समुद्र का बढ़ता जलस्तर अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि दुनिया के करोड़ों लोगों के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में समुद्र-स्तर बढ़ने की रफ्तार रिकॉर्ड 5.9 मिलीमीटर सालाना रही। दुनिया में करीब 77 करोड़ लोग ऐसे तटीय इलाकों में रहते हैं, जो ऊंचे ज्वार की सीमा से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। यानी हर दस में से करीब एक व्यक्ति सीधे खतरे की जद में है।
दक्षिण एशिया में संकट और गहरा है। मुंबई, कोलकाता और ढाका में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों पर स्थायी जलभराव और विस्थापन का जोखिम मंडरा रहा है।
रिपोर्ट चेताती है कि पर्याप्त अनुकूलन उपाय नहीं किए गए तो 2050 तक 120 करोड़ लोगों के विस्थापित होने का खतरा हो सकता है। बढ़ता समुद्र सिर्फ जमीन नहीं डुबोएगा, बल्कि घर, खेत, रोजगार, पेयजल, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित करेगा।
किसी परिवार के लिए यह घर छूटने, किसान के लिए उपजाऊ जमीन खोने और मछुआरे के लिए रोजी-रोटी खत्म होने का दर्द हो सकता है।
हालांकि समुद्र-स्तर में कुछ वृद्धि अब तय है, लेकिन उत्सर्जन में तेजी से कटौती और मजबूत जलवायु अनुकूलन से इसके विनाशकारी असर को सीमित किया जा सकता है।
समुद्र अब सिर्फ किनारों से टकराने वाली लहरों का नाम नहीं रह गया। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के साथ इसका बढ़ता स्तर दुनिया में करोड़ों लोगों के घरों, खेतों, आजीविका और भविष्य के लिए खतरे की घंटी बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र ने इस बारे में जारी अपनी नई रिपोर्ट में चेताया है कि समुद्र-स्तर मानव इतिहास में दर्ज किसी भी समय की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। इसका असर तटीय इलाकों से बहुत आगे तक जाएगा और स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, संस्कृति तथा मानवाधिकारों को प्रभावित कर सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में करीब 77 करोड़ लोग ऐसे तटीय इलाकों में रह रहे हैं, जो ज्वार के उच्च स्तर से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। यानी धरती पर हर दस में से करीब एक व्यक्ति समुद्र-स्तर बढ़ने के कारण खतरे की जद में है। गौरतलब है कि दुनिया भर में समुद्र के बढ़ते स्तर को लेकर आगाह करती यह विशेष रिपोर्ट 31 अगस्त को पलाऊ में आयोजित 55वीं पैसिफिक आइलैंड्स फोरम लीडर्स मीटिंग में पेश की गई।
रिपोर्ट में समुद्र-स्तर बढ़ने को अब दूर का खतरा नहीं, बल्कि तेजी से सामने आ रहा वैश्विक संकट बताया गया है।
एक अध्ययन से पता चला है कि यदि समुद्र का जलस्तर महज 0.5 मीटर भी बढ़ता है, तो इसकी वजह से करीब 30 लाख इमारतें पानी में डूब सकती हैं। वहीं यदि यह स्तर पांच मीटर या उससे ज्यादा बढ़ गया, तो यह खतरा कई गुना बढ़ जाएगा। ऐसी स्थिति में 10 करोड़ से अधिक इमारतें खतरे में आ सकती हैं।
2024 में समुद्र-स्तर के बढ़ने की रफ्तार सबसे ज्यादा
वैज्ञानिकों के मुताबिक समुद्र-स्तर के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह धरती का लगातार गर्म होना है। बढ़ते तापमान से ग्लेशियर और विशाल हिम-चादरें पिघल रही हैं। साथ ही, गर्म होने पर समुद्री पानी फैलता है और अधिक जगह घेरता है। इन दोनों प्रक्रियाओं से समुद्र का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है।
