आजीविका, और जहरीले तत्वों के फैलाव पर भी पड़ेगा। चिंता की बात है कि ये पारिस्थितिक तंत्र जितनी तेजी से बदल रहे हैं, उतनी तेजी से हम उन्हें समझ नहीं पा रहे हैं।“
अपनी इस समीक्षा में शोधकर्ताओं ने आर्कटिक, अंटार्कटिक, अल्पाइन और उप-आर्कटिक क्षेत्रों के दर्जनों अध्ययनों का विश्लेषण किया है। इनकी मदद से उन्होंने यह समझने का प्रयास किया है कि तापमान और पोषक तत्वों की उपलब्धता सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को कैसे प्रभावित कर रही है।
शोधकर्ताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में दो समान पैटर्न दिखाई दिए। जमे हुए वातावरण में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि भोजन और तापमान, दोनों से सीमित रहती है। लेकिन जैसे ही पर्माफ्रॉस्ट और जमा बर्फ पिघलती है और पानी के बहाव के साथ पोषक तत्व फैलने लगते हैं, ये सीमाएं सिकुड़ने लगती हैं।
इससे सूक्ष्मजीव अधिक सक्रिय हो जाते हैं, कार्बन चक्र की रफ्तार तेज होती है और मिट्टी में जमा प्रदूषक तत्व भी बाहर निकल सकते हैं। नतीजतन, कार्बन चक्र की रफ्तार बढ़ती है और दशकों से जमा कार्बन तेजी से वातावरण में पहुंचने लगता है।
ध्रुवों तक सीमित नहीं असर
वैज्ञानिकों के मुताबिक ये बदलाव सिर्फ ध्रुवीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेंगे। कार्बन उत्सर्जन, जहरीले तत्वों का प्रसार और पारिस्थितिक तंत्र में बदलाव का असर वैश्विक जलवायु, मानव समुदायों, आजीविका और आय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
समीक्षा में यह भी सामने आया है कि नतीजों को प्रभावित करने वाले कुछ अन्य कारक भी हैं। इनमें ऑक्सीजन की उपलब्धता और यह बात शामिल है कि पिघलने के बाद जमीन ज्यादा गीली होती है या सूखी। ये परिस्थितियां तय करती हैं कि सूक्ष्मजीवों का व्यवहार कैसा होगा और वे कितनी तेजी से सक्रिय होंगे।
हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि सूक्ष्मजीव जलवायु फीडबैक चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन ध्रुवीय माइक्रोबायोलॉजी का क्षेत्र अभी नया है। पिछले करीब 20 वर्षों के ही आधारभूत आंकड़े उपलब्ध हैं। ऐसे में लंबे समय के जलवायु प्रभावों का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है।
आंकड़ों की कमी से बढ़ी चुनौती
इसके अलावा, तीन बड़ी चुनौतियां सामने आई हैं, शोध अधिकतर उन्हीं क्षेत्रों में केंद्रित है जहां बुनियादी ढांचा मौजूद है, जबकि आर्कटिक और अंटार्कटिक के बड़े हिस्से अब भी बहुत कम अध्ययन किए गए हैं। इसके साथ ही चरम मौसम और सीमित रोशनी के कारण यहां सर्दियों में फील्डवर्क मुश्किल हो जाता है।
स्कॉट का कहना है, "दूसरे क्षेत्रों में हम किसी प्रजाति का रिकॉर्ड सैकड़ों साल पीछे तक देख सकते हैं, लेकिन यहां हमारे पास इतना लंबा इतिहास नहीं है। हमारे शुरुआती आंकड़े 2000 के दशक की शुरुआत से ही मिलते हैं।“
ऐसे में जलवायु पूर्वानुमानों को अधिक सटीक बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने वैश्विक निगरानी प्रयासों में बेहतर समन्वय की जरूरत बताई है। साथ ही उन्होंने आंकड़ों के संग्रह की किफायती और आसानी से उपलब्ध तकनीकों के ज्यादा इस्तेमाल पर जोर दिया है, ताकि ज्यादा और बेहतर जानकारी जुटाई जा सके।
ध्रुवीय बर्फ के नीचे चल रही यह अदृश्य हलचल साफ संकेत दे रही है कि जलवायु संकट अब सतह पर दिखने वाले बदलावों से कहीं गहरा है। ध्रुवीय क्षेत्रों में सक्रिय होते सूक्ष्मजीव इस बात का संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन रैखिक नहीं, बल्कि परस्पर जुड़े जटिल चक्रों का परिणाम है। इन चक्रों को समझे बिना भविष्य के जलवायु अनुमान अधूरे रह सकते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर रिव्यूज - माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।