ओजोन छिद्र में कब कितना आया बदलाव; फोटो: नासा/ मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) 
जलवायु

अंटार्कटिका के ऊपर फिर बढ़ा ओजोन छिद्र, औसत से 50 लाख वर्ग किमी ज्यादा हुआ क्षेत्र: कॉपरनिकस

कॉपरनिकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस द्वारा जारी विश्लेषण में खुलासा हुआ है कि 12 सितंबर को ओजोन छिद्र का आकार 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया, जो इस अवधि के औसत से 50 लाख वर्ग किलोमीटर अधिक है।

Lalit Maurya

  • अंटार्कटिका के ऊपर 2026 में बने ओजोन छिद्र ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है।

  • कॉपरनिकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस के मुताबिक, 12 सितंबर को इसका क्षेत्रफल करीब 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर पहुंच गया, जो इस अवधि के औसत से लगभग 50 लाख वर्ग किलोमीटर अधिक है।

  • अगस्त के अंत तक ही इसका दायरा 1.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर हो चुका था, जो पूरे अंटार्कटिका के 1.42 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र से भी बड़ा है।

  • सितंबर की शुरुआत में ओजोन छिद्र के तेजी से फैलने का संबंध अंटार्कटिका के ऊपर करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर समताप मंडल के तापमान में अचानक गिरावट से जोड़ा गया है। बेहद ठंडे वातावरण में बनने वाले ध्रुवीय स्ट्रैटोस्फेरिक बादल ओजोन को नष्ट करने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं को तेज करते हैं।

  • हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। ओजोन की न्यूनतम मात्रा और ओजोन मास डेफिसिट जैसे महत्वपूर्ण संकेतक अभी ऐतिहासिक औसत के आसपास हैं। इसलिए मौजूदा बढ़ोतरी को ओजोन परत की दीर्घकालिक रिकवरी के उलटफेर के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

  • फिर भी यह घटनाक्रम याद दिलाता है कि पृथ्वी के इस अदृश्य सुरक्षा कवच की निगरानी और संरक्षण में किसी भी तरह की ढिलाई भारी पड़ सकती है।

पृथ्वी को सूर्य की खतरनाक पराबैंगनी (यूवी) किरणों से बचाने वाली ओजोन परत के लिए 2026 में अंटार्कटिका से एक बार फिर चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है।

यूरोपीय यूनियन की कॉपरनिकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस (सीएएमएस) के मुताबिक, 2026 में अंटार्कटिका के ऊपर बना ओजोन छिद्र अगस्त के अंत तक 1.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैल गया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह क्षेत्र पूरे अंटार्कटिका के 1.42 करोड़ वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र से भी बड़ा है।

कॉपरनिकस ने खुलासा किया है कि, इस साल ओजोन छिद्र का विकास अगस्त के दूसरे हिस्से से सामान्य गति से हो रहा था। लेकिन सितंबर की शुरुआत में इसके क्षेत्रफल में अचानक तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई।

12 सितंबर 2026 को ओजोन छिद्र का क्षेत्रफल करीब 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर आंका गया, जो इस अवधि के औसत से करीब 50 लाख वर्ग किलोमीटर अधिक है। सीएएमएस के पूर्वानुमान के मुताबिक सितंबर के मध्य में इसके और बढ़ने की संभावना भी थी।

यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ओजोन छिद्र का क्षेत्रफल सामान्य से आगे निकल गया है। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि ओजोन की कुल कमी को मापने वाले दूसरे प्रमुख संकेतक अभी ऐतिहासिक औसत के आसपास हैं।

यह विश्लेषण 16 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस के मौके पर जारी किया गया है।

अगस्त के अंत तक 1.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर का दायरा

देखा जाए तो हर साल सितंबर आते ही अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में बनने वाला ‘छेद’ दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचता है। इस साल भी यह छेद तेजी से बढ़ रहा है। कॉपरनिकस के मुताबिक, 2026 में ओजोन छिद्र का क्षेत्रफल 1.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर तक पहुंचना थोड़ा जल्दी हुआ है। फिलहाल इसका क्षेत्र औसत से अधिक बना हुआ है।

बता दें कि पिछले साल 30 अगस्त 2025 को ओजोन छिद्र का क्षेत्रफल 1.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया था। गौरतलब है कि वैज्ञानिक ओजोन छिद्र की सीमा उस क्षेत्र के रूप में तय करते हैं, जहां ओजोन की मात्रा 220 डॉबसन यूनिट (डीयू) से कम होती है।

ठंड बढ़ी तो तेजी से फैला ओजोन छिद्र

इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए वैज्ञानिकों ने जानकारी दी है कि अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन का क्षरण मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध की सर्दियों और वसंत के दौरान होता है। ओजोन छिद्र के तेजी से बढ़ने के पीछे अंटार्कटिका के ऊपर समताप मंडल में तापमान का गिरना अहम वजह है।

इस बार भी करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर दक्षिणी ध्रुव के आसपास न्यूनतम तापमान में अचानक गिरावट दर्ज की गई। बता दें कि बेहद कम तापमान पर वायुमंडल की ऊपरी परत यानी स्ट्रैटोस्फियर में ध्रुवीय स्ट्रैटोस्फेरिक बादल बनते हैं।

