फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
कृषि

क्या ग्लोबल वॉर्मिंग का नया विलेन बन रहा है 'धान'? छह दशकों में दोगुना हुआ खेतों से हो रहा उत्सर्जन

वैज्ञानिकों का यह भी कहना है, अनाज उत्पादन या पैदावार में कोई भी कटौती किए बिना, खेती की व्यावहारिक तकनीकों में मामूली बदलाव करके इस उत्सर्जन को भारी मात्रा में कम किया जा सकता है।

Lalit Maurya

  • दुनिया की आधी से अधिक आबादी का पेट भरने वाली धान की खेती अब जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है।

  • नेचर फूड में प्रकाशित एक नए वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, पिछले छह दशकों में धान के खेतों से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन दोगुना हो गया है और अब यह सालाना करीब 110 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर पहुंच चुका है।

  • पानी से भरे धान के खेतों से निकलने वाली मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें पृथ्वी के तापमान को तेजी से बढ़ा रही हैं।

  • अध्ययन में खुलासा हुआ है कि धान की खेती का बढ़ता रकबा और खेतों में पराली व फसल अवशेषों का बढ़ता उपयोग इस उत्सर्जन वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। पूर्वी एशिया अभी भी मीथेन उत्सर्जन का सबसे बड़ा केंद्र है, जबकि अफ्रीका तेजी से नया हॉटस्पॉट बन रहा है।

  • हालांकि वैज्ञानिकों ने उम्मीद भी जताई है। उनके अनुसार, पानी के बेहतर प्रबंधन, फसल अवशेषों के संतुलित उपयोग और उर्वरकों के दक्ष इस्तेमाल जैसे उपाय अपनाकर बिना पैदावार घटाए उत्सर्जन में करीब 10 फीसदी तक कमी लाई जा सकती है। ऐसे सुधार न केवल जलवायु संकट को कम करने में मदद करेंगे, बल्कि वैश्विक मीथेन कटौती लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भी बेहद अहम साबित हो सकते हैं।

धान केवल एक फसल नहीं, बल्कि दुनिया के अरबों लोगों की खाद्य सुरक्षा की गारंटी है। लेकिन दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी जिस धान पर अपना पेट भरने के लिए निर्भर है, वही अब धरती पर बढ़ते तापमान की एक बड़ी वजह बनता जा रहा है।

एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि पिछले छह दशकों में धान की खेती से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन दोगुणा हो चुका है, जिससे जलवायु संकट और गहरा सकता है।

वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि मौजूदा समय में यह उत्सर्जन सालाना करीब 110 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर पहुंच चुका है। यह अध्ययन बोस्टन कॉलेज से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर फूड में प्रकाशित हुए हैं।

सालाना 110 करोड़ टन पर पहुंचा उत्सर्जन

धान की खेती आमतौर पर पानी से भरे खेतों में की जाती है। ऐसी परिस्थितियों में बड़ी मात्रा में मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं। इनमें मीथेन विशेष रूप से चिंता का विषय है क्योंकि यह थोड़े समय में पृथ्वी के तापमान को तेजी से बढ़ाती है।

ऐसे में अमेरिकी वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए गए इस वैश्विक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते खेती के तौर-तरीकों में सुधार नहीं किया गया, तो जलवायु परिवर्तन के खतरों को रोकना मुश्किल होगा।

हालांकि, इस चिंता के बीच वैज्ञानिकों ने राहत की खबर भी दी है। उनका कहना है कि अनाज उत्पादन या पैदावार में कोई भी कटौती किए बिना, खेती की व्यावहारिक तकनीकों में मामूली बदलाव करके इस उत्सर्जन को भारी मात्रा में कम किया जा सकता है।

क्यों दोगुणा हुआ उत्सर्जन?

अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता और बोस्टन कॉलेज के 'सेंटर फॉर अर्थ सिस्टम साइंस एंड ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी' के निदेशक प्रोफेसर हानकिन तियान के मुताबिक 1960 के दशक के बाद से धान के खेतों से होने वाला उत्सर्जन लगातार बढ़ा है। इसके पीछे दो बड़े कारण हैं, एक ओर दुनिया भर में बढ़ती मांग के साथ धान की खेती का तेजी से विस्तार हुआ है, वहीं दूसरी ओर खेतों में पराली और अन्य फसल अवशेषों को मिलाने की बढ़ती प्रवृत्ति ने मीथेन उत्पादन को बढ़ावा दिया है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक यह अब तक का सबसे व्यापक वैश्विक आकलन है, जिसमें 1961 से 2020 के बीच धान के खेतों से होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का विश्लेषण किया गया है। इसमें मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और मिट्टी में कार्बन भंडारण में होने वाले बदलावों को शामिल किया गया।

अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में धान का रकबा लगातार बढ़ा है। हाल के वर्षों में यह 39.7 करोड़ एकड़ से बढ़कर 42.6 करोड़ एकड़ तक पहुंच गया है।

अध्ययन में पुष्टि हुई है कि विशेष रूप से विकासशील देशों में धान की खेती का तेजी से विस्तार हुआ है, जिससे वैश्विक स्तर पर कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ा है।

इस बात का भी खुलासा हुआ है कि पूर्वी एशिया अभी भी धान से हो रहे मीथेन उत्सर्जन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। वहीं अफ्रीका तेजी से उभरता हुआ नया हॉटस्पॉट बन रहा है। रुझानों से पता चला है कि 1961 से 2024 के बीच अफ्रीका में धान का रकबा सात गुणा बढ़कर करीब चार करोड़ एकड़ तक पहुंच गया है।

बता दें कि अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 1961 से 2020 के बीच जुटाए आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इसे समझने के लिए 21,000 से अधिक जमीनी अवलोकनों, मशीन लर्निंग जैसी उन्नत तकनीकों की मदद ली गई है।

कैसे कम किया जा सकता है उत्सर्जन

हालांकि शोधकर्ताओं ने उम्मीद की एक किरण भी दिखाई है। उनके अनुसार, कृषि के बेहतर प्रबंधन से धान की पैदावार कम किए बिना उत्सर्जन में करीब 10 फीसदी तक की कमी लाई जा सकती है। इसके लिए खेतों में पानी के बेहतर प्रबंधन, फसल अवशेषों के संतुलित उपयोग और नाइट्रोजन उर्वरकों के अधिक दक्ष इस्तेमाल जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये ऐसे व्यावहारिक समाधान हैं जिन्हें किसान आज से ही अपनाना शुरू कर सकते हैं। इससे न केवल कृषि क्षेत्र का जलवायु पर पड़ने वाला दबाव कम होगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर मीथेन उत्सर्जन घटाने के लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदद मिलेगी।

बता दें कि दुनिया के 159 देशों ने 'ग्लोबल मीथेन प्लेज' के तहत इस दशक में मीथेन उत्सर्जन को 30 फीसदी तक कम करने का संकल्प लिया है। ऐसे में धान की खेती में सुधार किए बिना इस लक्ष्य को पाना बेहद मुश्किल है।