रिपोर्ट में साझा रुझानों में सामने आया है कि 2014 से 2023 के बीच वैश्विक स्तर पर समुद्र-स्तर औसतन 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ा, जबकि 2024 में यह रफ्तार करीब 5.9 मिलीमीटर रही। यह अब तक दर्ज समुद्र स्तर में होने वाली सबसे तेज वार्षिक वृद्धि है।
यानी समुद्र की सतह धीरे-धीरे नहीं, बल्कि बढ़ती रफ्तार के साथ ऊपर उठ रही है। इसका मतलब यह भी है कि जिन तटीय इलाकों को आज सुरक्षित माना जा रहा है, वहां आने वाले वर्षों में बाढ़ और जलभराव का खतरा तेजी से बढ़ सकता है।
खतरे में मुंबई, कोलकाता और ढाका में 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग
रिपोर्ट में सामने आया है कि दक्षिण एशिया के लिए यह खतरा कहीं ज्यादा गंभीर है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, कोलकाता और मुंबई जैसे भारतीय शहरों तथा ढाका में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के घरों पर स्थाई जलभराव के कारण प्रभावित होने का तत्काल जोखिम है।
इन शहरों में समुद्र-स्तर बढ़ने का मतलब केवल समुद्र का पानी शहर में घुसना नहीं है। इससे घर, सड़कें, रेलवे, बिजली व्यवस्था, अस्पताल, पेयजल स्रोत और सीवेज सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं।
बेंगलुरू स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (सीएसटीईपी) ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि समुद्र का बढ़ता जल स्तर 2040 तक मुंबई में 13.1 फीसदी से अधिक जमीन को निगल लेगा। मतलब कि यदि उत्सर्जन पर लगाम न लगाई गई तो समुद्र के बढ़ते जलस्तर की वजह से मुंबई में करीब 830 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पानी में डूब जाएगा।
वहीं सदी के अंत तक यह आंकड़ा बढ़कर 1,377.13 वर्ग किलोमीटर (21.8 फीसदी) तक पहुंच सकता है। ऐसा ही कुछ दूसरे तटीय शहरों के मामले में भी देखने को मिलेगा।
रिपोर्ट में अंदेशा जताया गया है कि अगले 16 वर्षों में चेन्नई का 7.3 फीसदी (86.8 वर्ग किलोमीटर) हिस्सा पानी में डूबा होगा। यह क्षेत्र सदी के अंत तक बढ़कर 18 फीसदी (215.77 वर्ग किलोमीटर) से ज्यादा हो जाएगा। इसी तरह 2040 तक यनम और थूथुकुड़ी में करीब दस फीसदी हिस्सा पानी में डूब जाएगा।
पणजी और चेन्नई में यह आंकड़ा पांच से दस फीसदी के बीच रहने का अंदेशा है। वहीं समुद्र का बढ़ता जलस्तर कोच्चि, मैंगलोर, विशाखापत्तनम, हल्दिया, उडुपी, पारादीप और पुरी में एक से पांच फीसदी जमीन को निगल सकता है।
ऐसे में लाखों लोगों को अपने घर और रोजी-रोटी छोड़कर दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
दक्षिण एशिया की चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यहां हिमालयी ग्लेशियर तेजी से बदल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने हिमालय को दुनिया के ‘थर्ड पोल’ के रूप में रेखांकित करते हुए चेताया है कि आने वाले वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने से पहले बाढ़ और बाद में सूखे का खतरा बढ़ सकता है। इसका सीधा असर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा।
2050 तक 120 करोड़ लोगों के विस्थापित होने का खतरा
समुद्र-स्तर बढ़ने का सबसे दर्दनाक असर लोगों के विस्थापन के रूप में सामने आ सकता है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, यदि अनुकूलन के पर्याप्त उपाय नहीं किए गए तो 2050 तक 120 करोड़ लोगों पर विस्थापन का खतरा मंडरा सकता है।