इन बादलों की मौजूदगी में सूर्य की रोशनी और मानव निर्मित रसायनों में मौजूद हैलोजन के बीच ऐसी रासायनिक प्रक्रियाएं शुरू होती हैं, जो ओजोन अणुओं को तेजी से नष्ट करती हैं। नतीजन ओजोन छिद्र का आकार बढ़ने लगता है। यह प्रक्रिया अगस्त से नवंबर के बीच सबसे सक्रिय रहती है।

इस साल भी ओजोन छिद्र के तेजी से बढ़ने का समय दक्षिणी ध्रुव से करीब 20 किलोमीटर ऊपर तापमान में अचानक गिरावट के साथ भी मेल खाता है। कम तापमान ने ओजोन क्षरण के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कीं।

सिर्फ क्षेत्रफल देखकर नहीं समझी जा सकती पूरी तस्वीर

हालांकि वैज्ञानिकों के लिए तस्वीर पूरी तरह चिंताजनक नहीं है। भले ही ओजोन छिद्र का क्षेत्रफल औसत से बड़ा है, लेकिन कॉपरनिकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस ने जानकारी दी है कि इसके अन्य दो महत्वपूर्ण संकेतक अभी ऐतिहासिक औसत के करीब हैं। इनमें ओजोन छिद्र के भीतर ओजोन की न्यूनतम मात्रा और ओजोन मास डेफिसिट यानी ओजोन की कुल कमी शामिल है।

ओजोन मास डेफिसिट यह बताता है कि ओजोन छिद्र वाले क्षेत्र में ओजोन की मात्रा को 220 डॉबसन यूनिट तक वापस लाने के लिए वातावरण में कितनी अतिरिक्त ओजोन की जरूरत होगी।

सीएएमएस की निदेशक लॉरेंस रुइल के मुताबिक, अंटार्कटिका के ओजोन छिद्र का आकार हर साल अलग-अलग हो सकता है। इसके पीछे वायुमंडलीय और रासायनिक परिस्थितियों का जटिल मेल जिम्मेदार होता है। इस साल सितंबर की शुरुआत में क्षेत्रफल तेजी से बढ़ा है, लेकिन दूसरे संकेतक अभी औसत के करीब हैं।

उनके अनुसार, यही स्थिति बताती है कि ओजोन परत की निगरानी लगातार जारी रखना जरूरी है, ताकि मानव गतिविधियों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं के बीच जटिल संबंधों को समझा जा सके और ओजोन परत की बदलती स्थिति पर नजर रखी जा सके।

ओजोन परत कमजोर हुई तो इंसानी जिंदगी पर बढ़ेगा खतरा

ओजोन परत पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। यह सूर्य से आने वाले हानिकारक पराबैंगनी (यूवी) विकिरण का बड़ा हिस्सा सोख लेती है। यदि धरती पर यूवी विकिरण बढ़ जाए तो त्वचा संबंधी कैंसर सहित कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है।

देखा जाए तो करीब आधी सदी तक इंसानों द्वारा इस्तेमाल किए गए ओजोन-क्षयकारी रसायनों (ओडीएस) के उत्सर्जन ने इस सुरक्षा कवच को कमजोर किया है। अंटार्कटिका के ऊपर इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई देता है, क्योंकि वहां बेहद ठंडी परिस्थितियां और अपेक्षाकृत स्थिर ध्रुवीय हवाएं ओजोन के क्षरण के लिए अनुकूल वातावरण बनाती हैं।

जलवायु परिवर्तन भी इस कहानी से जुड़ा है। पृथ्वी की सतह गर्म होने के साथ समताप मंडल के ठंडा होने की प्रवृत्ति ध्रुवीय बादलों के निर्माण को बढ़ावा दे सकती है, जो ओजोन क्षरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

अंटार्कटिका में यह समस्या सबसे स्पष्ट दिखाई देती है। यहां बेहद ठंडी हवा और मजबूत ध्रुवीय भंवर (पोलर वर्टेक्स) तथा स्ट्रैटोस्फेरिक हवाओं की वजह से ओजोन क्षरण के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं। इसलिए दक्षिणी गोलार्ध के वसंत यानी अगस्त से नवंबर के बीच हर साल ओजोन छिद्र विकसित होता है।

2006 में बना था सबसे बड़ा ओजोन छिद्र

विश्लेषण के मुताबिक अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की निगरानी जमीन और उपग्रहों से 1970 के दशक के अंत से की जा रही है। अब तक का सबसे बड़ा क्षेत्रफल 9 सितंबर 2006 को 2.96 करोड़ वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया था।

हालांकि हाल के वर्षों में ओजोन छिद्र अपेक्षाकृत छोटे और कम समय तक रहने वाले रहे हैं। यह संकेत देता है कि ओजोन परत धीरे-धीरे ठीक होने की दिशा में बढ़ रही है।

ऐसे में 2026 में ओजोन छिद्र का तेजी से बढ़ना चिंता का संकेत जरूर है, लेकिन इसे ओजोन परत की दीर्घकालिक रिकवरी के उलटफेर के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि यह याद दिलाता है कि ओजोन परत की रिकवरी के बावजूद उसकी सुरक्षा को लेकर लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे जरूरी है कि आने वाले हफ्तों में इसके आकार, गहराई और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर लगातार नजर रखी जाए।

हमें समझना होगा कि आखिरकार, ओजोन परत का स्वास्थ्य केवल अंटार्कटिका की कहानी नहीं है। यह पृथ्वी पर मौजूद हर उस जीवन की सुरक्षा से जुड़ा है, जिसे सूर्य की रोशनी चाहिए, लेकिन उसकी खतरनाक किरणों से बचाव भी जरूरी है।