नई रिसर्च में खुलासा, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान भविष्य में आत्महत्या के खतरे को बढ़ा सकता है। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

बढ़ती गर्मी से बढ़ सकता है आत्महत्या का खतरा, जलवायु परिवर्तन पर नई रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन का नया खतरा: बढ़ती गर्मी से दुनिया के कई हिस्सों में तापमान से जुड़ी आत्महत्या की घटनाएं बढ़ने की आशंका, शोध में सामने आई चिंता।

Dayanidhi

  • नई रिसर्च में खुलासा, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान भविष्य में आत्महत्या के खतरे को बढ़ा सकता है।

  • 26 देशों के 751 स्थानों पर अध्ययन, गर्मी और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध पर वैज्ञानिकों ने जताई चिंता।

  • 2050 तक बढ़ सकती हैं तापमान से जुड़ी आत्महत्या की घटनाएं, शोधकर्ताओं ने जलवायु तैयारी पर दिया जोर।

  • गर्म मौसम का असर अब मानसिक स्वास्थ्य पर भी, कमजोर लोगों के लिए बढ़ सकती है गंभीर चुनौती।

  • जलवायु संकट का नया खतरा सामने आया, वैज्ञानिकों ने गर्मी से जुड़े आत्महत्या जोखिमों को समझने की जरूरत बताई।

जलवायु परिवर्तन का असर अब इंसानों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे रहा है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में दावा किया गया है कि दुनिया में बढ़ते तापमान के साथ तापमान से जुड़ी आत्महत्याओं का खतरा बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में बढ़ती गर्मी मानसिक तनाव और कमजोर लोगों के लिए गंभीर समस्या बन सकती है।

जापान के टोक्यो विश्वविद्यालय सहित कई देशों के शोधकर्ताओं की टीम ने यह अध्ययन किया है। शोध को नेचर मेंटल हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इसमें 26 देशों के 751 स्थानों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के अलग-अलग अनुमानित हालातों के आधार पर साल 2050 के आसपास गर्मी से जुड़ी आत्महत्या मृत्यु दर में संभावित बदलावों का अध्ययन किया।

गर्म मौसम और मानसिक दबाव का संबंध

पिछले कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि बहुत अधिक गर्मी और आत्महत्या के खतरे के बीच संबंध हो सकता है। नए अध्ययन में भी शोधकर्ताओं ने पाया कि तापमान बढ़ने पर कुछ क्षेत्रों में आत्महत्या की घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है

शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि भविष्य में बढ़ता तापमान लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर किस तरह असर डाल सकता है। शोधकर्ताओं ने 2010 के दशक के आंकड़ों की तुलना करते हुए भविष्य की संभावित स्थिति का अनुमान लगाया। अध्ययन के अनुसार, तापमान में वृद्धि के साथ कई क्षेत्रों में गर्मी से जुड़ी आत्महत्या मृत्यु दर बढ़ने की संभावना है।

सही आंकड़े जुटाना रहा बड़ी चुनौती

शोधकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती आत्महत्या से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े जुटाना थी। दुनिया के कई देशों में आत्महत्या की घटनाओं का सही रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। खासकर गरीब और विकासशील देशों में ऐसी मौतों की जानकारी अक्सर दर्ज नहीं हो पाती।

अफ्रीका और मध्य पूर्व के ज्यादातर हिस्सों को अध्ययन में शामिल नहीं किया जा सका क्योंकि वहां पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। इसके अलावा, सामाजिक डर और आत्महत्या से जुड़े कलंक के कारण कई मामलों की सही जानकारी सामने नहीं आ पाती। इसके बावजूद वैज्ञानिकों का कहना है कि उपलब्ध आंकड़े भविष्य के खतरे को समझने के लिए महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।

अलग-अलग देशों में अलग असर

अध्ययन में यह भी पाया गया कि हर क्षेत्र में गर्मी का असर एक जैसा नहीं है। कुछ जगहों पर तापमान बढ़ने के साथ आत्महत्या का खतरा ज्यादा बढ़ा, जबकि कुछ क्षेत्रों में इसका असर कम दिखाई दिया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका कारण लोगों की गर्मी के प्रति अनुकूलन क्षमता, जीवनशैली और समाज की तैयारी हो सकती है। पूर्वी एशिया जैसे क्षेत्रों में लोग लंबे समय से गर्म और नम मौसम का सामना करते आए हैं, इसलिए वहां के लोगों में गर्मी से निपटने की क्षमता अधिक हो सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अंतर को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।

गर्मी को केवल पर्यावरण नहीं, स्वास्थ्य का मुद्दा भी मानना होगा

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन को अब केवल पर्यावरण की समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता। बढ़ता तापमान शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है।

हालांकि शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया है कि अध्ययन तापमान और आत्महत्या के बीच संबंध दिखाता है, यह साबित नहीं करता कि गर्मी ही आत्महत्या का सीधा कारण है। आत्महत्या एक जटिल समस्या है, जिसमें मानसिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियां और व्यक्तिगत कारणों की बड़ी भूमिका होती है। फिर भी, गर्म मौसम कुछ लोगों में तनाव, बेचैनी और मानसिक दबाव बढ़ाने वाला कारक बन सकता है।

भविष्य की तैयारी पर जोर

शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना जरूरी होगा। गर्मी से प्रभावित लोगों की पहचान, समुदाय स्तर पर सहायता और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तरह के अध्ययन सरकारों और स्वास्थ्य संस्थानों को ऐसी नीतियां बनाने में मदद करेंगे, जिनसे जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ने वाले मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सके और कमजोर लोगों की बेहतर सुरक्षा की जा सके।