जलवायु लक्ष्यों के लिए 2050 तक सालाना कम से कम एक अरब मीट्रिक टन सीओ2 का भूगर्भीय भंडारण जरूरी होगा। फोटो साभार: आईस्टॉक
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धरती के भीतर छिप रही कार्बन डाइऑक्साइड, 2024 में 4.36 करोड़ मीट्रिक टन का नया रिकॉर्ड: रिपोर्ट

लंदन रजिस्टर ऑफ सबसर्फेस सीओ2 स्टोरेज की 2026 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में एक ही साल में 4.36 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड को भूगर्भीय भंडारण के जरिए जमीन के नीचे जमा किया गया

Dayanidhi

  • साल 2024 में भूगर्भीय भंडारण के जरिए 4.36 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड जमीन के नीचे जमा हुई।

  • लंदन रजिस्टर की 2026 रिपोर्ट में 17 देशों की 70 परियोजनाएं शामिल, छह महाद्वीपों में तकनीक का विस्तार हुआ।

  • पेट्रोब्रास की सैंटोस बेसिन परियोजना ने 2024 में 1.42 करोड़ मीट्रिक टन सीओ2 जमा की, वैश्विक भंडारण में बड़ा योगदान दिया।

  • नई समीक्षा के बाद 2023 तक का संचयी भंडारण घटाकर 34.20 करोड़ मीट्रिक टन किया गया, पारदर्शिता की जरूरत बढ़ी।

  • जलवायु लक्ष्यों के लिए 2050 तक सालाना कम से कम एक अरब मीट्रिक टन सीओ2 का भूगर्भीय भंडारण जरूरी होगा।

जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में दुनिया एक नई राह पर आगे बढ़ रही है। कारखानों, बिजलीघरों और अन्य स्रोतों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) को पकड़कर धरती के काफी गहरे हिस्से में चट्टानों के बीच जमा किया जा रहा है। इस तकनीक ने साल 2024 में नया रिकॉर्ड बनाया।

लंदन रजिस्टर ऑफ सबसर्फेस सीओ2 स्टोरेज की 2026 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में एक ही साल में 4.36 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड को भूगर्भीय भंडारण के जरिए जमीन के नीचे जमा किया गया। पिछले करीब तीन दशकों में जमा की गई कुल मात्रा अब 42.17 करोड़ मीट्रिक टन तक पहुंच गई है।

70 परियोजनाएं, 17 देशों में फैला नेटवर्क

इम्पीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में दुनिया की 70 सक्रिय परियोजनाओं के आंकड़े शामिल किए गए हैं। ये परियोजनाएं 17 देशों और छह महाद्वीपों में फैली हैं। रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2016 में जहां सालाना भंडारण 2.10 करोड़ मीट्रिक टन था, वहीं 2024 तक यह बढ़कर 4.36 करोड़ मीट्रिक टन हो गया। यानी आठ साल में यह मात्रा दोगुने से भी अधिक हो गई।

शोध के अनुसार, भूगर्भीय कार्बन भंडारण अब किसी एक देश तक सीमित प्रयोग नहीं, बल्कि दुनिया भर में फैलती तकनीक बन चुका है। लगातार चल रही परियोजनाएं और नए देशों की भागीदारी इसके बढ़ते इस्तेमाल का संकेत देती हैं।

ब्राजील सबसे आगे, अमेरिका का भी बड़ा योगदान

देशों और परियोजनाओं के आंकड़ों में अमेरिका और ब्राजील की भूमिका खास है। अमेरिका की 23 परियोजनाओं ने 2024 में कुल 2.02 करोड़ मीट्रिक टन सीओ2 जमा की। वहीं, ब्राजील की पेट्रोब्रास सैंटोस बेसिन प्री-सॉल्ट ऑयल फील्ड परियोजना अकेले 1.42 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के भंडारण के साथ सबसे आगे रही। यह वैश्विक सालाना आंकड़े का लगभग एक-तिहाई है।

