संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने चेतावनी दी है कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में बढ़ता तनाव और अल नीनो की आशंका मिलकर दुनिया को अगले छह से 12 महीनों में गंभीर खाद्य संकट की ओर धकेल सकते हैं।
संगठन का कहना है कि यह सिर्फ तेल टैंकरों या जहाजों की आवाजाही का मामला नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक खाद्य व्यवस्था को हिलाने वाला संकट है, जिसका असर सीधे आम लोगों की थाली तक पहुंचेगा।
एफएओ के मुताबिक, संकट की शुरुआत तेल कीमतों से होगी, फिर खाद और बीज महंगे होंगे, खेती की लागत बढ़ेगी, पैदावार घटेगी और आखिरकार भोजन की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी। अप्रैल में वैश्विक खाद्य कीमतें लगातार तीसरे महीने बढ़ीं, जिससे संकट के शुरुआती संकेत साफ दिखने लगे हैं।
चिंता इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि इसी दौरान अल नीनो के सक्रिय होने की आशंका 82 फीसदी तक पहुंच गई है, जिससे कई देशों में सूखा और अनियमित बारिश हो सकती है। यानी युद्ध और मौसम मिलकर खेती को दोहरा झटका दे सकते हैं।
एफएओ ने कहा है कि आने वाले महीनों में सरकारों और किसानों के फैसले तय करेंगे कि दुनिया खाद्य महंगाई झेलेगी या भूख का सामना करेगी। अगर अभी वैकल्पिक व्यापार मार्ग, कमजोर परिवारों के लिए राहत और किसानों को आर्थिक मदद जैसे कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट करोड़ों लोगों की रसोई और जीवन पर भारी पड़ सकता है।
मध्य पूर्व में गहराते तनाव के बीच 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' के बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक ऐसा झटका लगा है, जो दुनिया को अगले छह से 12 महीनों के भीतर एक भीषण खाद्य संकट में धकेल सकता है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि इस संकट से निपटने के लिए दुनिया के पास समय बहुत तेजी से हाथ से निकलता जा रहा है। एफएओ के मुताबिक, यह सिर्फ समुद्री जहाजों की आवाजाही में मामूली रुकावट का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया की कृषि और खाद्य व्यवस्था को तहस-नहस करने वाला एक बड़ा 'सिस्टमैटिक शॉक' है, जो दुनिया भर में खाद्य संकट की शुरुआत बन सकता है।
छह से 12 महीने बेहद निर्णायक
एफएओ ने चेताया है अगले छह से 12 महीनों में खाद्य कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं और कमजोर देशों में भूख और खाने की कमी का संकट गहरा सकता है।
एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो का कहना है, "समय तेजी से निकल रहा है। आज किसान खाद, बीज और फसल से जुड़े जो फैसले लेंगे, वही तय करेंगे कि आने वाले महीनों में दुनिया खाद्य महंगाई की मार झेलेगी या नहीं। उन्होंने कहा अब समय आ गया है कि देश गंभीरता से सोचें कि इस संकट से निपटने की अपनी क्षमता कैसे बढ़ाएं। उन्हें यह समझना होगा कि आपूर्ति में रुकावट जैसे झटकों को झेलने के लिए अपनी तैयारी और मजबूती कैसे बढ़ाई जाए, ताकि इसके असर को कम से कम किया जा सके।
उन्होंने सरकारों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, निजी क्षेत्र और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और शोध संस्थानों से एक साथ आकर देशों की मदद करने की अपील की है। उनका मानना है कि सभी पक्षों को मिलकर ऐसे उपाय करने चाहिए, जिससे देश मौजूदा संकट का बेहतर तरीके से सामना कर सकें और खाद्य व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को कम किया जा सके।
संकट की क्रोनोलॉजी: ईंधन से थाली तक पहुंचेगी आग
दुनिया के कई देशों में इस संकट का असर दिखने भी लगा है। अप्रैल में एफएओ का खाद्य मूल्य सूचकांक लगातार तीसरे महीने बढ़ा। इस दौरान सबसे ज्यादा तेजी खाद्य तेल में दर्ज की गई, जिनका सूचकांक 5.9 फीसदी बढ़कर जुलाई 2022 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया।
इसकी बड़ी वजह ऊर्जा कीमतों में उछाल और मध्य पूर्व में चल रहा तनाव है।
एफएओ की रिपोर्ट बताती है कि यह संकट एक श्रृंखला की तरह बढ़ेगा, पहले तेल महंगा होगा, फिर खाद और बीज, उसके बाद खेती की लागत बढ़ेगी, पैदावार घटेगी और अंततः आम आदमी की थाली और महंगी हो जाएगी।
