2025 में वैश्विक ऊर्जा से जुड़ा कार्बन उत्सर्जन भले ही धीमी दर से बढ़ा, लेकिन 3,840 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर ने यह साफ कर दिया कि जलवायु संकट अभी भी गहराता जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक विकास और उत्सर्जन के बीच दूरी बनने लगी है, फिर भी कुल उत्सर्जन में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी हुई है।
इस पर मौसम का बड़ा असर दिखा, जहां विकसित देशों में कड़ाके की सर्दी ने गैस की खपत बढ़ाई, वहीं भारत ने अनुकूल मौसम, समय से पहले मानसून और अक्षय ऊर्जा के विस्तार के दम पर राहत की तस्वीर पेश की, जहां कोयले की खपत में कमी से उत्सर्जन में गिरावट दर्ज हुई।
हालांकि, वैश्विक स्तर पर मौसमीय उतार-चढ़ाव, सूखा और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता अब भी उत्सर्जन बढ़ा रहे हैं। संकेत साफ है, रफ्तार धीमी होना पर्याप्त नहीं, अब तेज और ठोस कदम ही भविष्य बचा सकते हैं।
हर गुजरते साल के साथ धरती पर कार्बन का दबाव और गहरा रहा है, ऐसा ही कुछ 2025 में भी देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया है कि भले ही पिछले साल ऊर्जा संबंधी उत्सर्जन में बढ़ोतरी की रफ्तार घटकर करीब 0.4 फीसदी रह गई, जो 2021 के बाद सबसे कम है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है।
रुझानों से पता चला है कि 2025 में ऊर्जा उत्सर्जन करीब 14.5 करोड़ टन के उछाल के साथ 3,840 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह 2019 से करीब पांच फीसदी अधिक है।
इसी दौरान वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) की मात्रा भी बढ़कर 427 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम) तक पहुंच गई। यह 2024 के मुकाबले 2.4 पीपीएम और औद्योगिक काल से पहले की तुलना में करीब 50 फीसदी अधिक है।
यह आंकड़े साफ तौर पर इशारा कर रहे हैं कि भले ही उत्सर्जन में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी हुई हो, लेकिन धरती पर कार्बन का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। मतलब हम धीरे-धीरे सही दिशा में बढ़ने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन मंजिल अभी भी बहुत दूर है।
‘ग्लोबल एनर्जी रिव्यू 2026’ में सामने आया है कि ईंधन जलने से होने वाला उत्सर्जन 2025 में 0.5 फीसदी (करीब 18.5 करोड़ टन) बढ़ा है। वहीं औद्योगिक प्रक्रियाओं से होने वाले उत्सर्जन में करीब दो फीसदी (करीब चार करोड़ टन) की गिरावट दर्ज की गई, जिससे कुल बढ़ोतरी कुछ हद तक संतुलित रही।
विकास बढ़ा, उत्सर्जन धीमा—लेकिन खतरा कायम
राहत की बात यह रही कि 2025 में वैश्विक अर्थव्यवस्था 3.1 फीसदी बढ़ी, लेकिन उत्सर्जन में बढ़ोतरी की रफ्तार उससे काफी कम रही। यह इस बात का संकेत है कि अब विकास और प्रदूषण का रिश्ता धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। लेकिन सच यह भी है कि डेढ़ डिग्री की सीमा के करीब “कम बढ़ोतरी” भी अब “ज्यादा खतरा” बन चुकी है।
2025 में एक अहम बदलाव यह रहा कि करीब 30 वर्षों में पहली बार ऊर्जा संबंधी उत्सर्जन विकसित देशों में ज्यादा तेजी से बढ़ा, जबकि विकासशील देशों में इसकी रफ्तार धीमी रही। इस दौरान विकसित अर्थव्यवस्थाओं में उत्सर्जन के बढ़ने की रफ्तार करीब 0.5 फीसदी रही, जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में यह बढ़ोतरी घटकर 0.3 फीसदी रह गई।
