भारत में जलवायु संकट अब वैज्ञानिक बहस से आगे बढ़कर रोजमर्रा का अनुभव बन गया है। येल प्रोग्राम के अध्ययन के अनुसार, सर्वे में शामिल राजस्थान के 80 फीसदी और ओडिशा के 64 फीसदी लोग जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहे हैं।
देश के विभिन्न हिस्सों में लोग गर्मी, चक्रवात, सूखा और अन्य आपदाओं से प्रभावित हो रहे हैं।
इस दौरान देश भर में 71 फीसदी लोगों ने भीषण गर्मी का कहर झेला, जबकि 59 फीसदी ने फसलों में कीट और बीमारियों का असर देखा और उतने ही लोगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा।
वहीं 53 फीसदी लोगों ने जल प्रदूषण को महसूस किया, 52 फीसदी ने सूखा और पानी की कमी झेली और 51 फीसदी ने गंभीर वायु प्रदूषण का अनुभव किया।
उड़ीसा में 87 फीसदी लोग मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग फसलों में कीट और बीमारियों को प्रभावित कर रही है। इसी तरह महाराष्ट्र, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, असम में यह आंकड़ा 80 फीसदी से अधिक है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट और डाउन टू अर्थ के हालिया विश्लेषण से भी पता चला है कि भारत में जनवरी से नवंबर 2025 के बीच 99 फीसदी से अधिक दिनों में चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं
भारत में जलवायु संकट अब सिर्फ वैज्ञानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि रोजमर्रा का अनुभव बन चुका है। येल प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज कम्युनिकेशन द्वारा किए एक नए अध्ययन और जारी क्लाइमेट ओपिनियन मैप्स से सामने आया है कि देश के 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तथा 634 जिलों में लोगों के अनुभव, डर और जलवायु परिवर्तन को लेकर उनकी समझ एक जैसी नहीं है।
140 करोड़ से अधिक आबादी वाला भारत आज दुनिया के सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील देशों में शामिल है। साथ ही यह तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक भी है।
अध्ययन के मुताबिक पिछले 12 महीनों में सर्वे में शामिल देश के अधिकांश लोगों ने किसी न किसी तरह की गंभीर पर्यावरणीय समस्या का सामना किया।
भीषण गर्मी से लेकर बाढ़ तक: लोगों ने क्या कुछ झेला?
इस दौरान 71 फीसदी लोगों ने भीषण गर्मी का कहर झेला, जबकि 59 फीसदी ने फसलों में कीट और बीमारियों का असर देखा और उतने ही लोगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा। वहीं 53 फीसदी लोगों ने जल प्रदूषण को महसूस किया, 52 फीसदी ने सूखा और पानी की कमी झेली और 51 फीसदी ने गंभीर वायु प्रदूषण का अनुभव किया।
इसके अलावा, एक तिहाई से अधिक लोगों ने तेज तूफान, खाद्य संकट, चक्रवात और बाढ़ जैसी आपदाएं भी देखीं।
उत्तर भारत झुलसा, ओडिशा डूबा
राज्यवार आंकड़े दर्शाते हैं कि राजस्थान (80 फीसदी), दिल्ली (76 फीसदी), उत्तर प्रदेश (78 फीसदी) और हरियाणा (80 फीसदी) जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में 75 फीसदी से अधिक लोगों ने भीषण गर्मी का अनुभव किया। वहीं केरल (52 फीसदी) और तमिलनाडु (55 फीसदी) में यह आंकड़ा करीब आधा है।
इसी तरह चक्रवात का असर राष्ट्रीय औसत में भले ही 35 फीसदी लोगों ने झेला हो, लेकिन ओडिशा में 64 फीसदी लोग इससे प्रभावित हुए। अक्टूबर 2024 में आए चक्रवात ‘डाना’ ने राज्य को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया। ओडिशा के दो-तिहाई से अधिक लोगों ने सूखा और पानी की कमी भी झेली, यह एक ऐसी समस्या है, जो करीब हर साल वहां असर डालती है।
झारखण्ड में भी 66 फीसदी लोगों ने सूखे या पानी की कमी का सामना किया। इसके उलट, केरल (38 फीसदी), तमिलनाडु (34 फीसदी), चंडीगढ़ (25 फीसदी) और पंजाब (40 फीसदी) जैसे राज्यों में 40 फीसदी या उससे कम लोगों ने पानी की किल्लत का अनुभव किया।
