2050 तक दुनिया भर में एसी की संख्या तीन गुणा बढ़कर 560 करोड़ तक पहुंच जाएगी, जिससे वैश्विक तापमान 0.05 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। एसी की बढ़ती मांग के मुख्य कारण हैं गर्म मौसम वाले देशों में बढ़ती आमदनी, शहरीकरण और उपकरणों की सस्ती कीमतें। एसी से होने वाला 60 फीसदी प्रदूषण रेफ्रिजरेंट के रिसाव से होगा, जबकि बिजली की खपत भी प्रमुख कारण है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि अमीर देशों में एसी का इस्तेमाल ज्यादा है, जबकि जहां सबसे अधिक गर्मी पड़ती है, वहां अभी भी एसी की पहुंच सीमित है। अगर सभी को समान रूप से ठंडक उपलब्ध कराई जाए, तो 2050 तक 14,600 करोड़ टन अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि ठंडी राहत के लिए बढ़ती एसी की मांग से जलवायु संकट और तेज़ होगा। समाधान के लिए स्वच्छ ऊर्जा अपनाना, हानिकारक रेफ्रिजरेंट का परित्याग और बेहतर भवन व शहरी योजना जरूरी है।
बढ़ते तापमान के साथ धरती तेजी से गर्म हो रही है। ऐसे में लोग अपने घरों, ऑफिस, स्कूलों में ठंडक पाने के लिए एयर कंडीशनर का सहारा ले रहे हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि यह ठंडक हमारे ग्रह को कितनी महंगी पड़ सकती है।
एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक 2050 तक एसी से जुड़े उत्सर्जन से वैश्विक औसत तापमान 0.05 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक इसकी मुख्य वजह बिजली की खपत में हो रही वृद्धि के साथ-साथ एसी में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक रेफ्रिजरेंट का रिसाव है। देखा जाए तो एसी न सिर्फ बिजली की भारी खपत करता है, बल्कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को भी बढ़ाता है।
इसका सीधा मतलब है, जितनी ज्यादा राहत हम महसूस करना चाहते हैं, हमारी दुनिया उतनी ही तेजी से गर्म होती जाएगी। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर यह सिलसिला यूं ही चलता रहा तो 2050 तक दुनिया के तापमान पर इसका गहरा असर पड़ेगा।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2050 तक गर्म देशों में रह रहे करीब 250 करोड़ लोगों के पास अपना एसी होगा। जबकि अभी करीब 190 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्हें एसी की जरूरत है, लेकिन उनके पास एसी नहीं है। अनुमान है कि 2050 तक गर्म देशों में रह रहे करीब 75 फीसदी एसी का इस्तेमाल शुरू कर देंगे।
एयर कंडीशनर: लग्जरी या जरुरत
एक अनुमान के मुताबिक दुनिया में करीब 200 करोड़ एसी हैं, और 2050 तक यह संख्या करीब तीन गुना बढ़कर 560 करोड़ तक पहुंच जाएगी। 2018 में जारी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण वे उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं जिनका मौसम गर्म है, जैसे चीन और भारत, जहां अब अधिक लोग एसी खरीदने में सक्षम हैं।
भारत की बात करें तो वैश्विक तापमान में जिस तरह से वृद्धि हो रही है उसके चलते आने वाले समय में एयर कंडीशनर लग्जरी नहीं बल्कि वक्त की जरुरत बन जाएंगे। अनुमान है कि 2050 तक भारत में करीब 110 करोड़ एयर कंडीशनर (एसी) लग चुके होंगें।
इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) द्वारा जारी आंकड़ों को देखें तो 2020 में देश में करीब 4.8 करोड़ एसी थे। मतलब कि इन 28 वर्षों में एयर कंडीशनर की संख्या में करीब 23 गुना वृद्धि होने की सम्भावना है।
क्यों बढ़ रहा एसी का इस्तेमाल
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सिर्फ बढ़ते तापमान को नहीं देखा। उन्होंने यह भी समझने का प्रयास किया है कि जलवायु, एसी की मांग और आर्थिक विकास भविष्य में गर्मी को कैसे प्रभावित करेंगे। इसके लिए उन्होंने यह मापा कि नमी और बढ़ती आय भविष्य में एसी की बिक्री को कैसे बढ़ाएंगी। साथ ही शोधकर्ताओं ने एक क्लाइमेट सिम्युलेटर की मदद से तापमान में होने वाली कुल बढ़ोतरी का हिसाब लगाया।
शोधकर्ताओं ने यह गणना भविष्य के पांच अलग-अलग जलवायु परिदृश्यों में की है। ये परिदृश्य, जिन्हें इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) इस्तेमाल करता है, “क्या होगा अगर” के सवालों पर आधारित हैं।
इसमें एक दुनिया है जो जल्द से जल्द ग्रीन एनर्जी को अपनाती है, और दूसरी दुनिया है जो अभी भी जीवाश्म ईंधन पर ज्यादा निर्भर रहती है।
अध्ययन में पाया गया कि बढ़ती आय, शहरीकरण और उपकरणों की कीमतों में आती गिरावट एसी की मांग बढ़ने के मुख्य कारण हैं। एसएसपी245 परिदृश्य के अनुसार 2050 तक एसी की वैश्विक खपत में 190 फीसदी की बढ़ोतरी महज आय की वजह से होगी। शोधकर्ताओं ने पुष्टि की है कि बिजली का उपयोग भी बड़ा कारण है, लेकिन उस समय तक एसी का 60 फीसदी प्रदूषण रेफ्रिजरेंट के रिसाव से होगा।
14,600 करोड़ टन तक अतिरिक्त उत्सर्जन
अध्ययन में एक महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि एसी की जरूरत और उसके इस्तेमाल के बीच भारी खाई है। अमीर क्षेत्रों में लोग ज्यादा एसी का इस्तेमाल करते हैं, जबकि दूसरी तरफ जहां सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती है, वहां अक्सर एसी का इस्तेमाल बेहद सीमित है। लेकिन अगर मौजूदा तकनीक से किसी तरह इस खाई को पाट दिया जाए तो इससे 2050 तक 14,600 करोड़ टन तक अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होंगी।
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि जैसे-जैसे आय बढ़ेगी, कितने नए एसी की जरूरत होगी। नतीजे दर्शाते हैं कि आय बढ़ने के साथ कमजोर क्षेत्रों में भी एसी की मांग काफी बढ़ जाएगी।
अनुमान दर्शाते हैं कि आर्थिक रूप से कमजोर देशों में बढ़ती आय के चलते 9.4 करोड़ नए एसी की जरुरत होगी। वहीं जिन देशों में आय अधिक है वहां 15 करोड़ और सबसे अमीर देशों में 22 करोड़ से ज्यादा नए एसी की जरूरत हो सकती है।
नतीजन ग्रीनहाउस गैसों का जो अतिरिक्त उत्सर्जन होगा, उससे वैश्विक तापमान में 0.003 डिग्री से 0.05 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
समाधान की राह
इस समस्या से निपटने के लिए अध्ययन में दो रास्ते सुझाए हैं। पहला, स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बदलाव और हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल बंद करना। दूसरा, भवन निर्माण और शहरी योजना में सुधार करना ताकि एसी पर निर्भरता कम हो सके।
नतीजे साफ है एसी की ठंडक हमें आराम तो दे सकती है, लेकिन इसके लिए धरती को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। अब सवाल यह है कि हम इसके और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाएंगे।