कुछ चिंताएं दूर की सुर्खियों से नहीं बल्कि रोज आंखों के सामने दिखने वाली चीजों से जन्म लेती हैं। मेरी चिंता भी वहीं से आती है। यह उस बढ़ती आकांक्षा के बीच की खाई से पैदा होती है, जो खासकर फैलते शहरों के किनारे बसे समुदायों में दिखती है। यह खाई उन व्यवस्थाओं व सरकारी तंत्रों की अक्षमता से फैलती है, जो बुनियादी जरूरतें भी ठीक से पूरी नहीं कर पाते।
जहां यह खाई गहरी होती जाती है, वहां बसावटें एक अजीब सा मिश्रित रूप ले लेती हैं। यह बसावटें न तो पूरी तरह ग्रामीण होती हैं और न ही पूरी तरह शहरी। लेकिन जब ढांचा और योजना दोनों ही नदारद हों तो ऐसे इलाकों के झुग्गी जैसी हालत में फिसल जाने का खतरा बना रहता है। यही मैं बिहार के गया जिले के बाहरी इलाके में बसे छोटे से गांव पंचनपुर में देख रही हूं, जहां मैं पिछले चार साल से रह रही हूं।
जिस यूनिवर्सिटी से मैं पीएचडी कर रही हूं वहां से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित पंचनपुर तेजी से शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है। इसका मुख्य कारण बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं हैं। राज्य के एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक केंद्र गया के पास होने की वजह से यहां शैक्षणिक संस्थानों और आवासीय जरूरतों से जुड़ा निर्माण तेजी से बढ़ा है। हर कुछ महीनों में नई दुकानें और छोटे व्यवसाय दिखाई देने लगते हैं।
लेकिन इस विकास के साथ जो चीज कदम नहीं मिला पाई है, वह है बुनियादी ढांचा, जिसमें शामिल है खासकर सीवेज और कचरा प्रबंधन। जो समुदाय कभी जमीन के साथ गहरे जुड़ाव में रहते थे और उसी के जरिए अपने आसपास के पर्यावरण की रक्षा करते थे, वह अब धीरे-धीरे उस भू-दृश्य और उससे जुड़े मूल्यों से कटते जा रहे हैं।
पंचनपुर में मैं रोज जो देखती हूं, वह छह सात साल पहले मौजूद पर्यावरण के प्रति एक खुली उपेक्षा है। हर रोज तरह-तरह का कचरा, जिसमें निर्माण मलबा, इलेक्ट्रॉनिक कचरा और बड़े-बड़े बेकार सामान को एक खुले नाले में या उससे सटे खेतों में फेंक दिया जाता है। यह सब मैं अपनी बालकनी से साफ देख सकती हूं। सब कुछ बिना किसी सोच के साथ और बिना अलगाव के एक साथ डाल दिया जाता है। यह दृश्य मुझे भीतर तक बेचैन कर देता है।
हर बार जब मैं किसी को कचरा फेंकने से रोकने के बारे में सोचती हूं तो एक जाना पहचाना सवाल मन में उभर आता है, अगर यहां नहीं तो फिर कहां। जवाब न मिलने पर मैं नजर फेर लेती हूं। और नजर फेर लेना अपने साथ एक अलग तरह का अपराधबोध ले आता है।
शायद मेरी बेचैनी की जड़ मेरी जागरुकता है, जो शिक्षा के साथ और तेज हो गई है। मुझे पता है कि मैं अकेले टूटी हुई व्यवस्थाओं को ठीक नहीं कर सकती। और यह समस्या सिर्फ पंचनपुर तक सीमित भी नहीं है। देश भर में फैलते शहरों और कस्बों के किनारे बसे गांव इसी तरह के दबावों से जूझ रहे हैं। फिर भी, कुछ न कर पाने की मेरी असमर्थता एक स्थायी बेचैनी में बदल जाती है।
यह असहजता मुझे और जगहों पर भी पीछा करती है। सड़कों पर, सार्वजनिक स्थानों पर और यहां तक कि बसों और ट्रेनों से लोगों को थूकते देखना मुझे उम्मीद से कहीं ज्यादा विचलित करता है। त्योहारों के मौसम में एक भीड़ भरी ट्रेन यात्रा के दौरान एक आदमी ने मुझे अपनी सीट दे दी। कुछ ही पलों बाद, वही आदमी उसी खिड़की से बाहर थूकने लगा। मैंने कुछ नहीं कहा लेकिन वह पल मेरे भीतर अटका रह गया।
हालांकि, मेरी चिंता ने चुपचाप मेरे व्यवहार को बदल दिया है। मैं सोच समझकर जीने की कोशिश करती हूं। अपना थैला साथ रखती हूं, प्लास्टिक के रैपर संभालकर रखती हूं ताकि उन्हें रीसाइकिल किया जा सके, घर में कचरा अलग-अलग करती हूं। अगर बाजार पहुंचने पर मेरे पास थैला नहीं होता तो मैं कुछ भी नहीं खरीदती, यहां तक कि जरूरी सामान भी नहीं। मैं लगभग जुनूनी तरीके से प्लास्टिक से बचती हूं, यह जानते हुए भी कि व्यक्तिगत फैसले व्यवस्था की विफलता की भरपाई नहीं कर सकते।
फिर भी यह सब कभी पर्याप्त नहीं लगता। शायद अब मैं ऐसी ही हो गई हूं। जैसे कुछ लोगों के लिए कचरा फैलाना सामान्य है। वैसे ही अब मेरे लिए लगातार सतर्क रहना और सीमित उपभोग करना सामान्य हो गया है। इसके साथ ही यह अपराधबोध भी कम हो रहा है कि कितनी बार मैंने सब कुछ देखते हुए भी नजर फेर ली है।
यह लेख डाउन टू अर्थ, हिंदी मासिक पत्रिका के फरवरी माह अंक में प्रकाशित हुआ है। पत्रिका की प्रतियां बुक कराने के लिए क्लिक करें