‘पछेती झुलसा’ यानी ‘लेट ब्लाइट’ का शिकार टमाटर; फोटो: आईस्टॉक 
कृषि

आलू-टमाटर जैसी फसलों को पछेती झुलसा से बचाने का वैज्ञानिकों ने खोजा नया 'जैविक समाधान'

स्वीडन, भारत, इटली और ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने एक विशेष ‘पेप्टाइड सीएस5’ विकसित किया है, जो इस रोग के लिए जिम्मेदार 'फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टान्स' पर सीधा और सटीक हमला करता है।

Lalit Maurya

  • जलवायु परिवर्तन के दौर में फसलों पर बढ़ता खतरा अब केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि बीमारियों के नए और अधिक आक्रामक रूपों के रूप में भी सामने आ रहा है।

  • आलू और टमाटर जैसी अहम फसलों को तबाह करने वाली ‘पछेती झुलसा’ (लेट ब्लाइट) बीमारी, जो कभी सीमित इलाकों तक सिमटी थी, अब तेजी से फैल रही है। ऐसे संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने एक बड़ी सफलता हासिल की है।

  • स्वीडन, भारत, इटली और ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित ‘पेप्टाइड सीएस5’ इस रोग के लिए जिम्मेदार जीव फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टान्स पर सीधे और सटीक तरीके से हमला करता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यह केवल हानिकारक रोगाणु को निशाना बनाता है, जबकि अन्य पौधों और पर्यावरण पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।

  • प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पेप्टाइड रोगजनक की वृद्धि रोकने और संक्रमण फैलने से रोकने में सफल रहा है। ऐसे में यह खोज रासायनिक फफूंदनाशकों पर निर्भरता घटाने और टिकाऊ खेती की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है।

  • यह अध्ययन संकेत देता है कि बदलती जलवायु के बीच खेती को बचाने के लिए अब अधिक सटीक, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल जैविक समाधानों की ओर बढ़ना अनिवार्य हो गया है, जो भविष्य की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत आधार दे सकते हैं।

गर्म होती धरती सिर्फ मौसम ही नहीं बदल रही, वह फसलों पर हमला करने वाले पुराने दुश्मनों को भी और ताकतवर बना रही है।

कभी सीमित क्षेत्रों तक रहने वाला यह रोग अब जलवायु परिवर्तन के चलते भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में तेजी से फैल रहा है और फसलों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। ऐसे समय में भारतीय शोधकर्ताओं के सहयोग से स्वीडन के वैज्ञानिकों ने इसके खिलाफ एक नई और अधिक सटीक जैविक रणनीति विकसित कर एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सफलता हासिल की है।

इसी कड़ी में स्टॉकहोम स्थित केटीएच रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने भारत, इटली और ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर एक विशेष ‘पेप्टाइड सीएस5’ विकसित किया है, जो इस रोग के लिए जिम्मेदार जीव 'फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टान्स' पर सीधा और सटीक हमला करता है।

इस पेप्टाइड की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल हानिकारक सूक्ष्मजीवों को निशाना बनाता है, जबकि अन्य पौधों और पर्यावरण को इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचता। बता दें कि ‘फाइटोफ्थोरा इन्फेस्टान्स’, पौधों को नुकसान पहुंचाने वाला एक खतरनाक रोगजनक है, जो आलू-टमाटर जैसी प्रमुख फसलों में ‘पछेती झुलसा (लेट ब्लाइट)’ नाम की घातक बीमारी का कारण बनता है।

जलवायु परिवर्तन से फसलों पर बढ़ता संकट

यह रोग ठंडे और नम वातावरण में तेजी से फैलता है और कुछ ही समय में पूरी फसल को नष्ट कर सकता है। यह रोगजनक पौधे की पत्तियों के साथ-साथ कंद को भी संक्रमित कर सकता है, जिससे उपज पर सीधा और गंभीर असर पड़ता है। संक्रमित पौध के जरिए यह एक खेत से दूसरे खेत और लंबी दूरी तक भी फैलने की क्षमता रखता है, जिससे किसानों के लिए इसको नियंत्रित करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

