संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ताजा रिपोर्ट ने दुनिया भर में बढ़ते खाद्य संकट की गंभीर तस्वीर पेश की है। अप्रैल 2026 में वैश्विक खाद्य मूल्य सूचकांक बढ़कर 130.7 अंक पर पहुंच गया, जो लगातार तीसरे महीने हुई वृद्धि को दर्शाता है। सबसे ज्यादा तेजी खाद्य तेल में दर्ज की गई, जिनका सूचकांक 5.9 फीसदी बढ़कर जुलाई 2022 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया।
वहीं अनाज, चावल और मांस की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। अनाज मूल्य सूचकांक 111.3 अंक पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के मुकाबले करीब एक फीसदी अधिक है। वहीं मक्के की कीमतें भी 0.7 फीसदी बढ़ीं।
महंगे उर्वरकों की वजह से किसान कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में गेहूं की बुवाई घटने की आशंका है। धान की कीमतों में भी 1.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज तनाव, महंगे ईंधन, बढ़ती उर्वरक लागत और जलवायु संकट ने वैश्विक खाद्य बाजार को झकझोर दिया है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में सूखे की आशंका, काला सागर क्षेत्र में आपूर्ति बाधाएं और दक्षिण-पूर्व एशिया में उत्पादन घटने की चिंता ने संकट को और गहरा दिया है।
इस बढ़ती महंगाई का सबसे बड़ा असर गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, जहां आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है। रोटी, चावल, तेल और दूध जैसी जरूरी चीजें लाखों लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं।
दुनिया भर में करोड़ों परिवारों की रसोई पर महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में खुलासा किया है कि वैश्विक खाद्य कीमतों में लगातार तीसरे महीने उछाल दर्ज किया गया है।
रुझानों से पता चला है कि अप्रैल 2026 में एफएओ फूड प्राइस इंडेक्स 130.7 अंक पर पहुंच गया, जो मार्च के मुकाबले 1.6 फीसदी, जबकि पिछले साल से दो फीसदी अधिक है। हालांकि यह बढ़ोतरी पिछले महीने की तुलना में थोड़ी धीमी रही, लेकिन तेल, मांस और अनाज की कीमतों में आई तेजी ने दुनिया भर के उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उर्वरकों की बढ़ती लागत, ऊर्जा कीमतों में उछाल और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण खाद्य बाजारों पर दबाव बढ़ रहा है। खासतौर पर होर्मुज गतिरोध ने वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है।
चिंता की बात है कि इसकी वजह से दुनिया के गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए आटा, चावल और तेल खरीदना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। जिन घरों की आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है, वहां यह महंगाई सीधे भूख और पोषण पर असर डाल सकती है।
तेल की आग में झुलसती दुनिया
रिपोर्ट के अनुसार सबसे तेज बढ़ोतरी वनस्पति तेलों की कीमतों में हुई। अप्रैल में खाद्य तेलों का सूचकांक 5.9 फीसदी बढ़ गया और जुलाई 2022 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। गौरतलब है कि तेल मूल्य सूचकांक जो मार्च 2026 में 183.1 अंक दर्ज किया गया था, वो अप्रैल 2026 में बढ़कर 193.9 पर पहुंच गया।
इस दौरान पाम, सोया, सूरजमुखी और रेपसीड तेल सभी महंगे हुए है। एफएओ के मुताबिक इसके पीछे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और बायोफ्यूल की बढ़ती मांग प्रमुख कारण हैं।
एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेताया है कि “ऊर्जा संकट और होर्मुज में तनाव का असर अब खाद्य बाजारों तक पहुंच रहा है। महंगे ईंधन और उर्वरकों ने खेती की लागत बढ़ा दी है, जिसका बोझ आखिरकार आम लोगों पर पड़ रहा है।“
साथ ही दक्षिण-पूर्व एशिया में उत्पादन घटने की आशंका ने भी बाजार को चिंतित किया है। काला सागर क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने के कारण सूरजमुखी तेल महंगा हुआ है।
मौसम-तनाव ने बढ़ाई अनाज की चिंता
एफएओ के अनुसार, अप्रैल में अनाज मूल्य सूचकांक 111.3 अंक पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के मुकाबले करीब एक फीसदी अधिक है। इसके कारणों पर नजर डालें तो अमेरिका के कई हिस्सों में सूखे की आशंका और ऑस्ट्रेलिया में कम बारिश के अनुमान ने बाजार में चिंता बढ़ा दी है।
वहीं मक्के की कीमतें भी 0.7 फीसदी बढ़ीं। ब्राजील में मौसम संबंधी चिंताओं और अमेरिका में सूखे हालात ने आपूर्ति पर दबाव डाला है। वहीं कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण एथेनॉल की मांग बढ़ी है, जिसकी वजह से भी कीमतों पर असर पड़ा है।
इसके अलावा, महंगे उर्वरकों की वजह से किसान कम लागत वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे आने वाले समय में गेहूं की बुवाई घटने की आशंका है। धान की कीमतों में भी 1.9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। कच्चे तेल और परिवहन लागत बढ़ने से कई निर्यातक देशों में उत्पादन और मार्केटिंग का खर्च बढ़ गया, जिसका असर सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ रहा है। हालांकि ज्वार की कीमतों में चार फीसदी की गिरावट दर्ज की गई, जिसकी बड़ी वजह चीन से कमजोर मांग रही।
मांस की वैश्विक कीमतें भी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। एफएओ मांस मूल्य सूचकांक अप्रैल में 129.4 अंक रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 6.4 फीसदी अधिक है। इस दौरान मुर्गी के मांस की कीमतों में भी तेजी आई।
दूध-चीनी ने दी थोड़ी राहत
अप्रैल में जहां अधिकांश खाद्य वस्तुएं महंगी हुईं, वहीं डेयरी और चीनी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है, जोकि राहत की खबर है।
डेयरी मूल्य सूचकांक अप्रैल में 1.1 फीसदी गिर गया। यूरोप और ओशिनिया में दूध की अच्छी पैदावार के कारण मक्खन और पनीर सस्ते हुए। रुझानों पर नजर डालें तो डेयरी मूल्य सूचकांक 120.9 अंक से गिरकर अप्रैल में 119.6 पर पहुंच गया है। इसी तरह चीनी की कीमतें मार्च की तुलना में 4.7 फीसदी और पिछले साल के मुकाबले 21.2 फीसदी तक गिर गईं। इस दौरान चीनी मूल्य सूचकांक 92.8 से गिरकर 88.5 पर पहुंच गया।
इसके कारणों पर नजर डालें तो चीन, थाईलैंड और ब्राजील में बेहतर उत्पादन की उम्मीदों ने बाजार को राहत दी है।
गरीबों की थाली से दूर होता पोषण
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऊर्जा संकट, युद्ध और जलवायु से जुड़ी आपदाएं जारी रहीं, तो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई और बढ़ सकती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन कमजोर देशों और परिवारों पर पड़ेगा, जहां पहले ही लाखों लोग खाद्य असुरक्षा और कुपोषण से जूझ रहे हैं।
बढ़ती कीमतें सिर्फ बाजार से जुड़ा आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की थाली पर सीधा हमला हैं, जो अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा भोजन जुटाने में खर्च करते हैं। ऐसे में रोटी, दूध, तेल और अनाज जैसी बुनियादी चीजें भी लाखों लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं।
ऐसे में अगर हालात नहीं बदले, तो यह संकट आने वाले समय में कुपोषण और सामाजिक असमानता को और गहरा सकता है।