जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच केंद्र सरकार ने लद्दाख में पर्यावरण अनुकूल कृषि को समाधान के रूप में आगे बढ़ाने का दावा किया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार 10,000 हेक्टेयर भूमि को जैविक कृषि में परिवर्तित किया गया है और 18,929 किसानों को इससे जोड़ा गया है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सॉइल टेस्टिंग लैब, सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सूखा-रोधी फसलों के वितरण जैसे कदमों के जरिए नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को जलवायु अनुकूल बनाने की कोशिश की जा रही है।
बढ़ते शहरीकरण, पर्यटन के दबाव, जल संकट और पिघलते ग्लेशियरों की चुनौती के बीच यह पहल दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में एक रणनीतिक प्रयास के रूप में पेश की गई है।
वहीं एक अन्य मामले में शहरी पर्यावरण प्रबंधन की तस्वीर उतनी संतोषजनक नहीं दिखती। इंदिरापुरम में फैले ठोस कचरे और कथित अव्यवस्थित डंपिंग को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कड़ा रुख अपनाया है।
ट्रिब्यूनल ने गाजियाबाद नगर निगम को ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 के पूर्ण पालन के निर्देश देते हुए दो महीने में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। सड़कों पर बिखरा कचरा, अतिक्रमण और खुले में बहता गंदा पानी यह संकेत देता है कि नियम और योजनाएं होने के बावजूद जमीनी अमल में गंभीर खामियां बनी हुई हैं।
दोनों घटनाएं मिलकर एक व्यापक तस्वीर पेश करती हैं, जहां एक ओर जलवायु संकट से जूझते संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यावरण अनुकूल विकास के मॉडल विकसित करने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी ओर तेजी से फैलते शहरी इलाकों में बुनियादी पर्यावरणीय प्रबंधन अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
लद्दाख में बढ़ते जलवायु संकट, तेजी से हो रहे शहरीकरण, पर्यटन के दबाव, पानी की कमी और पिघलते ग्लेशियरों को लेकर उठी चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है।
कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने 20 फरवरी 2026 को दाखिल रिपोर्ट में कहा कि लद्दाख में जलवायु संकट से निपटने, पर्यावरण अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए व्यापक और लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।
मिट्टी की सेहत पर खास फोकस
रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रधान मंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीएम-आरकेवीवाई) के तहत ‘मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता’ पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। किसानों को संतुलित और समझदारी से उर्वरकों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
इसके साथ ही जैविक खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी उद्देश्य से 2014-15 से मृदा स्वास्थ्य कार्ड स्कीम लागू की गई है, ताकि मिट्टी की उर्वरता, कृषि उत्पादकता और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
लद्दाख में अब तक 4,997 मृदा स्वास्थ्य कार्ड किसानों को जारी किए जा चुके हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में 900 कार्ड जारी करने का लक्ष्य रखा गया था, जिनमें से 450 कार्ड जारी किए जा चुके हैं। योजना के विभिन्न घटकों के लिए 0.95 करोड़ रुपये की राशि भी जारी की गई है।
लैब, प्रशिक्षण और जागरूकता
मिट्टी की जांच को मजबूत बनाने के लिए स्वीकृत तीन स्थाई मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं (सॉइल टेस्टिंग लैब) में से दो स्थापित की जा चुकी हैं। इसके अलावा गांव स्तर पर भी 12 प्रयोगशालाओं को भी मंजूरी दी गई है। योजना के तहत 348 प्रदर्शन कार्यक्रम और 108 किसान प्रशिक्षण आयोजित किए गए हैं।
1,200 हेक्टेयर क्षेत्र में सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है, जबकि 25 हेक्टेयर भूमि में मृदा सुधार कार्य किए गए हैं। ‘स्कूल सॉइल हेल्थ प्रोग्राम’ के तहत 17 स्कूलों को भी जोड़ा गया है, ताकि नई पीढ़ी को भी मिट्टी संरक्षण के प्रति जागरूक किया जा सके।
जैविक कृषि की ओर बड़ा कदम
लद्दाख में 10,000 हेक्टेयर भूमि को जैविक कृषि में परिवर्तित किया गया है, जिससे 18,929 किसानों को लाभ मिला है। परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत 2015-16 से अब तक 541.85 लाख रुपए (केंद्रांश) जारी किए जा चुके हैं।
पानी की घटती उपलब्धता को देखते हुए सूखा-रोधी फसल किस्मों का वितरण भी किया जा रहा है, ताकि जलवायु परिवर्तन के असर को कम किया जा सके।
स्पष्ट है कि लद्दाख जैसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र वाले क्षेत्र में कृषि को पर्यावरण और जलवायु अनुकूल बनाने की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं। हालांकि, चुनौती बड़ी है, अब देखना यह होगा कि ये प्रयास जमीन पर कितने असरदार साबित होते हैं।
‘डंपिंग ग्राउंड’ बनते इंदिरापुरम पर एनजीटी सख्त, दो महीनों में मांगी रिपोर्ट
गाजियाबाद के इंदिरापुरम में फैली गंदगी पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है। 23 फरवरी 2026 को दिए अपने आदेश में ट्रिब्यूनल ने गाजियाबाद नगर निगम को साफ निर्देश दिए कि इंदिरापुरम में ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 का पूरी तरह ईमानदारी से पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा जहां-जहां कचरा उत्पन्न होता है, वहां नियमित अंतराल पर डस्टबिन लगाए जाएं ताकि सड़कों पर कूड़ा न फैले। साथ ही इन डस्टबिनों की नियमित सफाई भी की जाए। नगर निगम को दो महीने के भीतर आदेशों के पालन और की गई कार्रवाई पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इंदिरापुरम का बड़ा हिस्सा म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट का “डंपिंग ग्राउंड” बन गया है।
सड़कों के किनारे अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है, गंदा पानी खुले में बह रहा है और नालों में मिल रहा है। उनका कहना है कि ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 का पालन न तो प्रभावी ढंग से हो रहा है और न ही सही तरीके से लागू किया जा रहा है। आरोपों के समर्थन में तस्वीरें भी ट्रिब्यूनल के समक्ष पेश की गईं।
वहीं, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने 21 फरवरी 2026 को अपनी रिपोर्ट में बताया कि 12 फरवरी को अधिकारियों ने 17 स्थानों का निरीक्षण किया था और उनकी स्थिति का ब्यौरा पेश किया गया है। नगर निगम की ओर से ट्रिब्यूनल को बताया गया कि सभी चिन्हित स्थानों की सफाई के लिए पर्याप्त कार्रवाई की जा चुकी है और यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि किसी भी क्षेत्र में ठोस कचरा बिखरा न रहे।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या जमीनी स्तर पर वास्तव में हालात सुधरते हैं या कागजी दावों तक ही सीमित रहते हैं। एनजीटी के सख्त निर्देशों ने साफ कर दिया है कि शहरों में कचरा प्रबंधन को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।