इस दौरान जहां चीन में ऊर्जा से जुड़ा उत्सर्जन करीब 0.5 फीसदी घटा। इसकी वजह अक्षय ऊर्जा पर जोर, बिजली की मांग में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि और सीमेंट-स्टील उत्पादन में कमी रही। हालांकि, केमिकल उद्योग में बढ़ोतरी ने इस गिरावट को कुछ हद तक संतुलित कर दिया।
चीन में गिरावट, भारत से राहत
चीन को छोड़कर अन्य विकासशील देशों में उत्सर्जन करीब 1.1 फीसदी बढ़ा है, जो पिछले पांच वर्षों के औसत (2.2 फीसदी) से काफी कम है। इस धीमी बढ़ोतरी में भारत की बड़ी भूमिका रही। 2025 में भारत का ऊर्जा उत्सर्जन थोड़ा घटा है, जिसकी मुख्य वजह समय से पहले और मजबूत मानसून के साथ-साथ अक्षय ऊर्जा का तेजी से होता विस्तार है।
चीन के बाहर 2025 में उत्सर्जन की तस्वीर काफी हद तक मौसम ने तय की। विकसित देशों में कड़ाके की सर्दी पड़ी, जिससे हीटिंग की मांग बढ़ गई। नतीजा यह हुआ कि इमारतों और बिजली क्षेत्र में प्राकृतिक गैस की खपत बढ़ी और उत्सर्जन ऊपर गया। इसके उलट, कई विकासशील देशों में गर्मी अपेक्षाकृत कम रही। इससे कूलिंग (एसी) की जरूरत घटी और कोयले व बिजली की मांग पर दबाव कम पड़ा।
अगर इस पूरे रुझान से मौसम के असर को अलग कर दें, तो तस्वीर थोड़ी बदल जाती है। विकसित देशों में सीओ₂ उत्सर्जन करीब 0.5 फीसदी घट सकता था, जो ऊर्जा दक्षता और साफ ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल को दिखाता है। वहीं, चीन को छोड़कर अन्य विकासशील देशों में उत्सर्जन करीब 1.7 फीसदी बढ़ता, लेकिन मौसम, खासकर भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में इस बढ़ोतरी को काफी हद तक थामे रहा।
उत्सर्जन में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण रही प्राकृतिक गैस
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 2025 में वैश्विक स्तर पर ऊर्जा से जुड़े उत्सर्जन में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण प्राकृतिक गैस रही। ईंधन जलाने से हुए कुल 18.5 करोड़ टन उत्सर्जन के इजाफे में करीब आधा, यानी 8.5 करोड़ टन, हिस्सा गैस का था। इसके बाद तेल का योगदान रहा, जिससे करीब छह करोड़ टन उत्सर्जन बढ़ा।
वहीं कोयले से हो रहा उत्सर्जन करीब स्थिर रहा और इसमें महज 2.5 करोड़ टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो पिछले साल के 21 करोड़ टन के मुकाबले काफी कम है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में तस्वीर अलग रही।
अमेरिका में गैस महंगी होने के कारण उसकी जगह कोयले का इस्तेमाल बढ़ा, जिससे उत्सर्जन में 7.5 करोड़ टन से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई। इसके उलट, चीन में कोयले से उत्सर्जन घटा, क्योंकि वहां कोयला आधारित बिजली उत्पादन में 1.4 फीसदी की कमी आई।
दूसरी तरफ तेल से जुड़े उत्सर्जन में बढ़ोतरी मुख्य रूप से चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों में देखी गई, जहां आर्थिक गतिविधियों में तेजी और बढ़ते परिवहन के चलते तेल की मांग लगातार बढ़ रही है।
भारत में मौसम से मिली राहत
