जलवायु परिवर्तन की मार से मक्का, गेहूं और सोयाबीन उत्पादन प्रभावित, 20 साल में दुनिया को 400 अरब डॉलर का नुकसान।
बढ़ती गर्मी और सूखे ने घटाई फसलों की पैदावार, वैज्ञानिकों ने भविष्य में कृषि संकट बढ़ने की चेतावनी दी।
प्रमुख फसलों पर मौसम की मार, गरीब देशों को जलवायु नुकसान का आर्थिक बोझ सबसे अधिक उठाना पड़ रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग से खेती पर बढ़ा दबाव, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय को लेकर नई चिंताएं सामने आई।
उच्च उत्सर्जन जारी रहा तो सदी के अंत तक फसल नुकसान कई गुना बढ़ने की आशंका, शोध में बड़ा खुलासा।
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी और बार-बार पड़ रहे सूखे का असर अब दुनिया की खेती पर साफ दिखाई देने लगा है। एक नए शोध के अनुसार, पिछले दो दशकों में अत्यधिक गर्मी और सूखे के कारण दुनिया की तीन प्रमुख फसलों - मक्का, गेहूं और सोयाबीन के उत्पादन में बड़ी कमी आई है। इससे वर्ष 2000 से 2019 के बीच लगभग 400 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण इन फसलों की पैदावार में करीब 3.5 प्रतिशत की कमी आई। यह कमी सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन जब इसे पूरी दुनिया में उगाई जाने वाली करोड़ों टन फसलों पर लागू किया जाता है तो इसका आर्थिक असर बहुत बड़ा हो जाता है।
हर साल 20 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान
यूरोपीय जियोसाइंसेज यूनियन के शोध में बताया गया है कि जलवायु से जुड़ी गर्मी और सूखे के कारण इन तीनों फसलों को औसतन हर साल 20 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ।
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग देशों के फसल उत्पादन के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने पुराने मौसम रिकॉर्ड से तुलना कर यह पता लगाने की कोशिश की कि बढ़ते तापमान और सूखे का फसलों पर कितना असर पड़ा।
गरीब देशों पर ज्यादा असर
अध्ययन में सामने आया कि जलवायु परिवर्तन का नुकसान सभी देशों में बराबर नहीं है। कम विकसित देशों को इसका ज्यादा आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। इन देशों में फसल नुकसान का असर उनकी अर्थव्यवस्था पर अमीर देशों की तुलना में लगभग ढाई गुना ज्यादा देखा गया।
खेती पर निर्भर गरीब देशों में उत्पादन घटने का सीधा असर किसानों की आय, खाद्य उपलब्धता और स्थानीय बाजार पर पड़ता है। ऐसे देशों में मौसम की मार से निपटने के साधन भी सीमित होते हैं।
भविष्य में और बढ़ सकता है खतरा
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में खेती का संकट और गंभीर हो सकता है। उच्च उत्सर्जन वाली स्थिति में वर्ष 2070 तक फसलों से होने वाला वार्षिक नुकसान कई गुना बढ़ सकता है।
कुछ अनुमानों के अनुसार, साल 2100 तक मक्का, गेहूं और सोयाबीन की पैदावार में करीब 35 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। इससे हर साल 161 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान होने की आशंका है।
खाद्य सुरक्षा पर भी असर
मक्का, गेहूं और सोयाबीन दुनिया की खाद्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण फसलें हैं। गेहूं और मक्का करोड़ों लोगों के भोजन का हिस्सा हैं, जबकि इनका उपयोग पशुओं के चारे और कई उद्योगों में भी होता है।
इन फसलों के उत्पादन में कमी आने से केवल किसानों को नुकसान नहीं होगा, बल्कि खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं और वैश्विक बाजार पर भी दबाव बढ़ सकता है।
किसानों को अपनाने होंगे नए तरीके
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य के नुकसान को कम किया जा सकता है। इसके लिए किसानों को बदलते मौसम के अनुसार खेती के तरीके अपनाने होंगे। कम पानी में होने वाली फसलें, सूखा सहने वाली नई किस्में, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और खेती के समय में बदलाव जैसे उपाय मददगार हो सकते हैं।
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य की जलवायु परिस्थितियों का अनुमान लगाना आसान नहीं है। आने वाले वर्षों में किसानों की तैयारी और सरकारों की नीतियां नुकसान को काफी हद तक प्रभावित करेंगी।
आज से शुरू करनी होगी तैयारी
अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल भविष्य की चिंता नहीं है, बल्कि इसका आर्थिक नुकसान अभी से दिखाई देने लगा है। गर्मी और सूखा दुनिया की प्रमुख फसलों को प्रभावित कर रहे हैं।
खेती और खाद्य सुरक्षा को बचाने के लिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के प्रयासों के साथ-साथ किसानों को बदलते मौसम के लिए तैयार करना भी जरूरी होगा।