राजस्थान सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष पेश अपनी रिपोर्ट में कहा है कि राज्य में पहचाने गए मीथेन ‘हॉटस्पॉट’ से होने वाले उत्सर्जन को रोकने और कम करने के लिए व्यापक स्तर पर एहतियाती, रेगुलेटरी और प्रशासनिक कदम उठाए गए हैं।
गौरतलब है कि एनजीटी ने 7 फरवरी 2024 को अंग्रेजी अखबार द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबर पर स्वतः संज्ञान लिया था। इस खबर में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग और इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन के अध्ययन के आधार पर चार राज्यों जिनमें राजस्थान भी शामिल है, में म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट लैंडफिल और तेल-गैस सुविधाओं से उच्च स्तर पर मीथेन उत्सर्जन की बात कही गई थी।
झुंझुनूं और चूरू में सख्त कार्रवाई
रिपोर्ट के मुताबिक, झुंझुनूं स्थित क्षेत्रीय कार्यालय ने तारानगर नगर पालिका और चिड़ावा नगर पालिका को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम और वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम के तहत विस्तृत और कड़े निर्देश जारी किए।
इन निर्देशों में स्रोत पर कचरे को अलग करना, नियमित एकत्र करना और वैज्ञानिक तरीके से इन्हें प्रोसेस करना शामिल है। साथ ही लम्बे समय से जमा पुराने कचरे (लीगेसी वेस्ट) की बायो-माइनिंग कर उसका सुरक्षित निपटान, तथा वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप लैंडफिल साइट विकसित करना शामिल है।
इसके साथ ही 23 मई 2024 को राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के झुंझुनूं कार्यालय ने तारानगर और चिड़ावा के शहरी निकायों को पत्र भेजकर 2016 ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुपालन पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी।
इसके जवाब में तारानगर नगर पालिका ने 28 मई 2024 को जानकारी दी कि उसने पुराने कचरे के निपटान की प्रक्रिया शुरू कर दी है। फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना की है और घर-घर कचरा एकत्र करने की व्यवस्था लागू की गई है। वहीं, चिड़ावा नगर पालिका ने भी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर नियमों के पालन संबंधी उठाए गए कदमों की जानकारी दी।
68 हजार टन से ज्यादा कचरा, बायो-माइनिंग जारी
30 मई 2024 को स्थानीय निकाय विभाग से कहा गया कि वह सभी संबंधित नगर निकायों को ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 का पूरी तरह पालन करने के निर्देश दे। साथ ही, जहां कचरा डालने के लिए नई लैंडफिल साइट या उससे जुड़ी सुविधाएं बनाई जानी हैं, वहां पहले जरूरी पर्यावरण मंजूरी लेना भी सुनिश्चित करे।
रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि 25 जून 2024 को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चिड़ावा (झुंझुनूं) और तारानगर (चूरू) के डंप साइटों का निरीक्षण किया। जांच में कचरे की मात्रा, ऊंचाई, बायो-माइनिंग की स्थिति, आग की घटनाएं, लीचेट प्रबंधन, वायु गुणवत्ता निगरानी और मीथेन की समीक्षा की गई।
जिला आकलन के मुताबिक, चिड़ावा डंपसाइट पर करीब 68,951 मीट्रिक टन पुराना कचरा जमा है। यहां मई 2024 से बायो-माइनिंग शुरू की गई है, जिसे जुलाई 2025 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था।
निरीक्षण में कमियां पाए जाने पर जुलाई 2024 में दोनों नगर पालिकाओं के कार्यकारी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। नोटिस में मीथेन गैस डिटेक्टर की कमी, वायु गुणवत्ता निगरानी का अभाव और वैज्ञानिक लैंडफिल विकसित न करने जैसी खामियों का उल्लेख किया गया।
बाड़मेर-बालोतरा और जैसलमेर पर भी निगरानी
बाड़मेर-बालोतरा क्षेत्र में भी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016, जल अधिनियम, वायु अधिनियम और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत बार-बार निर्देश जारी किए गए हैं। नगर परिषद बाड़मेर को एमएसडब्ल्यू साइट के लिए आवश्यक स्वीकृतियां लेने, वायु गुणवत्ता की निगरानी करने और उत्सर्जन कम करने के उपाय लागू करने को कहा गया है।
जैसलमेर में तेल और गैस परियोजनाओं को लेकर जिला रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 85 फीसदी मीथेन युक्त प्राकृतिक गैस को बंद पाइपलाइन के जरिए गैस आधारित थर्मल पावर प्लांट तक पहुंचाया जाता है।
पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाते हैं, जिससे गैस के रिसाव (फ्यूजिटिव मीथेन उत्सर्जन) को काफी हद तक रोका जा रहा है।
क्या हैं मीथेन हॉटस्पॉट?
संयुक्त समिति के आकलन के अनुसार, राजस्थान में मीथेन हॉटस्पॉट मुख्य रूप से चिड़ावा (झुंझुनूं) और तारानगर (चूरू) के नगर निगम डंपसाइट तथा बाड़मेर-बालोतरा क्षेत्र की तेल-गैस इकाइयों से जुड़े हैं। राज्य की ओर से 3 दिसंबर 2025 को यह रिपोर्ट तैयार की गई, जिसे 26 फरवरी 2026 को एनजीटी की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है।
कुल मिलाकर, राज्य सरकार का दावा है कि पहचाने गए मीथेन हॉटस्पॉट पर निगरानी, सुधार और जवाबदेही की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
हालांकि, असली परीक्षा इन निर्देशों के जमीन पर सख्ती से पालन और तय समयसीमा में बायो-माइनिंग व वैज्ञानिक लैंडफिल जैसे उपायों को पूरा करने में होगी, ताकि मीथेन उत्सर्जन पर स्थाई रूप से अंकुश लगाया जा सके।