धरती पर बढ़ते तापमान के साथ दुनिया में हरियाली भी संकट में पड़ती जा रही है। जर्नल साइंस में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि सदी के अंत तक दुनिया में पौधों की 16 फीसदी प्रजातियां अपने 90 फीसदी से अधिक प्राकृतिक आवास खो सकती हैं, जिससे वे विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाएंगी।
वैज्ञानिकों ने पौधों की करीब 67,664 प्रजातियों का अध्ययन किया। नतीजे दर्शाते हैं कि पौधे जलवायु परिवर्तन के साथ नए ठिकाने खोजने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन असली संकट उनकी धीमी गति नहीं, बल्कि तेजी से खत्म होते प्राकृतिक आवास हैं।
अध्ययन के अनुसार भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में नई प्रजातियों के आने से हरियाली बढ़ सकती है, जबकि यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी अमेरिका में पौधों की विविधता तेजी से घटेगी। ऑस्ट्रेलिया के कुछ क्षेत्रों में 30 फीसदी से अधिक प्रजातियां विलुप्ति के खतरे में हैं।
विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं की गई, तो आने वाले दशकों में धरती अपने जंगलों, वनस्पतियों और उनसे जुड़ी पारिस्थितिक विरासत का बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए खो सकती है।
हर गुजरते दिन के साथ धरती पहले से कहीं ज्यादा गर्म हो रही है और इसके साथ ही जंगल, घास के मैदान और पौधों की दुनिया भी चुपचाप अपनी जगह बदल रही है। कहीं जंगल पहाड़ों की ओर खिसक रहे हैं, तो कहीं घास के मैदान ठंडे इलाकों की तरफ फैल रहे हैं। हवा और पानी के सहारे बीज नए ठिकाने खोज रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या पौधे जलवायु परिवर्तन की इस रफ्तार के साथ खुद को बचा पाएंगे?
जर्नल साइंस में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि दुनिया में पौधों की हजारों प्रजातियां अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई हैं, जहां उनके लिए सिर्फ जगह बदल लेना काफी नहीं होगा। असली संकट यह है कि उनके रहने लायक प्राकृतिक आवास ही तेजी से गायब हो रहे हैं।
भाग नहीं सकते पौधे, फिर भी कर रहे हैं पलायन
यह सच है कि पौधे इंसानों या जानवरों की तरह चल नहीं सकते, लेकिन वे जलवायु के साथ अपने ठिकाने बदलते हैं। हर पौधे को जीवित रहने के लिए खास तापमान, बारिश और मिट्टी की जरूरत होती है।
हालांकि जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म हो रही है, ये परिस्थितियां भी बदलती जा रही हैं। ऐसे में पौधों के सामने बस तीन रास्ते बचते हैं, वो या तो खुद को बदलें, अपने लिए नए ठिकाने तलाशे या फिर बदलती दुनिया में खत्म हो जाएं।
इसे समझने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, डेविस और बीजिंग नार्मल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दुनिया में पौधों की 67,664 प्रजातियों का अध्ययन किया है। यह दुनिया की ज्ञात वनस्पति प्रजातियों का करीब 18 फीसदी हिस्सा है। इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने सदी के अंत तक के जलवायु परिदृश्यों का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश की है कि पौधे भविष्य में कहां जाएंगे और बदलती जलवायु के साथ कितनी प्रजातियां विलुप्ति के खतरे में होंगी।
संकट की असली वजह ‘धीमी रफ्तार’ नहीं, खत्म होता आवास
इस अध्ययन का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह सामने आया है कि पौधों के खत्म होने की वजह सिर्फ यह नहीं कि वे तेजी से नई जगहों तक नहीं पहुंच पा रहे। असली खतरा यह है कि उनके लिए उपयुक्त पर्यावरण ही पृथ्वी से गायब होता जा रहा है।
नतीजे दर्शाते हैं कि मौजूदा जलवायु परिदृश्यों में सदी के अंत तक दुनिया में पौधों की 7 से 16 फीसदी प्रजातियां अपने 90 फीसदी से अधिक आवास खो सकती हैं। इसका मतलब है कि वे विलुप्ति के बेहद करीब पहुंच जाएंगी।
अध्ययन की वरिष्ठ शोधकर्ता शियाओली डोंग का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “समस्या यह नहीं कि पौधे तेजी से नहीं बढ़ रहे। असली समस्या यह है कि सदी के अंत तक उनके लिए उपयुक्त आवास का बड़ा हिस्सा खत्म हो जाएगा। ऐसे में यदि हमें पौधों को विलुप्त होने से रोकना है, तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भारी कटौती करनी होगी।“
