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जलवायु

कैसे बिना उड़ानें घटाए 75 फीसदी तक कम हो सकता है हवाई यात्राओं से हो रहा उत्सर्जन

अध्ययन दर्शाता है कि मौजूदा विमानों, सीट व्यवस्था और यात्रियों की संख्या में बदलाव से विमानन उत्सर्जन 50 से 75 फीसदी तक घटाया जा सकता है

Lalit Maurya

  • एक नए अध्ययन के अनुसार, हवाई यात्राओं से होने वाला कार्बन उत्सर्जन बिना उड़ानों की संख्या घटाए 50 से 75 फीसदी तक कम किया जा सकता है।

  • शोधकर्ताओं का कहना है कि एयरलाइंस अगर ईंधन-दक्ष विमानों का संचालन करें, बिजनेस क्लास सीटें हटाएं और सीटें भरने की दर बढ़ाएं, तो उत्सर्जन में तेजी से कमी लाई जा सकती है।

  • अध्ययन से पता चला है कि एयरलाइंस मौजूद संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके तुरंत करीब 11 फीसदी तक उत्सर्जन घटा सकती हैं।

  • यह भी सामने आया कि बिजनेस और फर्स्ट क्लास की सीटें इकोनॉमी क्लास के मुकाबले पांच गुणा तक ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करती हैं। ऐसे में अगर सबसे कुशल विमानों में अधिकतम यात्रियों को बैठाया जाए, तो उत्सर्जन में 22 से 57 फीसदी तक अतिरिक्त कमी लाई जा सकती है।

दुनिया में हवाई यात्राओं से होने वाला कार्बन उत्सर्जन उड़ानों की संख्या घटाए बिना भी 50 से 75 फीसदी तक कम किया जा सकता है। यह दावा लिनियस और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में किया गया है।  

अध्ययन का कहना है कि अगर एयरलाइंस केवल तीन व्यावहारिक बदलाव अपनाएं, तो विमानन क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन तेजी से कम किया जा सकता है। इसके लिए न तो नए ईंधन का इंतजार करना होगा, न ही भविष्य की तकनीकों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, एयरलाइंस मौजूद संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके तुरंत करीब 11 फीसदी तक उत्सर्जन घटा सकती हैं।

करोड़ों उड़ानों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने साल 2023 की 2.7 करोड़ से ज्यादा व्यावसायिक उड़ानों का विश्लेषण किया है। इन उड़ानों में 26 हजार शहरों के बीच हुई यात्राएं शामिल थी, जिनमें करीब 350 करोड़ यात्रियों ने सफर किया था।

नतीजों से पता चला है कि अलग-अलग उड़ानों के दौरान होने वाले उत्सर्जन के स्तर में हैरान करने वाला अंतर है। उदाहरण के लिए कुछ रूट्स पर एक यात्री के लिए प्रति किलोमीटर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करीब 900 ग्राम तक पहुंच गया, जबकि सबसे कुशल उड़ानों में यह आंकड़ा महज 30 ग्राम प्रति किलोमीटर रहा। यानी, कुछ उड़ानों में प्रदूषण का स्तर सबसे बेहतर उड़ानों के मुकाबले करीब 30 गुणा ज्यादा पाया गया।

औसतन कितना प्रदूषण?

2023 में वैश्विक स्तर पर हवाई यात्रा के दौरान प्रति किलोमीटर प्रति यात्री औसतन 84.4 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन हुआ।

हालांकि शोध से पता चला है कि तीन व्यावहारिक कदम अपनाकर इस उत्सर्जन को काफी हद तक घटाया जा सकता है। इसके लिए सबसे ईंधन-दक्ष विमानों का ही संचालन करना, बिजनेस और फर्स्ट क्लास सीटों को हटाकर ज्यादा यात्रियों को ले जाना, और यात्रियों की संख्या को बढ़ाकर 95 फीसदी तक सीटें भरना शामिल है। शोधकर्ताओं का कहना है इन बदलावों से विमानन क्षेत्र के प्रदूषण को तेजी से कम किया जा सकता है।

इसी तरह विमान का मॉडल उत्सर्जन में बड़ी भूमिका निभाता है। विश्लेषण के मुताबिक, अलग-अलग विमानों में प्रति यात्री प्रति किलोमीटर कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 60 से 360 ग्राम के बीच रहा।