चिंता की बात है कि प्रशांत महासागर के कई छोटे द्वीपीय देशों में इसका असर पहले ही दिखाई देने लगा है। कुछ समुदाय अपने घर और पुश्तैनी जमीन छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने की तैयारी कर रहे हैं।
यह सिर्फ जमीन खोने की कहानी नहीं है। जब कोई परिवार अपनी जमीन छोड़ता है तो उसके साथ उसका घर, रोजगार, समुदाय, संस्कृति और पीढ़ियों से जुड़ी यादें भी पीछे छूट जाती हैं। कई वनवासी और द्वीपीय समुदायों के लिए यह उनकी पहचान और अपनी पुश्तैनी भूमि से रिश्ता खोने का संकट भी है।
खतरा सिर्फ समुद्र किनारे रहने वालों तक सीमित नहीं
समुद्र-स्तर बढ़ने का असर तटों से कहीं आगे तक पहुंच सकता है। समुद्री बाढ़ से पेयजल स्रोतों में खारापन बढ़ सकता है, खेती की जमीन खराब हो सकती है और अस्पतालों, स्कूलों तथा स्वच्छता प्रणालियों को नुकसान पहुंच सकता है।
इसी तरह बाढ़ और दूषित पानी से बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। वहीं लंबे समय तक असुरक्षा और विस्थापन का लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ सकता है।
मत्स्य पालन और पर्यटन पर निर्भर समुदायों के लिए संकट और बड़ा है। समुद्र तटों के क्षरण से पर्यटन प्रभावित होगा, जबकि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव मछुआरों की आजीविका को नुकसान पहुंचा सकता है।
यूरोप में भी तेजी से बढ़ रहा खतरा
समुद्र-स्तर बढ़ने का असर केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है। यूरोप के कई तटीय इलाकों में भी समुद्री बाढ़ का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
उदाहरण के लिए जर्मनी की करीब 70 फीसदी तटरेखा तटीय कटाव के कारण पीछे खिसकने के खतरे में है। फ्रांस के रिवेरा क्षेत्र के छोटे रेतीले समुद्र तट 19वीं सदी के अंत से अब तक करीब 50 फीसदी क्षेत्रफल खो चुके हैं।
इसी तरह भूमध्यसागर और अटलांटिक तट के कई इलाकों में 2050 से पहले हर 100 साल में एक बार आने वाली चरम तटीय बाढ़ की घटनाएं करीब 10 गुणा तक बढ़ सकती हैं।
यूनाइटेड किंगडम में सदी के अंत तक समुद्र-स्तर के एक मीटर से अधिक बढ़ने की आशंका जताई गई है। इंग्लैंड में इस सदी के मध्य तक चार में से एक संपत्ति नदी, समुद्र या सतही जल से जुड़ी बाढ़ के जोखिम वाले क्षेत्र में हो सकती है।
तटीय बुनियादी ढांचे पर 1.8 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का खतरा
समुद्र-स्तर बढ़ने की आर्थिक कीमत भी बेहद भारी हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, दुनिया भर में कम से कम 1.8 ट्रिलियन डॉलर की बुनियादी ढांचा इससे जुड़े जोखिमों के दायरे में है।
बंदरगाहों पर भी खतरा बढ़ रहा है। दुनिया के 80 फीसदी से अधिक व्यापार को संभालने वाले बंदरगाह बाढ़ और बढ़ते समुद्री-स्तर के जोखिम का सामना कर रहे हैं। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और व्यापार प्रभावित हो सकता है। अमेरिका के मियामी और न्यूयॉर्क तथा चीन के ग्वांगझोउ जैसे बड़े शहरों में तटीय बुनियादी ढांचे की खतरे में पड़ी संपत्ति का मूल्य 2 से 3.5 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया है।
कैरेबियाई देशों के लिए खतरा और गंभीर है। वहां पर्यटन, अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है और 2050 तक करीब 40 फीसदी समुद्र तटों के गायब होने का खतरा है।
क्या समुद्र-स्तर को बढ़ने से रोका जा सकता है?