भारत सहित कुछ इलाकों में बढ़ेगी हरियाली, कई में घटेगी विविधता
अध्ययन में इस तथ्य को भी उजागर किया गया है कि जलवायु परिवर्तन का असर दुनिया में हर जगह एक जैसा नहीं होगा। भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, दक्षिण अमेरिका और अमेरिका के कुछ नम क्षेत्रों में नई प्रजातियों के आने से स्थानीय जैव विविधता बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पृथ्वी की करीब 28 फीसदी सतह पर पौधों की प्रजातियों में इजाफा होगा।
लेकिन दूसरी ओर पश्चिमी अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रों में पौधों की विविधता तेजी से घट सकती है। वहां कई प्रजातियों के रहने की सीमाएं सिकुड़ती जाएंगी।
शोधकर्ताओं के मुताबिक “जिन क्षेत्रों में बारिश ज्यादा है या भविष्य में बढ़ने की संभावना है, वहां पौधों की विविधता बढ़ सकती है। लेकिन यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी अमेरिका में कई प्रजातियां अपने आवास खो देंगी।“
अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया को सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना गया है। दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम ऑस्ट्रेलिया में पौधों की 30 फीसदी से अधिक प्रजातियां सदी के अंत तक विलुप्ति होने के ओर करीब पहुंच सकती हैं।
वहीं उत्तरी ध्रुवीय और बोरियल क्षेत्रों में तापमान इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि पौधे उसके साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे। कई जगहों पर जलवायु की उपयुक्त परिस्थितियां हर साल कई किलोमीटर दूर खिसक रही हैं, जबकि अधिकांश पौधे इतनी तेजी से फैल नहीं सकते।
नई दुनिया, नए जंगल और अनजाने रिश्ते
वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दशकों में दुनिया के जंगल और पारिस्थितिक तंत्र पूरी तरह बदल सकते हैं। जिन पौधों ने सदियों तक किसी क्षेत्र में पहचान बनाई, उनकी जगह नई प्रजातियां ले सकती हैं। डोंग का कहना है, “कई प्रजातियां पहली बार एक-दूसरे से मिलेंगी। नए तरह के संबंध बनेंगे, जिनके परिणामों का अनुमान लगाना मुश्किल है। आने वाली दुनिया वैसी नहीं होगी जैसी हमने 40-50 साल पहले देखी थी।“
इन बदलावों का असर सिर्फ पेड़ों-पौधों तक सीमित नहीं रहेगा। परागण, मिट्टी की उर्वरता, जल चक्र और कार्बन भंडारण जैसी प्रक्रियाएं भी प्रभावित होंगी।
संरक्षण की रणनीति बदलने का समय
अध्ययन साफ संकेत देता है कि केवल पौधों को नई जगहों तक पहुंचा देना समाधान नहीं है। यदि उनके लिए अनुकूल जलवायु और सुरक्षित आवास ही तेजी से खत्म होते जाएं, तो “सहायता प्राप्त प्रवासन” जैसी रणनीतियां भी सीमित असर ही दिखा पाएंगी।
वैज्ञानिकों के मुताबिक अब संरक्षण की दिशा बदलने की जरूरत है। इसके लिए सबसे अहम कदम है, ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन में तेजी से कटौती करना। साथ ही उन क्षेत्रों की सुरक्षा करना, जो भविष्य में जलवायु शरणस्थल बन सकते हैं। जंगलों और प्राकृतिक गलियारों को आपस में जोड़ना, ताकि प्रजातियां सुरक्षित रूप से नई जगहों तक पहुंच सकें। इसके साथ ही बीज बैंकों और वनस्पति उद्यानों को मजबूत बनाना, ताकि संकटग्रस्त पौधों को बचाया जा सके।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में धरती अपनी अनगिनत वनस्पतियों और उनसे जुड़ी पारिस्थितिक विरासत को हमेशा के लिए खो सकती है।
हमें समझना होगा कि पौधे धरती पर करीब-करीब हर जीवन की नींव हैं। वे भोजन श्रृंखला का आधार बनाते हैं, कार्बन को सोखते हैं, जल चक्र को नियंत्रित करते हैं और मिट्टी को जीवित रखते हैं। ऐसे में यदि पौधों की दुनिया बदलती है, तो उसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और अंततः इंसानी जीवन पर भी पड़ेगा।
यह संकट सिर्फ पेड़ों और पौधों का नहीं, बल्कि उस पूरे जीवन तंत्र का है जिस पर इंसानी सभ्यता टिकी है। यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार नहीं थमी, तो आने वाली पीढ़ियां शायद उन जंगलों, फूलों और वनस्पतियों को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी, जो कभी धरती की पहचान हुआ करते थे।