एफएओ के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेताया है कि “ऊर्जा संकट और होर्मुज में तनाव का असर अब खाद्य बाजारों तक पहुंच रहा है। महंगे ईंधन और उर्वरकों ने खेती की लागत बढ़ा दी है, जिसका बोझ आखिरकार आम लोगों पर पड़ रहा है।“
दोहरी मार: युद्ध के साथ 'अल नीनो' का खतरा
चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इसी दौरान अल नीनो के मजबूत होने की आशंका है। इससे सूखा, अनियमित बारिश और तापमान में बदलाव कई देशों की खेती को प्रभावित कर सकता है। यानी युद्ध और मौसम दोनों मिलकर दुनिया के लिए दोहरी मार बन सकते हैं।
बता दें कि अमेरिकी मौसम विज्ञान केंद्र ने चेताया है कि प्रशांत महासागर में 'अल नीनो' के पनपने की आहट तेज हो गई है। अमेरिकी वैज्ञानिकों के मुताबिक मई से जुलाई 2026 के बीच इसकी शुरुआत की आशंका 82 फीसदी तक पहुंच चुकी है। इसके बाद सर्दियों तक जाते-जाते (दिसंबर 2026 से फरवरी 2027) तक इसके बने रहने की आशंका 96 प्रतिशत बताई गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसान और सरकारें आज खाद के इस्तेमाल, आयात और फसलों के चयन को लेकर जो भी फैसले ले रही हैं, वही तय करेंगे कि आने वाले महीनों में दुनिया भूखी सोएगी या सुरक्षित रहेगी। ऊपर से अल नीनो के सक्रिय होने की पूरी आशंका है, जो कई देशों में सूखा और मौसम का मिजाज बिगाड़ देगा, जिससे यह संकट कहीं ज्यादा गहरा सकता है।
किसान के फैसले, दुनिया का भविष्य
इस महा-संकट से निपटने के लिए एफएओ ने सरकारों के सामने एक त्रि-स्तरीय (अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक) कार्ययोजना रखी है। इसके तहत देशों को सलाह दी गई है कि वे आम जनता को भारी वित्तीय बोझ में डालने वाली अंधाधुंध सब्सिडी देने के बजाय, केवल कमजोर और ग्रामीण परिवारों को डिजिटल रजिस्टर के जरिए सीधे मदद पहुंचाएं।
खाद की कमी से निपटने के लिए खेतों में अनाज के साथ दलहन उगाने जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए, ताकि यूरिया पर निर्भरता कम हो सके।
एफएओ के एग्रीफूड इकोनॉमी विभाग के निदेशक डेविड लाबोर्डे का कहना है कि वैकल्पिक व्यापार मार्ग तलाशना जरूरी है। इनमें अरब प्रायद्वीप और लाल सागर के रास्ते शामिल हैं, लेकिन इनकी क्षमता सीमित है। इसलिए बड़े उत्पादक देशों को निर्यात रोकने जैसे कदमों से बचना होगा, नहीं तो खाद्य आपूर्ति और बिगड़ सकती है।
खाद्य संगठन ने किसानों को वित्तीय सुरक्षा देने पर भी जोर दिया है। इसके तहत छोटे और मध्यम कृषि उद्योगों को बचाने के लिए बैंकों के जरिए कम ब्याज पर आपातकालीन कर्ज दिए जाएं, जिनकी वसूली फसलों की कटाई के समय हो और किसानों को कम से कम 6 से 9 महीने की मोहलत मिले। साथ ही, मोजाम्बिक और पेरू की तर्ज पर डिजिटल किसान रजिस्ट्री और मोबाइल मनी के जरिए सीधे आर्थिक मदद ट्रांसफर की जाए।
अभी लेने होंगे बड़े फैसले
वहीं भविष्य में ऐसे संकटों से हमेशा के लिए बचने के लिए दुनिया को बंदरगाहों, अनाज भंडारण और परिवहन व्यवस्था को मजबूत करने की सिफारिश की गई है। डीजल से चलने वाले पंपों को हटाकर सिंचाई प्रणालियों को सौर ऊर्जा पर शिफ्ट करना होगा और ड्रोन व कृषि की स्मार्ट तकनीकों का इस्तेमाल कर खाद की बर्बादी रोकनी होगी। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में उन्नत तकनीकों को बढ़ावा देने की भी सलाह एफएओ ने दी है।
एफएओ ने अंत में आगाह किया कि अगर दुनिया के देशों ने बहुपक्षीय विकास बैंकों के जरिए वित्तीय मदद की खिड़की तुरंत नहीं खोली और कर्ज से दबे गरीब देशों को खाद-अनाज आयात करने के लिए रियायती फंड नहीं दिया, तो बहुत देर हो जाएगी।
समय रहते उठाए गए कदम ही भुखमरी के इस वैश्विक चक्रवात को रोक सकते हैं। सीधी बात यह है कि 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' में पैदा हुआ यह संकट हजारों किलोमीटर दूर बैठे आम लोगों की रसोई तक पहुंच सकता है।
अगर दुनिया ने अभी तैयारी नहीं की, तो आने वाले महीनों में महंगाई केवल बाजार की खबर नहीं होगी, बल्कि करोड़ों परिवारों की थाली और पेट का सवाल बन जाएगी।