ग्लेशियर पीछे हटने से पहाड़ी इलाकों की वनस्पति बदल रही है, जिसका असर मधुमक्खियों और उनके स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

ग्लेशियर पिघलने से मधुमक्खियों में बीमारी का खतरा बढ़ने के आसार: अध्ययन

ग्लेशियर पीछे हटने से बदल रही वनस्पति, फूलों पर बढ़ रहा मधुमक्खियों का मेल और जंगली मधुमक्खियों में रोग फैलने का खतरा बढ़ रहा है।

Dayanidhi

  • ग्लेशियर पीछे हटने से पहाड़ी इलाकों की वनस्पति बदल रही है, जिसका असर मधुमक्खियों और उनके स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

  • बदलते फूलों के कारण जंगली और पालतू मधुमक्खियां एक ही संसाधन इस्तेमाल कर सकती हैं, जिससे रोग फैलने का खतरा बढ़ेगा।

  • शोध में पालतू मधुमक्खियों में पांच रोगजनक मिले, जबकि जंगली मधुमक्खियों में केवल दो रोगजनक पाए गए।

  • पुराने ग्लेशियर क्षेत्रों में जंगली मधुमक्खियों के बीच डिफॉर्म्ड विंग वायरस की मौजूदगी काफी बढ़ती हुई दिखाई दी।

  • वैज्ञानिकों ने बदलते पहाड़ी पर्यावरण में मधुमक्खियों के स्वास्थ्य और रोगों के प्रसार को समझने के लिए और शोध जरूरी बताया।

स्विट्जरलैंड के आल्प्स में ग्लेशियरों के पीछे हटने से सिर्फ बर्फ का क्षेत्र ही कम नहीं हो रहा है, बल्कि वहां का पूरा प्राकृतिक वातावरण भी बदल रहा है। इसका असर मधुमक्खियों और दूसरी जंगली मधुमक्खियों पर भी पड़ सकता है। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने से वनस्पतियों में होने वाले बदलाव कुछ रोगों के एक प्रजाति की मधुमक्खी से दूसरी प्रजाति तक फैलने का खतरा बढ़ा सकते हैं।

यह अध्ययन स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ लॉज़ान, इटली की यूनिवर्सिटी ऑफ मिलान और काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च एंड इकोनॉमिक्स के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। अध्ययन के नतीजे शोध पत्रिका ‘ओइकोस’ में प्रकाशित किए गए हैं।

पांच रोगों की हुई जांच

वैज्ञानिकों ने स्विट्जरलैंड के वैले क्षेत्र में स्थित मोंट मिने ग्लेशियर के आसपास के इलाके का अध्ययन किया। यह क्षेत्र ग्लेशियर के पीछे हटने के बाद धीरे-धीरे विकसित हो रहा है। शोधकर्ताओं ने यहां मधुमक्खियों और जंगली मधुमक्खियों में पांच रोगजनकों की मौजूदगी की जांच की। इनमें तीन वायरस और दो परजीवी शामिल थे।

अध्ययन में पाया गया कि हाल ही में ग्लेशियर से मुक्त हुए इलाकों में पालतू मधुमक्खियों में पांचों रोगजनक मौजूद थे। वहीं, जंगली मधुमक्खियों में इनमें से केवल दो रोगजनक पाए गए।

लेकिन पुराने, यानी लंबे समय से बर्फ से मुक्त इलाकों में स्थिति कुछ अलग थी। यहां जंगली मधुमक्खियों में डिफॉर्म्ड विंग वायरस यानी डीवीवी की मौजूदगी काफी बढ़ गई। यह वायरस आमतौर पर पालतू मधुमक्खियों से जुड़ा माना जाता है।

फूल बन सकते हैं बीमारी फैलने की जगह

शोधकर्ताओं के अनुसार, बीमारी फैलने के पीछे फूलों और मधुमक्खियों के भोजन की तलाश के तरीके की अहम भूमिका हो सकती है। आम तौर पर पालतू मधुमक्खियां कुछ खास पौधों के फूलों पर अधिक जाती हैं, जबकि जंगली मधुमक्खियां दूसरे पौधों का इस्तेमाल करती हैं। इससे दोनों के बीच संपर्क कम रहता है और रोग फैलने की संभावना भी कम हो सकती है।

लेकिन ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ पौधों की दुनिया बदल रही है। शुरुआत में इस इलाके में कुछ ऐसे पौधे तेजी से उगते हैं जो मधुमक्खियों के लिए महत्वपूर्ण भोजन उपलब्ध कराते हैं। समय के साथ इन शुरुआती पौधों की संख्या कम हो सकती है और दूसरे पौधे अधिक फैल सकते हैं।

ऐसे में मधुमक्खियों के पास फूलों के विकल्प कम हो सकते हैं। पालतू और जंगली मधुमक्खियां एक ही फूलों पर अधिक संख्या में पहुंच सकती हैं। यही स्थिति रोगों के फैलने का रास्ता खोल सकती है।

फूलों पर रह सकते हैं वायरस

वैज्ञानिकों का कहना है कि संक्रमित मधुमक्खियां फूलों पर रोगजनकों के कण छोड़ सकती हैं। बाद में जब कोई दूसरी मधुमक्खी उसी फूल पर आती है, तो वह इन रोगजनकों के संपर्क में आ सकती है। इस तरह फूल अलग-अलग मधुमक्खियों के बीच बीमारी के प्रसार का माध्यम बन सकते हैं।

इसका मतलब यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर हमेशा सीधे दिखाई नहीं देता। ग्लेशियर का पीछे हटना एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन इसके साथ पौधों, कीड़ों और दूसरे जीवों के बीच संबंध भी बदलते रहते हैं।

जलवायु परिवर्तन का एक और असर

ग्लेशियरों का पिघलना आमतौर पर पानी की उपलब्धता, पहाड़ी नदियों और जलविद्युत जैसे मुद्दों से जोड़ा जाता है। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि इसका असर इससे कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है। ग्लेशियर के पीछे हटने से एक नया पारिस्थितिकी तंत्र बनता है और उसमें रहने वाले जीवों के बीच संबंध भी बदलते हैं।

मधुमक्खियां खेती और प्राकृतिक वातावरण दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। वे पौधों के परागण में मदद करती हैं और इस तरह खाद्य उत्पादन तथा जैव विविधता में बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसलिए उनके बीच रोगों के फैलने के कारणों को समझना जरूरी है।

और शोध की जरूरत

शोधकर्ताओं का कहना है कि इन नतीजों की पुष्टि के लिए दूसरे ग्लेशियर क्षेत्रों में भी इसी तरह के अध्ययन किए जाने चाहिए। अलग-अलग इलाकों में मधुमक्खियों की संख्या और पौधों की विविधता अलग होती है, इसलिए बीमारी फैलने का तरीका भी अलग हो सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ लॉजान और यूनिवर्सिटी ऑफ मिलान से जुड़े शोधकर्ता के अनुसार, पौधों और परागण करने वाले जीवों के बीच संबंधों को समझना मधुमक्खियों के संरक्षण के लिए जरूरी है। आने वाले अध्ययनों से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि बदलते पहाड़ी पर्यावरण में मधुमक्खियों के बीच रोगों का प्रसार किस तरह बदल रहा है।

इस अध्ययन से एक बात साफ होती है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल तापमान या बर्फ तक सीमित नहीं है। इसके कारण प्रकृति के भीतर मौजूद रिश्तों का पूरा जाल बदल सकता है और उसका असर उन छोटे जीवों पर भी पड़ सकता है, जिन पर हमारा पर्यावरण और खाद्य व्यवस्था काफी हद तक निर्भर करती है।