लंबी गर्मी की मार से गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों की सेहत पर बढ़ा खतरा, अध्ययन में सामने आए गंभीर परिणाम।
भारत में दो लाख से अधिक जन्मों के अध्ययन से पता चला, तेज गर्मी से कम वजन और समय से पहले जन्म का जोखिम बढ़ा।
गर्भावस्था की पहली, दूसरी और तीसरी तिमाही में गर्मी का अलग-अलग असर, बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ सकता है गंभीर प्रभाव।
कम पोषण वाली और कमजोर महिलाओं पर हीटवेव का असर ज्यादा, सुरक्षा उपायों की जरूरत पर विशेषज्ञों ने दिया जोर।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ती गर्मी से बचाव के लिए गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की जरूरत।
देश में बढ़ती गर्मी और लगातार बढ़ती लू यानी हीटवेव का असर अब गर्भवती महिलाओं और उनके होने वाले बच्चों की सेहत पर भी दिखाई दे रहा है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि गर्भावस्था के दौरान लंबे समय तक बहुत अधिक गर्मी में रहने से कम वजन वाले बच्चों के जन्म, समय से पहले प्रसव और मृत जन्म का खतरा बढ़ सकता है।
यह अध्ययन “एनवायर्नमेंटल रिसर्च कम्युनिकेशन्स” नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इसमें बताया गया है कि गर्भावस्था के दौरान गर्मी का असर केवल मौसम की स्थिति नहीं है, बल्कि यह मां और बच्चे के स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित कर सकता है।
दो लाख से अधिक जन्मों के आंकड़ों का अध्ययन
अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। इसमें साल 2015 से 2020 के बीच हुए 2,09,266 बच्चों के जन्मों का अध्ययन किया गया।
शोधकर्ताओं ने हर जन्म को उस इलाके के तापमान और गर्मी की स्थिति से जोड़ा, जहां गर्भवती महिला रहती थी। इसके बाद यह देखा गया कि गर्भावस्था के अलग-अलग समय में अधिक गर्मी का बच्चे के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ा। अध्ययन में पाया गया कि तेज गर्मी के हर अतिरिक्त लगातार दिन के साथ कम वजन वाले बच्चे के जन्म का खतरा लगभग एक प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
गर्भावस्था के समय के अनुसार अलग-अलग असर
शोध में यह भी सामने आया कि गर्भावस्था के किस चरण में गर्मी का असर पड़ा, इससे खतरे में अंतर आया।
गर्भावस्था के पहले तीन महीनों यानी पहली तिमाही में अधिक गर्मी का संबंध समय से पहले बच्चे के जन्म के बढ़ते खतरे से पाया गया। वहीं, दूसरे तीन महीनों में तेज गर्मी के संपर्क में आने से बच्चे का जन्म के समय वजन कम होने की आशंका बढ़ी। तीसरी तिमाही यानी गर्भावस्था के आखिरी महीनों में गर्मी का असर मृत जन्म के खतरे से जुड़ा पाया गया। हालांकि इस संबंध में मिले आंकड़े अभी पूरी तरह निश्चित नहीं हैं।
कमजोर महिलाओं पर ज्यादा असर
अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिन महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) 18.5 से कम है, उनमें गर्मी के कारण कम वजन वाले बच्चे के जन्म का खतरा अधिक होता है शोधकर्ताओं के अनुसार, जिन महिलाओं को पहले से पोषण की कमी, आर्थिक परेशानी या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, वे तेज गर्मी के असर से अधिक प्रभावित हो सकती हैं।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि तेज गर्मी का सबसे ज्यादा असर अक्सर उन महिलाओं पर पड़ता है, जिनके पास इससे बचने के साधन कम होते हैं। इसलिए गर्मी से बचाव की योजनाओं में इन महिलाओं को विशेष प्राथमिकता देने की जरूरत है।
पहाड़ी इलाकों में भी बढ़ी चिंता
अध्ययन में भारत के अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों का भी विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएं लंबे समय तक चलने वाली गर्मी से अधिक प्रभावित हो सकती हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इन क्षेत्रों के लोग अत्यधिक गर्मी के लिए उतने अभ्यस्त नहीं होते, इसलिए इसका असर ज्यादा दिखाई दे सकता है।
गर्म होती दुनिया में जरूरी हैं नए उपाय
जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में लू अधिक लंबी और तेज होती जा रही हैं। ऐसे में गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष कदम उठाना जरूरी हो गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भवती महिलाओं को गर्मी के दौरान पर्याप्त पानी पीने, दोपहर की तेज धूप से बचने और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाए रखने की जरूरत है। साथ ही, सरकार और स्थानीय प्रशासन को कमजोर वर्ग की महिलाओं के लिए गर्मी से बचाव की विशेष योजनाएं बनानी होंगी।
यह अध्ययन बताता है कि बढ़ता तापमान केवल पर्यावरण की समस्या नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ विषय है।