उड़ीसा में 87 फीसदी लोग मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग फसलों में कीट और बीमारियों को प्रभावित कर रही है। इसी तरह महाराष्ट्र, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, असम में यह आंकड़ा 80 फीसदी से अधिक है।
जलवायु परिवर्तन को लेकर मजबूत लोगों की समझ
अध्ययन दर्शाता है कि भारत में लोग जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाओं के बीच के रिश्ते को अच्छी तरह समझते हैं। यही वजह है कि देश में 81 फीसदी लोगों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग से पौधों और जानवरों की प्रजातियां खत्म हो रही हैं।
वहीं 78 फीसदी लोग इसे भीषण गर्मी और कृषि कीटों से जोड़ते हैं, 77 फीसदी सूखा और जल संकट को, 73 फीसदी चक्रवात को और 70 फीसदी बाढ़ व तूफानों को जलवायु परिवर्तन का नतीजा मानते हैं। इसके अलावा, 65 फीसदी लोगों का कहना है कि बिजली संकट भी जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है।
भारत बदलती जलवायु के प्रति कितना संवेदनशील है इसे सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट और डाउन टू अर्थ के हालिया विश्लेषण से ही समझा जा सकता है जिसके मुताबिक भारत में जनवरी से नवंबर 2025 के बीच 99 फीसदी से अधिक दिनों में चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गईं। यह देश में जलवायु प्रभावों की बढ़ती तीव्रता और निरंतरता को दर्शाता है।
वहीं 2024 में देश ने 322 दिनों तक किसी न किसी तरह की चरम मौसमी आपदा का सामना किया था, यानी साल के 90 फीसदी दिन देश इन आपदाओं से जूझ रहा था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन आपदाओं का अनुभव और उन्हें जलवायु परिवर्तन से जोड़ने की समझ, देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी अलग है।
खास बात यह है कि अध्ययन में शामिल लोग उन आपदाओं को भी जलवायु परिवर्तन से जोड़ते हैं, जिन्हें उन्होंने खुद नहीं झेला। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु में महज 21 फीसदी लोगों ने भीषण तूफान का अनुभव किया, लेकिन 74 फीसदी मानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग इसका कारण है।
अमेरिका से बिल्कुल अलग है भारत
येल यूनिवर्सिटी के इस अध्ययन के मुताबिक जहां अमेरिका में जलवायु परिवर्तन को लेकर राजनीतिक ध्रुवीकरण दिखता है, वहीं भारत में ऐसा नहीं है। देश के 96 फीसदी लोग मानते हैं कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी हो रही है, और हर जिले में यह आंकड़ा 90 फीसदी से ऊपर है।
इतना ही नहीं सर्वे में शामिल, 81 फीसदी भारतीय कहते हैं कि उन्होंने जलवायु परिवर्तन के असर खुद महसूस किए हैं, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा सिर्फ 49 फीसदी ही है।
भारत में औसतन 82 फीसदी वयस्क मानते हैं कि बढ़ता तापमान उनको और उनके परिवार को नुकसान पहुंचा रहा है। वहीं 91 फीसदी बढ़ते तापमान को लेकर चिंतित हैं। 89 फीसदी का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग आने वाली पीढ़ियों को नुकसान पहुंचा सकती है।
जरूरी हैं बेहतर समझ
जैसे-जैसे भारत आर्थिक विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है और चरम मौसमी आपदाओं के लिए तैयारी कर रहा है, यह जरूरी हो गया है कि लोगों को जीवाश्म ईंधन, जलवायु परिवर्तन और चरम मौसम के बीच का रिश्ता साफ-साफ समझाया जाए। ऐसे में राज्य और जिला स्तर पर लोगों की सोच और अनुभवों को दर्शाने वाले ये नक्शे जलवायु अनुकूलन, सतत विकास और मजबूत स्थानीय जलवायु कार्ययोजनाएं बनाने में मदद कर सकते हैं।
यह अध्ययन 2022 से 2025 के बीच 19,000 से अधिक लोगों के सर्वे, जनगणना और सांख्यिकीय मॉडलिंग पर आधारित है, जिससे यह साफ होता है कि जलवायु संकट अब सिर्फ भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि भारत के हर हिस्से में कड़वी सच्चाई बन चुका है।