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जलवायु

धरती की सुरक्षित सीमा पार: पृथ्वी की सहन क्षमता से दोगुणा हुआ कार्बन उत्सर्जन

वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि बढ़ते तापमान को डेढ़ डिग्री पर सीमित रखना है तो उत्सर्जन को सालाना 4 से 17 गीगाटन तक सीमित रखना होगा, जबकि मौजूदा उत्सर्जन करीब 37 गीगाटन तक पहुंच चुका है

Lalit Maurya

  • नए वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक दुनिया का मौजूदा कार्बन उत्सर्जन पृथ्वी की सुरक्षित सीमा से दो गुणा से भी ज्यादा हो चुका है।

  • यदि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना है तो सालाना उत्सर्जन 4 से 17 गीगाटन के बीच सीमित होना चाहिए, जबकि अभी यह करीब 37 गीगाटन तक पहुंच चुका है।

धरती की सहन क्षमता की एक सीमा है और चिंता की बात है कि इंसान उस सीमा को पार कर चुका है। इस बारे में किए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि मौजूदा कार्बन उत्सर्जन इतना ज्यादा है कि यह पृथ्वी की सुरक्षित सीमा से दोगुने से भी ऊपर पहुंच चुका है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि इससे जलवायु संकट और गहरा सकता है।

गौतलब है कि धरती और उसपर मौजूद संसाधन असीमित नहीं है। ऐसे में अगर प्रदूषण एक तय सीमा से ज्यादा बढ़ जाए तो यह जलवायु और प्रकृति दोनों के लिए खतरनाक बन जाता है।

इसी खतरे को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की सुरक्षित सीमाओं (प्लैनेटरी बाउंड्रीज) पर विचार दिया है। इसका मतलब है कि पृथ्वी के सिस्टम को सुरक्षित रखने के लिए प्रदूषण और संसाधनों के इस्तेमाल की कुछ सीमाएं तय हैं।

सुरक्षित सीमा से बहुत आगे पहुंच चुका उत्सर्जन

दक्षिण कोरिया के कोरिया एडवांस्ड इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी और अमेरिका की पैसिफिक नार्थवेस्ट नेशनल लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने पाया है कि अगर दुनिया को वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस की सीमा के भीतर रखना है, तो हर साल कार्बन डाइऑक्साइड का सुरक्षित उत्सर्जन चार से 17 गीगाटन के बीच होना चाहिए।

लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा डरावनी है। आज दुनिया हर साल करीब 37 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) वातावरण में छोड़ रही है। यानी मौजूदा उत्सर्जन पृथ्वी की सुरक्षित सीमा से दो गुणा से भी ज्यादा हो चुका है।

इस अध्ययन के नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुए हैं।

अलग-अलग तरीके से मापी जाती थी समस्या

वैज्ञानिकों के मुताबिक अब तक जलवायु परिवर्तन को इस आधार पर आंका जाता था कि वातावरण में कुल मिलाकर कितनी कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) जमा हो चुकी है। इसे “स्टॉक” यानी जमा मात्रा के रूप में देखा जाता था। वहीं दूसरी ओर, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे प्रदूषकों को हर साल पैदा होने वाली मात्रा यानी “फ्लो” के आधार पर मापा जाता था।

क्योंकि इन दोनों समस्याओं को अलग-अलग पैमानों से मापा जा रहा था, इसलिए उनकी गंभीरता की तुलना करना मुश्किल था।

इसी वजह से वैज्ञानिकों ने कार्बन उत्सर्जन को भी उसी वार्षिक उत्सर्जन (फ्लो) के आधार पर दोबारा आंका, जिस आधार पर नाइट्रोजन प्रदूषण को मापा जाता है।

एक साथ सोचना होगा समाधान

अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक हेवोन मैकजीन का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है कि, "जब कार्बन उत्सर्जन को नाइट्रोजन प्रदूषण की तरह ही मापा गया, तो जलवायु संकट की गंभीरता और साफ दिखाई देने लगी।"

उनके मुताबिक अब समय आ गया है कि कार्बन, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे प्रदूषकों को अलग-अलग नहीं बल्कि एक साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। इससे नीतियां तय करना आसान होगा और पर्यावरण की रक्षा के लिए बेहतर रणनीति बनाई जा सकेगी।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अब कार्बन, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे प्रदूषणों को साथ लेकर एकीकृत रणनीति बनाने की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही दुनिया को डीकार्बोनाइजेशन, यानी जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने की प्रक्रिया को भी तेज करना होगा।

5 मार्च को प्रकाशित एक टिप्पणी में प्रोफेसर मैकजीन ने कहा कि पिछले 20 वर्षों में जलवायु से जुड़ी कई तकनीकें विकसित हो चुकी हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त तेजी से लागू नहीं किया गया। यही वजह है कि जलवायु संकट लगातार गहराता जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर उत्सर्जन की रफ्तार पर जल्द लगाम नहीं लगी, तो पृथ्वी की सुरक्षित सीमाएं टूटती जाएंगी और जलवायु संकट आने वाली पीढ़ियों के लिए और भी खतरनाक रूप ले सकता है।