अध्ययन ने बताया कि हर शहर का मौसम अलग दिशा में बदल रहा है, इसलिए स्थानीय जलवायु योजना जरूरी है।  फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

120 सालों में भारत के 63 शहरों में बदला बारिश का पैटर्न: नए शोध के चौंकाने वाले खुलासे

भारत के 63 शहरों में 120 साल में बारिश के बदलते पैटर्न, कहीं अचानक बाढ़, कहीं सूखा, जलवायु में बदलाव का खतरा बढ़ा

Dayanidhi

  • आईआईटी हैदराबाद और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के अध्ययन में 120 वर्षों में भारत के 63 शहरों की बारिश बदली।

  • शोध में पाया गया कि 1950 से 1970 के बीच बारिश के पैटर्न में सबसे बड़े और अचानक बदलाव आए।

  • कुछ शहरों में अत्यधिक भारी बारिश बढ़ी, जिससे शहरी बाढ़ का खतरा तेजी से और गंभीर रूप से बढ़ा है।

  • कई तटीय शहरों में मानसून और सालाना बारिश में गिरावट दर्ज हुई, जिससे जल संकट और सूखे की आशंका बढ़ गई है।

  • अध्ययन ने बताया कि हर शहर का मौसम अलग दिशा में बदल रहा है, इसलिए स्थानीय जलवायु योजना जरूरी है।

भारतीय शहरों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण के साथ-साथ मौसम भी लगातार बदलता जा रहा है। हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया है, जिसमें उन्होंने पाया कि पिछले 120 वर्षों में भारत के 63 बड़े शहरों में बारिश के पैटर्न में बड़े और अलग-अलग बदलाव आए हैं।

यह अध्ययन 1901 से 2022 तक के रोजमर्रा के बारिश के आंकड़ों पर आधारित है। शोध से पता चलता है कि कुछ शहरों में भारी बारिश अचानक बढ़ गई है, जबकि कुछ जगहों पर कुल बारिश कम होती जा रही है।

बारिश के बदलते पैटर्न और चार अलग-अलग प्रकार

शोधकर्ताओं ने बताया कि भारतीय शहरों में बारिश के बदलाव एक जैसे नहीं हैं। उन्हें चार अलग-अलग प्रकार के पैटर्न मिले हैं। कुछ शहरों में अचानक और तेज बारिश की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।

वहीं कुछ शहरों में सालाना और मानसून की बारिश में लगातार गिरावट देखी गई है, जिससे पानी की कमी और सूखे की स्थिति बन सकती है। इसका मतलब यह है कि एक ही क्षेत्र के पास-पास के शहरों में भी मौसम का असर अलग-अलग तरीके से हो रहा है।

कब आए सबसे बड़े बदलाव

अर्बन क्लाइमेट नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि सबसे बड़े बदलाव 1950 के दशक से 1970 के दशक के बीच हुए थे। इसी समय बारिश के पैटर्न में अचानक बदलाव देखने को मिला। उदाहरण के लिए, पश्चिमी तटीय क्षेत्रों के कई शहरों में मानसून की बारिश में कमी आई है। इससे वहां पानी की उपलब्धता पर असर पड़ा है। दूसरी ओर, बेंगलुरु जैसे शहरों में हाल के वर्षों में बहुत तेज और भारी बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे शहरी बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।

नई तकनीक से किया गया विश्लेषण

इस शोध में वैज्ञानिकों ने पुराने तरीकों के बजाय नई सांख्यिकीय तकनीकों का इस्तेमाल किया। उन्होंने “चेंज-पॉइंट एनालिसिस” नामक तकनीक का उपयोग किया, जिससे यह पता लगाया गया कि मौसम में बदलाव किस साल अचानक हुआ। इसके अलावा, उन्होंने 30 से 55 साल के “मूविंग विंडो” का उपयोग किया, यानी समय को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर बदलावों को समझा गया। इससे यह साफ हो सका कि बारिश के पैटर्न समय के साथ कैसे बदलते रहे हैं।

शहरों के हिसाब से अलग-अलग खतरे

शोध में यह भी सामने आया कि हर शहर की स्थिति अलग है। कुछ शहरों में भारी बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे जलभराव और बाढ़ का खतरा है। वहीं कुछ शहर धीरे-धीरे सूखे की ओर बढ़ रहे हैं। इसका मतलब यह है कि पूरे देश के लिए एक जैसी नीति काम नहीं कर सकती। हर शहर की जरूरत और जोखिम अलग-अलग हैं।

पुरानी सोच पर सवाल और नई समझ

पहले वैज्ञानिक लंबे समय के औसत निकालकर मौसम का अनुमान लगाते थे। लेकिन इस नए अध्ययन ने बताया कि यह तरीका कई बार सही तस्वीर नहीं दिखाता। बारिश के पैटर्न कुछ दशकों तक बदल सकते हैं और फिर फिर से बदल सकते हैं। इसलिए केवल औसत आंकड़ों पर भरोसा करना अब पर्याप्त नहीं है।

अध्ययन की सीमाएं और चुनौतियां

वैज्ञानिकों ने यह भी माना है कि इस अध्ययन में इस्तेमाल किए गए आंकड़े बड़े ग्रिड में बारिश को औसत करते हैं, जिससे छोटे स्तर पर होने वाली बहुत तेज बारिश की घटनाएं पूरी तरह नहीं दिख पातीं। इसके अलावा, शहरों की मौजूदा सीमाओं के आधार पर विश्लेषण किया गया है, जबकि पिछले 100 वर्षों में शहरों का विस्तार काफी बदल चुका है। इसका असर स्थानीय मौसम पर भी पड़ सकता है, जिसे पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है।

भविष्य के लिए संकेत और जरूरतें

यह अध्ययन शहरी योजनाकारों के लिए एक अहम संकेत देता है कि अब मौसम को स्थिर मानकर योजना नहीं बनाई जा सकती। शहरों को बदलते मौसम के अनुसार खुद को ढालना होगा। कहीं पर जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करना होगा, तो कहीं पानी बचाने की नीतियों को बढ़ाना होगा। अगर समय रहते इन बदलावों को समझ लिया जाए, तो भविष्य में बाढ़ और सूखे जैसी समस्याओं से लाखों लोगों को बचाया जा सकता है।