ऐसे में अगर लंबी दूरी के लिए बोइंग 787-9 और छोटी-मध्यम दूरी के लिए एयरबस ए 321नियो जैसे सबसे कुशल विमानों का इस्तेमाल किया जाए, तो 25 से 28 फीसदी तक ईंधन बचाया जा सकता है। यानी, बेहतर विमान चुनकर ही प्रदूषण और ईंधन खर्च दोनों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉक्टर मिलान क्लोवर का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “सभी पुराने विमानों को तुरंत बदलना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन यह अध्ययन दर्शाता है कि ज्यादा दक्ष विमान कितनी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। सही नीतियों से यह बदलाव तेज किया जा सकता है।”

बिजनेस क्लास भी बढ़ाती है प्रदूषण

बिजनेस और फर्स्ट क्लास की सीटें इकोनॉमी क्लास के मुकाबले पांच गुणा तक ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करती हैं। ऐसे में अगर सबसे कुशल विमानों में अधिकतम यात्रियों को बैठाया जाए, तो उत्सर्जन में 22 से 57 फीसदी तक अतिरिक्त कमी लाई जा सकती है।

इसका मतलब है कि ज्यादा यात्रियों को एक ही उड़ान में ले जाकर प्रदूषण को काफी हद तक घटाया जा सकता है। रिपोर्ट बताती है 2023 में विमानों की औसतन 79 फीसदी सीटें भरी थी। वहीं कुछ उड़ानों में तो यह आंकड़ा महज 20 फीसदी तक ही रहा। ऐसे में इसे 95 फीसदी तक ले जाने से उत्सर्जन में 16 फीसदी की अतिरिक्त कटौती संभव है।

अगर इन तीनों उपायों को पूरी दुनिया में लागू किया जाए, तो विमानन क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में 50 से 75 फीसदी तक कमी लाई जा सकती है।

हालांकि शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि इतनी बड़ी कटौती के लिए पूरे सिस्टम में बदलाव जरूरी होंगे। फिर भी विश्लेषण से यह साफ हुआ है कि एयरलाइंस अभी, इसी समय, अपने सबसे ईंधन-कुशल विमानों को मौजूदा रूट्स पर बेहतर तरीके से इस्तेमाल करके करीब 11 फीसदी तक उत्सर्जन घटा सकती हैं।

यानी, बिना किसी बड़े बदलाव के भी प्रदूषण कम करने की शुरुआत तुरंत की जा सकती है।

भारत सबसे कुशल क्षेत्रों में शामिल

यह अध्ययन एयरलाइन डेटा, अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन और अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ के आंकड़ों पर आधारित है। इन आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि अफ्रीका, ओशिनिया, मध्य पूर्व, मध्य एशिया और उत्तरी अमेरिका में उड़ानें सबसे कम दक्ष पाई गईं, यानी यहां प्रदूषण ज्यादा हो रहा है।

वहीं दूसरी ओर भारत, ब्राजील और दक्षिण-पूर्व एशिया उन क्षेत्रों में शामिल हैं, जहां उड़ानें सबसे ज्यादा कुशल हैं और प्रति यात्री उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है।

अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर स्टेफन गॉसलिंग का कहना है, “कुशलता पर आधारित नीतियां न सिर्फ पर्यावरण के लिए फायदेमंद हैं, बल्कि एयरलाइंस के आर्थिक हित में भी हैं। इसके बावजूद कई कंपनियां पुराने विमान, कम यात्री और ज्यादा प्रीमियम सीटों पर निर्भर हैं।”

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि विमानन क्षेत्र में उत्सर्जन रेटिंग, विमान प्रदर्शन के आधार पर लैंडिंग शुल्क और कार्बन सीमा जैसे नियम लागू किए जा सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे घरेलू उपकरणों और वाहनों में ऊर्जा मानक होते हैं।

कुल मिलाकर यह अध्ययन दर्शाता है कि विमानन क्षेत्र में प्रदूषण घटाने के लिए किसी चमत्कारी तकनीक का इंतजार जरूरी नहीं है। सवाल नई खोजों का नहीं, बल्कि मौजूदा संसाधनों के समझदारी भरे इस्तेमाल और नीतिगत इच्छाशक्ति का है।