पांच देशों के सर्वे में 73 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी जटिलताएं बढ़ने की बात कही।
76 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने बताया कि अत्यधिक गर्मी भ्रूण और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर बढ़ता असर डाल रही है।
गर्मी से समयपूर्व प्रसव, कम वजन, मृतजन्म, पानी की कमी और नवजातों में सांस संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
92 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने गर्मी के दौरान गर्भवती महिलाओं और नवजातों की बेहतर देखभाल के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण मांगा।
विशेषज्ञों ने सरकारों से मातृ-नवजात स्वास्थ्य को जलवायु योजनाओं में शामिल करने और गर्मी से बचाव के उपाय मजबूत करने की अपील की।
दुनिया में बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम की परेशानी नहीं रह गई है। इसका असर गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सेहत पर भी साफ दिखाई देने लगा है। एक नए सर्वे में पांच देशों के स्वास्थ्यकर्मियों ने बताया है कि पिछले पांच वर्षों में उन्होंने गर्मी से जुड़ी गर्भावस्था और नवजात स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में बढ़ोतरी देखी है।
भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, ब्रिटेन और जिम्बाब्वे में 1,000 स्वास्थ्यकर्मियों के बीच किए गए इस सर्वे में 73 प्रतिशत ने कहा कि गर्भवती महिलाओं में गर्मी से जुड़ी बीमारियों और जटिलताओं के मामले बढ़े हैं। वहीं, 76 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने भ्रूण और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर गर्मी के बढ़ते असर की बात कही।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि करीब 98 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने ऐसी गर्भवती महिला का इलाज किया है, जिसकी सेहत पर अत्यधिक गर्मी का प्रतिकूल असर उन्हें दिखाई दिया। 99 प्रतिशत ने ऐसे नवजात की देखभाल की, जिसके स्वास्थ्य को गर्मी से नुकसान पहुंचने का उन्हें संदेह था।
वहीं संयुक्त राष्ट्र जलवायु प्रमुख साइमन स्टील ने चेतावनी देते हुए कहा है कि अत्यधिक गर्मी से गर्भवती महिलाओं और नवजातों पर खतरा बढ़ रहा है।
गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी असर
गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई बदलाव होते हैं। ऐसे में बहुत अधिक तापमान शरीर के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है। शोध में पहले ही गर्मी के संपर्क को समय से पहले प्रसव, कम वजन वाले बच्चे और मृतजन्म जैसे जोखिमों से जोड़ा जा चुका है।
2024 में प्रकाशित महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययनों की समीक्षा के अनुसार, तापमान के संपर्क में हर एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी के साथ समय से पहले प्रसव की संभावना करीब पांच प्रतिशत बढ़ सकती है। हीटवेव के दौरान प्रसूति संबंधी जटिलताओं का जोखिम भी लगभग 25 प्रतिशत अधिक पाया गया है।
नए सर्वे में करीब 23 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने ऐसी गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं देखीं, जिनके लिए अतिरिक्त निगरानी या इलाज की जरूरत पड़ी और उन्हें इसका संबंध अत्यधिक गर्मी से लगा।
नवजातों के लिए भी मुश्किलें बढ़ीं
गर्मी का असर सिर्फ गर्भ में पल रहे बच्चे तक सीमित नहीं है। जन्म के बाद भी नवजातों को शरीर का तापमान नियंत्रित करने में परेशानी हो सकती है। सर्वे में 34 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने कम वजन या बच्चे के विकास में कमी जैसे मामले देखे। करीब 36 प्रतिशत ने नवजातों में पानी की कमी और गर्मी से जुड़ी बीमारियां देखीं। वहीं 33 प्रतिशत ने दूध पीने, सांस लेने और शरीर का तापमान सामान्य रखने में दिक्कत की जानकारी दी।
गर्मी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में भी बाधा बन रही है। करीब 27 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि अत्यधिक गर्मी के कारण गर्भवती महिलाओं और परिवारों के लिए अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। 29 प्रतिशत ने आपातकालीन मामलों में बढ़ोतरी देखी।
डॉक्टर और दाइयां भी चाहते हैं ज्यादा तैयारी
स्वास्थ्यकर्मियों की चिंता केवल मरीजों तक सीमित नहीं है। करीब 81 प्रतिशत का मानना है कि यदि अभी पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो अगले पांच वर्षों में गर्मी मां, भ्रूण और नवजातों के लिए और बड़ा खतरा बन सकती है।
करीब 92 प्रतिशत स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा कि उन्हें अत्यधिक गर्मी के दौरान गर्भवती महिलाओं की बेहतर देखभाल के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण और संसाधनों की जरूरत है। 55 प्रतिशत ने स्पष्ट राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों की मांग की।
शोध पत्र में कहा गया है कि अत्यधिक गर्मी का असर अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बढ़ते तापमान के बीच गर्भवती महिलाओं और नवजातों को विशेष सुरक्षा देने की जरूरत है।
समाधान मुश्किल नहीं, जरूरत है सही तैयारी की
शोध पत्र में शोधकर्ता का कहना है कि कई देशों में गर्मी से बचाव के व्यावहारिक उपाय पहले से अपनाए जा रहे हैं। इनमें समय रहते चेतावनी जारी करना, अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों को ठंडा रखना और समुदायों तक मौसम संबंधी जानकारी पहुंचाना शामिल है।
जिम्बाब्वे और दक्षिण अफ्रीका में चल रहे एचएपीआई अध्ययन में हाथ से चलने वाले पंखे, स्वास्थ्य केंद्रों की छतों पर गर्मी परावर्तित करने वाला पेंट और स्थानीय स्तर पर जलवायु सूचना प्रणाली जैसे उपायों की जांच की जा रही है।
शोध में सरकारों से मांग की गई है कि जलवायु और स्वास्थ्य से जुड़ी योजनाओं में गर्भवती महिलाओं, नई माताओं और नवजात शिशुओं को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन से गर्मी, गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि के लिए पहली क्लिनिकल गाइडलाइन तैयार करने की अपील की गई है।
बढ़ती गर्मी की यह कहानी सिर्फ तापमान के आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उन मांओं और बच्चों की कहानी है, जिनकी सेहत पर बदलता मौसम सीधा असर डाल रहा है। आने वाले वर्षों में तापमान बढ़ता है या नहीं, यह हमारे नियंत्रण में पूरी तरह नहीं है, लेकिन गर्मी से सबसे कमजोर लोगों को बचाने की तैयारी जरूर हमारे हाथ में है।