अमेरिका के हार्वर्ड फॉरेस्ट में 40 साल पुराने प्रयोग ने मिट्टी में सुरक्षित कार्बन को लेकर नई चिंता बढ़ाई।
वैज्ञानिकों ने पाया कि बढ़ते तापमान से मिट्टी के पुराने कार्बन भंडार भी टूटकर सीओ2 के रूप में बाहर निकल रहे हैं।
लंबे समय तक गर्म मिट्टी में सक्रिय हुए माइक्रोब्स ने स्थायी माने जाने वाले कार्बन पदार्थों को भी तेजी से तोड़ना शुरू किया।
शोधकर्ताओं के अनुसार मिट्टी से बढ़ता सीओ2 उत्सर्जन भविष्य में जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को और तेज कर सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि नए निष्कर्षों को शामिल करने से भविष्य के जलवायु मॉडल और तापमान अनुमान ज्यादा सटीक बनेंगे।
अमेरिका के हार्वर्ड फॉरेस्ट में पिछले करीब 40 वर्षों से चल रहे एक वैज्ञानिक प्रयोग ने जलवायु परिवर्तन को लेकर नई चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि जंगल की मिट्टी में लंबे समय तक सुरक्षित माना जाने वाला कार्बन भी अब टूटकर वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) के रूप में निकल सकता है।
यह दुनिया का सबसे लंबा “सॉइल वार्मिंग एक्सपेरिमेंट” माना जाता है। इस अध्ययन से पता चला है कि बढ़ते तापमान का असर सिर्फ मौसम पर ही नहीं, बल्कि मिट्टी के अंदर छिपे कार्बन भंडार पर भी पड़ रहा है।
मिट्टी को लगातार गर्म रखा गया
इस प्रयोग की शुरुआत 1980 के दशक के आखिर में हुई थी। वैज्ञानिकों ने जंगल की जमीन के नीचे बिजली के तार बिछाए। इन तारों की मदद से मिट्टी का तापमान सामान्य से लगभग पांच डिग्री सेल्सियस ज्यादा रखा गया।
यह प्रक्रिया हर मौसम में जारी रही। सर्दियों की बर्फबारी हो या गर्मियों की उमस, मिट्टी लगातार गर्म रखी गई। उस समय वैज्ञानिकों को लगा था कि पांच डिग्री की बढ़ोतरी भविष्य के लिए बहुत ज्यादा मानी जाएगी। लेकिन आज जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को देखते हुए यह अनुमान उतना बड़ा नहीं लगता।
वैज्ञानिकों का कहना है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी का तापमान पहले ही लगभग 1.1 से 1.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है।
मिट्टी में छिपा है बहुत बड़ा कार्बन भंडार
वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया की मिट्टी में जितना कार्बन मौजूद है, वह वातावरण और सभी पेड़-पौधों में मौजूद कार्बन से भी ज्यादा है। इसी कारण मिट्टी को पृथ्वी के जलवायु संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। अब तक यह समझा जाता था कि मिट्टी में मौजूद कुछ कार्बन सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रहता है। लेकिन नए अध्ययन ने इस सोच को चुनौती दी है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि लंबे समय तक गर्म रहने के कारण मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीव यानी माइक्रोब्स ज्यादा सक्रिय हो गए। ये माइक्रोब्स मिट्टी में मौजूद पुराने और जटिल कार्बन पदार्थों को भी तोड़ने लगे। इसके बाद यह कार्बन सीओ2 बनकर हवा में जाने लगा।
धीरे-धीरे सामने आया असर
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव तुरंत दिखाई नहीं दिया। कई दशकों बाद जाकर इसके स्पष्ट संकेत मिले। यही वजह है कि लंबे समय तक चलने वाले वैज्ञानिक प्रयोग बेहद जरूरी माने जाते हैं। अगर यह अध्ययन केवल कुछ वर्षों तक चलता, तो शायद यह महत्वपूर्ण बदलाव सामने नहीं आता।
साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि मिट्टी में रहने वाले माइक्रोब्स पौधों की वृद्धि और पोषक तत्वों के चक्र में बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन तापमान बढ़ने से इनकी गतिविधियों में बदलाव आ सकता है।
जलवायु परिवर्तन को मिल सकता है नया बल
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया भविष्य में जलवायु परिवर्तन को और तेज कर सकती है। जब मिट्टी से ज्यादा सीओ2 निकलेगी, तो वातावरण और गर्म होगा। इससे मिट्टी में मौजूद और ज्यादा कार्बन टूटेगा और फिर और अधिक सीओ2 बाहर आएगी।
इसे “फीडबैक लूप” कहा जाता है। यानी गर्मी खुद ही और ज्यादा गर्मी पैदा करने लगती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस नए शोध को जलवायु मॉडल में शामिल करने से भविष्य के तापमान और जलवायु परिवर्तन का अधिक सही अनुमान लगाया जा सकेगा। यह अध्ययन दुनिया को चेतावनी देता है कि पृथ्वी की मिट्टी में छिपे कार्बन भंडार उतने स्थायी नहीं हैं, जितना पहले माना जाता था।