चीन में भंडारण बढ़कर 17 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। इसमें शेंगली ऑयलफील्ड के साथ नई शामिल की गई दाचिंग आनान ऑयलफील्ड परियोजना का योगदान रहा। ऑस्ट्रेलिया में भी मूंबा परियोजना के जुड़ने से भंडारण 17 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया। न्यूजीलैंड और इटली पहली बार इस रजिस्टर में शामिल हुए। नॉर्वे की नॉर्दर्न लाइट्स परियोजना ने अगस्त 2025 में सीओ2 जमीन के नीचे डालना शुरू किया।

2025 के आंकड़े अधूरे, फिर भी उम्मीद की किरण

रिपोर्ट जारी होने तक 12 देशों की 29 परियोजनाओं ने 2025 के आंकड़े दिए थे। इनके मुताबिक, कुल 3.62 करोड़ मीट्रिक टन सीओ2 जमा की गई। हालांकि, इसे पूरे साल का वैश्विक आंकड़ा मानना गलत होगा, क्योंकि कई परियोजनाओं की जानकारी अभी उपलब्ध नहीं थी।

ब्राजील की पेट्रोब्रास परियोजना ने 2025 में 1.96 करोड़ मीट्रिक टन भंडारण की सूचना दी, जो 2024 के मुकाबले काफी अधिक है। चीन की सात परियोजनाओं ने 26 लाख मीट्रिक टन और अमेरिका की छह परियोजनाओं ने 89 लाख मीट्रिक टन भंडारण दर्ज किया।

आंकड़ों में सुधार, पारदर्शिता की जरूरत

इस तकनीक की बढ़ती चर्चा के बीच रिपोर्ट ने एक अहम सवाल भी उठाया है - जमीन के नीचे जमा बताई जा रही सीओ2 की वास्तविक मात्रा कितनी है? नए विश्लेषण के बाद 2023 तक का संचयी भंडारण 35.14 करोड़ मीट्रिक टन से घटाकर 34.20 करोड़ मीट्रिक टन किया गया है। वर्ष 2023 का सालाना आंकड़ा भी 4.52 करोड़ से संशोधित कर 4.17 करोड़ मीट्रिक टन किया गया।

समस्या यह है कि कुछ तेल क्षेत्रों में सीओ2 को जमीन के भीतर डालने के बाद उसका एक हिस्सा दोबारा सतह पर आ जाता है और फिर से इंजेक्ट किया जाता है। ऐसे मामलों में हर बार डाली गई गैस को स्थायी रूप से जमा कार्बन मान लेना वास्तविक तस्वीर को बिगाड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, कुल संचयी भंडारण का 82.3 प्रतिशत हिस्सा तेल उत्पादन से जुड़ी भूगर्भीय भंडारण श्रेणी में आता है। इसलिए सही हिसाब-किताब बेहद जरूरी है।

2050 तक लक्ष्य बहुत बड़ा

भूगर्भीय भंडारण में सीओ2 को गहरी चट्टानों के भीतर रखने का उद्देश्य उसे लंबे समय तक वायुमंडल से दूर रखना है। लेकिन इस तकनीक की सफलता केवल नए रिकॉर्ड बनाने से तय नहीं होगी। यह भी देखना होगा कि कितनी गैस वास्तव में स्थायी रूप से जमीन के नीचे सुरक्षित रहती है।

शोध के मुताबिक, पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2050 तक हर साल कम से कम एक अरब मीट्रिक टन सीओ2 के भूगर्भीय भंडारण की जरूरत होगी। मौजूदा रिकॉर्ड इस दिशा में प्रगति जरूर दिखाता है, लेकिन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भंडारण की रफ्तार को कई गुना बढ़ाना होगा।

धरती के भीतर कार्बन को कैद करना जलवायु संकट से लड़ने का एक महत्वपूर्ण औजार बन सकता है। मगर असली कामयाबी तभी मिलेगी, जब तकनीक का विस्तार हो, आंकड़ों में पारदर्शिता रहे और जमा की गई हर मीट्रिक टन सीओ2 का सही हिसाब दुनिया के सामने हो।