समुद्र के बढ़ते जलस्तर से 2100 तक हर साल 164.46 अरब डॉलर की पारिस्थितिकी सेवाएं नष्ट होने का अनुमान। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

समंदर चढ़ेगा, तो डूबेगी सिर्फ जमीन नहीं, देशों की खुशहाली भी: अध्ययन

समुद्र के बढ़ते जलस्तर से 2100 तक हर साल 164 अरब डॉलर से ज्यादा की पारिस्थितिकी सेवाओं का नुकसान; सबसे ज्यादा मार उन देशों पर, जिनका कार्बन उत्सर्जन सबसे अधिक नहीं

Dayanidhi

  • समुद्र के बढ़ते जलस्तर से 2100 तक हर साल 164.46 अरब डॉलर की पारिस्थितिकी सेवाएं नष्ट होने का अनुमान।

  • चीन, म्यांमार, ब्राजील, रूस और वियतनाम को समुद्री जलस्तर बढ़ने से सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

  • आर्द्रभूमियां सबसे अधिक प्रभावित होंगी, इनके कुल क्षेत्रफल का 1.21 से 2.20 प्रतिशत हिस्सा डूब सकता है।

  • नीदरलैंड, मिस्र, बहामास, बेल्जियम और इराक को अपनी पारिस्थितिकी संपदा के अनुपात में सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका है।

  • जलवायु संकट के सबसे बड़े पीड़ित सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक नहीं; शोध ने जलवायु न्याय और मुआवजे पर सवाल उठाए हैं।

समुद्र का पानी धीरे-धीरे चढ़ रहा है। कहीं तट सिकुड़ रहे हैं, कहीं खेतों पर खारे पानी का खतरा मंडरा रहा है और कहीं सदियों से जीवन को सहारा देने वाले दलदली इलाके गायब होने की कगार पर हैं। लेकिन समुद्र के बढ़ते जलस्तर की कीमत सिर्फ डूबती जमीन के रूप में नहीं चुकानी पड़ेगी। इसकी चोट उन प्राकृतिक संपदाओं पर भी पड़ेगी, जिनसे इंसान को भोजन, पानी, सुरक्षा और आजीविका मिलती है।

पनास नेक्सस में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस खतरे की आर्थिक तस्वीर सामने रखी है। शोधकर्ताओं के आकलन के मुताबिक, समुद्र के बढ़ते जलस्तर से साल 2100 तक हर साल 100 अरब अंतरराष्ट्रीय डॉलर से अधिक की पारिस्थितिकी सेवाएं नष्ट हो सकती हैं। 'मिडिल ऑफ द रोड' यानी मध्यम जलवायु परिदृश्य में यह नुकसान सालाना 164.46 अरब अंतरराष्ट्रीय डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।

सबसे ज्यादा खतरे में आर्द्रभूमियां

शोध में 2030 से 2100 तक समुद्र के बढ़ते जलस्तर के अलग-अलग जलवायु परिदृश्यों का आकलन किया गया। इसमें जमीन से मिलने वाली चार तरह की सेवाओं- भोजन और संसाधन, पर्यावरणीय नियमन, प्राकृतिक आवास और सांस्कृतिक महत्व - का आर्थिक मूल्यांकन किया गया।

चिंता की बात यह है कि आर्द्रभूमियां यानी वेटलैंड सबसे अधिक अनुपात में प्रभावित हो सकती हैं। अलग-अलग परिदृश्यों में इनके कुल क्षेत्रफल का 1.21 से 2.20 प्रतिशत हिस्सा समुद्र में समा सकता है। ये इलाके बाढ़ का असर घटाने, जैव विविधता बचाने और मछलियों सहित अनेक जीवों को आश्रय देने में अहम भूमिका निभाते हैं।

नुकसान उनका, जिम्मेदारी किसकी?

कुल आर्थिक नुकसान के लिहाज से चीन, म्यांमार, ब्राजील, रूस और वियतनाम सबसे अधिक प्रभावित देशों में होंगे। लेकिन जब किसी देश की कुल पारिस्थितिकी सेवाओं के मुकाबले नुकसान देखा गया, तो तस्वीर बदल गई। नीदरलैंड, मिस्र, बहामास, बेल्जियम और इराक जैसे देशों पर तुलनात्मक रूप से अधिक मार पड़ने का अनुमान है।

शोधकर्ताओं ने देशों के 2024 तक के संचयी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को उनकी आबादी के हिसाब से भी परखा। नतीजा यह रहा कि जिन देशों को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ सकता है, वे सबसे बड़े प्रति व्यक्ति उत्सर्जक नहीं हैं।

जलवायु न्याय का बड़ा सवाल

यह अध्ययन एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है- जलवायु संकट पैदा करने में जिनका योगदान कम है, उसकी सबसे भारी कीमत वे ही क्यों चुकाएं? शोधकर्ताओं के मुताबिक, मध्य शताब्दी के बाद यह असमानता और गहरी हो सकती है।

ऐसे में जलवायु वित्त और 'लॉस एंड डैमेज' यानी नुकसान और क्षति के लिए मिलने वाली सहायता की व्यवस्था में प्रभावित देशों की वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता देना जरूरी होगा। क्योंकि समुद्र की लहरें सीमाएं नहीं पहचानतीं, लेकिन उनके नुकसान का बोझ हर देश पर बराबर नहीं पड़ता।