रिपोर्ट दर्शाती है कि वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक गैस की मांग में हुई बढ़ोतरी का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा विकसित देशों में हीटिंग की बढ़ती जरूरतों से जुड़ा था, जहां कड़ाके की सर्दी के कारण इमारतों और बिजली क्षेत्र में गैस का इस्तेमाल बढ़ गया।
वहीं भारत में तस्वीर अलग रही। यहां तापमान अपेक्षाकृत कम रहा और मानसून ने समय से पहले दस्तक दी, जिससे कूलिंग (एसी) की जरूरत घटी और कोयले की खपत कम हुई। अनुमान है कि मौसम के असर से देश में कोयले की मांग करीब 80 लाख टन कम हुई, जिससे उत्सर्जन में दो करोड़ टन से ज्यादा गिरावट आई। यह दिखाता है कि अगर नीतियां और प्रकृति साथ दें, तो बदलाव संभव है।
क्या है क्लाइमेट कनेक्शन
2025 में वैश्विक ऊर्जा मांग पर मौसम के उतार-चढ़ाव का बड़ा असर पड़ा। यह साल रिकॉर्ड का तीसरा सबसे गर्म साल रहा, हालांकि 2024 के मुकाबले थोड़ा ठंडा था। भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में मानसून ने समय से पहले दस्तक दी और बारिश अच्छी रही। इससे भीषण गर्मी में कमी आई और एसी की जरूरत घटी। अगर ऐसा नहीं होता, तो दुनिया में कोयले की मांग करीब 30 फीसदी ज्यादा बढ़ सकती थी।
इसके बावजूद, कई क्षेत्रों में बिजली की मांग ऊंची बनी रही, क्योंकि गर्मी का असर अभी भी लंबे समय के औसत से ज्यादा था। वहीं विकसित देशों में कड़ाके की सर्दी ने हीटिंग की जरूरत बढ़ा दी, जिससे ऊर्जा खपत हीटिंग ईंधनों की ओर ज्यादा झुक गई।
सिर्फ तापमान ही नहीं, बल्कि सूखे ने भी असर डाला। यूरोप और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में सूखे के कारण जलविद्युत का उत्पादन घट गया। इस कमी को पूरा करने के लिए जीवाश्म ईंधनों का ज्यादा इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे वैश्विक स्तर पर करीब चार करोड़ टन अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जित हुआ।
खासकर पश्चिमी और पूर्वी यूरोप में गर्मी ने सूखे को और गंभीर बना दिया। इसका सीधा असर जलविद्युत उत्पादन पर पड़ा। आईईए का अनुमान है कि अगर 2025 में जलविद्युत उत्पादन 2024 जितना ही रहता, तो क्षेत्र में करीब 75 टेरावॉट-घंटे अतिरिक्त बिजली बन सकती थी और जीवाश्म ईंधनों से होने वाला करीब 4.5 करोड़ टन उत्सर्जन टल सकता था।
इसके साथ ही, हवा की औसत गति भी कमजोर रही, जिससे पवन ऊर्जा उत्पादन घट गया। नतीजतन, बिजली के लिए जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता बढ़ी। अगर हवा की स्थिति 2024 जैसी रहती, तो यूरोप में दो करोड़ टन से ज्यादा उत्सर्जन और कम हो सकता था।
सर्दियों में बारिश को छोड़कर, 2025 में भारत में करीब-करीब सभी मौसमों में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई। खासकर मई में 1901 के बाद सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई। समय से पहले आए मानसून ने जलविद्युत के उत्पादन को बढ़ाया, जिससे अनुमानित तौर पर करीब 1.5 करोड़ टन उत्सर्जन कम हुआ।
वहीं, कुल मिलाकर मौसम से जुड़े कारक, जैसे तापमान में बदलाव और जलविद्युत व पवन ऊर्जा में कमी का मिश्रित असर यह रहा कि 2025 में जीवाश्म ईंधनों से होने वाला उत्सर्जन करीब नौ करोड़ टन बढ़ गया। यह कुल 18.5 करोड़ टन की बढ़ोतरी का करीब आधा हिस्सा है।
अक्षय ऊर्जा की रही बड़ी भूमिका
रिपोर्ट दर्शाती है कि 2019 के बाद से सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा के साथ-साथ इलेक्ट्रिक गाड़ियों और हीट पंप के बढ़ते इस्तेमाल ने 2025 में वैश्विक ऊर्जा पर बड़ा असर डाला। इन तकनीकों की वजह से जीवाश्म ईंधनों की मांग में हर साल 35 एक्साजूल से ज्यादा की कमी आई, जो कुल मांग का करीब सात फीसदी है। यह करीब पूरे दक्षिण अमेरिका की कुल ऊर्जा खपत के बराबर है।
आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में इन साफ तकनीकों ने 23 एक्साजूल से ज्यादा कोयला, 9 एक्साजूल से ज्यादा प्राकृतिक गैस और करीब 3 एक्साजूल तेल की जगह ले ली। कोयले की यह बचत अकेले भारत की सालाना खपत से भी ज्यादा है, जबकि गैस की बचत वैश्विक एलएनजी बाजार के करीब आधे के बराबर है।
वहीं तेल की मांग में कमी का सबसे बड़ा कारण इलेक्ट्रिक गाड़ियां रहीं, जिनका योगदान करीब दो-तिहाई है। हालांकि, बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ क्षेत्रों में कोयला और गैस का इस्तेमाल भी बढ़ा, जिससे उत्सर्जन में कमी का असर कुछ हद तक सीमित हो गया।
कुल मिलाकर, जहां एक ओर ऊर्जा से जुड़ा उत्सर्जन बढ़ रहा है, वहीं ऊर्जा के साफ-सुथरे स्रोत उम्मीद की एक मजबूत तस्वीर भी पेश कर रहे हैं। सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा के साथ-साथ इलेक्ट्रिक गाड़ियों और हीट पंप के बढ़ते इस्तेमाल ने 2025 में करीब 300 करोड़ टन सीओ2 उत्सर्जन को टाल दिया, जो वैश्विक स्तर पर ऊर्जा से जुड़े कुल उत्सर्जन का करीब 8 फीसदी है।
बरकरार हैं उम्मीदें
कुछ देशों में इसका असर और भी ज्यादा साफ दिखा। चीन, यूरोपियन यूनियन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ब्राजील में इन तकनीकों की वजह से 10 फीसदी से ज्यादा उत्सर्जन कम हुआ। इस बदलाव में सबसे बड़ी भूमिका सौर ऊर्जा की रही, जिसने अकेले करीब 150 करोड़ टन उत्सर्जन को रोका।
यह भारत के कुल वार्षिक उत्सर्जन के करीब आधे के बराबर है। इसके बाद पवन ऊर्जा ने करीब 110 करोड़ टन उत्सर्जन कम किया। वहीं परमाणु ऊर्जा, इलेक्ट्रिक गाड़ियां और हीट पंप का योगदान क्रमशः 21, 10 और 9 करोड़ टन सीओ के बराबर रहा।
स्पष्ट है कि अगर स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में यह विस्तार न हुआ होता, तो आज उत्सर्जन का स्तर कहीं ज्यादा गंभीर होता।
देखा जाए तो यही रुझान आने वाले वर्षों में उम्मीद की सबसे बड़ी वजह बन सकते हैं। हालांकि अभी इलेक्ट्रिक गाड़ियों और हीट पंप का योगदान अपेक्षाकृत कम है, लेकिन आने वाले वर्षों में इनके तेजी से बढ़ने के साथ इनका असर और बढ़ने की उम्मीद है।
2025 हमें एक साफ संदेश देता है भले ही उत्सर्जन की रफ्तार धीमी हुई हो, लेकिन दिशा अभी भी खतरे की ओर है। भारत जैसे देशों ने साबित किया है कि सही नीतियों, अक्षय ऊर्जा और प्रकृति की अनुकूल परिस्थितियों के सहारे उत्सर्जन पर लगाम लगाई जा सकती है। लेकिन अगर दुनिया ने मिलकर तेज और ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह धीमी रफ्तार भी हमें संकट से नहीं बचा पाएगी।
ऐसे में अब वक्त सिर्फ आंकड़ों में सुधार का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने का है।