अब सवाल यह है कि क्या समुद्र के इस बढ़ते स्तर को रोका जा सकता है। सच कहें तो इसे पूरी तरह रोक पाना मुमकिन नहीं। समुद्र-स्तर में कुछ वृद्धि अब लगभग तय हो चुकी है। लेकिन भविष्य में यह कितनी बढ़ेगी और इसका नुकसान कितना व्यापक होगा, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि दुनिया ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कितनी तेजी से कटौती करती है।
अंटार्कटिका की बर्फीली चादरें इस संकट का सबसे बड़ा अनिश्चित पहलू हैं। वैज्ञानिकों की नजर खास तौर पर थ्वाइट्स ग्लेशियर पर है। इसमें बड़े बदलाव होने पर समुद्र-स्तर में लंबे समय में बेहद गंभीर और मुश्किल से पलटे जा सकने वाले बदलाव आ सकते हैं।
इसलिए अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि समुद्र कितना बढ़ेगा। सवाल यह भी है कि दुनिया इसके लिए कितनी जल्दी तैयार होती है।
समाधान के 18 सुझाव
संयुक्त राष्ट्र ने इस संकट से निपटने के लिए सदस्य देशों के सामने 18 सिफारिशें रखी हैं। इनमें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती, बेहतर चेतावनी प्रणाली, जलवायु अनुकूलन के लिए अधिक वित्तीय सहायता, वैज्ञानिक आंकड़ों और निगरानी को मजबूत करना तथा जोखिम वाले समुदायों की मदद करना शामिल है।
तटीय इलाकों में समुद्री दीवारें बनाने के साथ-साथ मैन्ग्रोव और रेत के टीलों का संरक्षण भी जरूरी है। जहां खतरा बहुत अधिक हो, वहां लोगों को आपदा आने के बाद नहीं, बल्कि पहले से सुरक्षित स्थानों पर योजनाबद्ध तरीके से बसाने की जरूरत होगी।
विकासशील देशों के लिए जलवायु अनुकूलन की लागत बहुत बड़ी है, जबकि उपलब्ध वित्तीय सहायता अभी बेहद कम है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जलवायु वित्त बढ़ाने पर जोर दिया है।
अब हमारे हाथ में है फैसला
देखा जाए तो बढ़ता समुद्र-स्तर अब कई दूर की कौड़ी नहीं। यह आज तटीय शहरों और द्वीपीय समुदायों के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। हमे समझना होगा कि बढ़ते समुद्र-स्तर का असर सिर्फ नक्शे पर बदलती जमीन तक सीमित नहीं, यह लोगों की जिंदगी और उनके भविष्य को भी बदल रहा है।
किसी परिवार के लिए इसका मतलब अपना घर खोना हो सकता है, किसी किसान के लिए खेतों में बढ़ता खारापन और फसल का नुकसान, तो किसी मछुआरे के लिए रोजी-रोटी के साधनों का खत्म होना। वहीं, पूरे समुदायों को सदियों पुरानी जमीन, संस्कृति और अपनी पहचान से बिछड़ने का दर्द झेलना पड़ सकता है। समुद्र का बढ़ता पानी सिर्फ जमीन नहीं डुबोता, वह लोगों के घर, सपने और पीढ़ियों से जुड़ी उनकी जड़ों को भी अपने साथ बहा सकता है।
ऐसे में भले ही समुद्र-स्तर में वृद्धि को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं हो सकता, लेकिन इसके विनाशकारी असर को सीमित करना अभी भी हमारे हाथ में है। इसके लिए उत्सर्जन में कटौती के साथ-साथ तटीय समुदायों को सुरक्षित बनाने, जलवायु अनुकूलन के लिए पर्याप्त पैसा जुटाने और सबसे कमजोर लोगों की रक्षा करने की जरूरत है।