‘पछेती झुलसा’ का शिकार आलू; फोटो: आईस्टॉक

शोधकर्ताओं के मुताबिक पहले जिन ठंडे पहाड़ी और समशीतोष्ण मौसम वाले इलाकों में यह बीमारी कभी-कभार ही दिखती थी, अब वहां यह ज्यादा समय तक और तेजी से फैल रही है। इसकी वजह मौसम का गर्म और ज्यादा नम होना है, जिससे संक्रमण का मौसम भी लंबा हो गया है।

साथ ही, इस रोग के नए और ज्यादा आक्रामक रूप अब नए इलाकों में फैल रहे हैं, जिससे छिड़काव के पुराने और रोकथाम के तरीके अब उतने असरदार नहीं रह गए हैं।

यह अध्ययन केटीएच रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (स्वीडन), यूनिवर्सिटी ऑफ मिलान (इटली), इंद्रप्रस्थ इंस्टिट्यूट ऑफ इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी (दिल्ली), फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी (ऑस्ट्रेलिया) से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इसके नतीजे इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोमोलेक्यूल्स में प्रकाशित हुए हैं।

बता दें कि पछेती झुलसा वही रोग है, जिसने करीब 200 साल पहले 19वीं सदी में आयरलैंड में भीषण ‘आयरिश आलू अकाल’ को जन्म दिया। इसकी वजह से देश की करीब एक-चौथाई आबादी भूख और पलायन की शिकार हो गई थी।

आज भी यह रोग दुनिया भर में आलू और टमाटर जैसी प्रमुख फसलों को हर साल अरबों डॉलर का नुकसान पहुंचा रहा है। चिंता की बात है कि जलवायु में आ रहे बदलावों के साथ यह खतरा और बढ़ रहा है, क्योंकि बढ़ती नमी और बदलता मौसम इसके फैलने के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर रहे हैं।

‘सीएस5’ पेप्टाइड: रोग पर सटीक हमला

अध्ययन से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक वैभव श्रीवास्तव के मुताबिक, यह रोगजनक असल में फफूंद नहीं बल्कि एक “वॉटर मोल्ड” है, जो शैवाल के अधिक करीब माना जाता है।

इन वॉटर मोल्ड की कोशिका-भित्ति मुख्य रूप से सेलूलोज और अन्य जटिल शर्कराओं से बनी होती है, जबकि चिटिन बहुत कम या लगभग नहीं पाया जाता। इसी कारण पहले वैज्ञानिकों को संदेह था कि चिटिन बनाने वाला एंजाइम इस रोग को रोकने में कितना अहम हो सकता है।

लेकिन अध्ययन में पाया गया कि PiChs नामक यह एंजाइम सच में कुछ खास चिटिन कण बनाता है, और इसे रोकने से रोगजनक की बढ़त और पौधों को संक्रमित करने की क्षमता काफी कम हो जाती है। श्रीवास्तव के अनुसार, “सीएस5 को इसी खास एंजाइम को पहचानकर उससे जुड़ने के लिए डिजाइन किया गया है।“

प्रयोगशाला से खेत तक उम्मीद की नई किरण

प्रयोगशाला परीक्षणों में यह भी देखा गया कि 'पेप्टाइड सीएस5' के असर से न केवल रोगाणु की वृद्धि रुकी, बल्कि संक्रमित आलू के पौधों में संक्रमण फैलना भी रुक गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह तरीका बेहद खास है क्योंकि यह केवल उसी रोगाणु को प्रभावित करता है, बाकी पौधों या मनुष्यों पर इसका कोई नुकसान नहीं होता।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह नई तकनीक भविष्य में किसानों को रासायनिक फफूंदनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है।

इससे न केवल फसलें सुरक्षित होगी, बल्कि पर्यावरण पर भी कम दबाव पड़ेगा। ऐसे में यह शोध आगे चलकर अन्य फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले रोगों के खिलाफ भी नई दिशा दे सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि आने वाले समय में ऐसे पेप्टाइड आधारित उपाय पर्यावरण के लिए सुरक्षित विकल्प बन सकते हैं।

यह अध्ययन दर्शाता है कि बदलती जलवायु के बीच फसलों की सुरक्षा के लिए अब पुराने रासायनिक तरीकों से आगे बढ़कर ज्यादा सटीक और पर्यावरण-अनुकूल जैविक समाधानों की जरूरत है, जो न सिर्फ खेतों को बचा सकते हैं, बल्कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा को भी नई मजबूती दे सकते हैं।