प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, मछली पकड़ने के जाल और आवास का नुकसान डॉल्फिन के लिए गंभीर खतरे बनते जा रहे हैं। फोटो साभार: आईस्टॉक
वन्य जीव एवं जैव विविधता

विश्व डॉल्फिन दिवस: नदियों और समुद्रों की मुस्कान बचाने की जरूरत

डॉल्फिन संरक्षण की बढ़ी चिंता, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और मछली पकड़ने के जाल से बढ़ रहा खतरा; संरक्षण के लिए जागरूकता तथा प्रभावी कदम उठाना जरूरी

Dayanidhi

  • 12 सितंबर को विश्व डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य डॉल्फिन संरक्षण और उनके सामने मौजूद खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

  • डॉल्फिन अपनी खास सीटी से एक-दूसरे की पहचान करती हैं और सामाजिक समूहों में रहकर आपसी सहयोग करती हैं।

  • प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, मछली पकड़ने के जाल और आवास का नुकसान डॉल्फिन के लिए गंभीर खतरे बनते जा रहे हैं।

  • भारत में 2021-23 के सर्वेक्षण में करीब 6,327 नदी डॉल्फिन होने का अनुमान लगाया गया था।

  • नए सर्वेक्षण में सुंदरबन और ओडिशा में इरावाडी डॉल्फिन को शामिल कर संरक्षण योजनाओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।

हर साल 12 सितंबर को विश्व डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है। यह दिन डॉल्फिन के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने और उनके संरक्षण की जरूरत को समझाने का अवसर है। डॉल्फिन अपनी बुद्धिमत्ता, सामाजिक व्यवहार और इंसानों से मिलती-जुलती कई खूबियों के लिए जानी जाती हैं। लेकिन आज नदियों और समुद्रों में रहने वाली डॉल्फिन कई तरह के खतरों का सामना कर रही हैं।

विश्व डॉल्फिन दिवस का उद्देश्य केवल इस जलीय जीव की खूबसूरती का जश्न मनाना नहीं है, बल्कि लोगों को यह बताना भी है कि डॉल्फिन को सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है।

सीटी से होती है पहचान

डॉल्फिन की दुनिया कई मायनों में बेहद दिलचस्प है। हर डॉल्फिन एक खास तरह की सीटी निकालती है, जिससे दूसरी डॉल्फिन उसे पहचान सकती हैं। इसे वैज्ञानिक उनकी पहचान वाली सीटी मानते हैं, जो कुछ हद तक इंसानों के नाम की तरह काम करती है।

जब डॉल्फिन को उसकी अपनी सीटी की आवाज सुनाई जाती है, तो वह प्रतिक्रिया देती है। माना जाता है कि यह क्षमता डॉल्फिन को एक-दूसरे के संपर्क में रहने में मदद करती है, खासकर तब जब वे एक-दूसरे को देख नहीं पातीं।

झुंड में रहता है जीवन

डॉल्फिन बेहद सामाजिक जीव हैं। वे समूहों में रहती हैं, जिन्हें ‘पॉड’ कहा जाता है। इन समूहों में कुछ डॉल्फिन से लेकर सैकड़ों तक डॉल्फिन हो सकती हैं। वे साथ मिलकर शिकार करती हैं और एक-दूसरे की देखभाल भी करती हैं।

बीमार या घायल डॉल्फिन को समूह की दूसरी डॉल्फिन सहारा देती हैं। मादा डॉल्फिन के बच्चे के जन्म के समय भी दूसरी डॉल्फिन उसकी मदद करती हैं। उनका यह व्यवहार बताता है कि डॉल्फिन के बीच मजबूत सामाजिक संबंध होते हैं।

डॉल्फिन के सामने बढ़ते खतरे

जंगल में रहने वाली डॉल्फिन के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आवास का नष्ट होना शामिल है। समुद्र का बढ़ता तापमान भी उनके जीवन को प्रभावित कर रहा है और उनके प्रजनन पर असर डाल रहा है।

व्यावसायिक मछली पकड़ने के दौरान इस्तेमाल होने वाले जाल और दूसरे उपकरण डॉल्फिन के लिए बड़ा खतरा हैं। कई डॉल्फिन इनमें फंसकर घायल हो जाती हैं या उनकी मौत हो जाती है। इसके अलावा कुछ देशों में डॉल्फिन का शिकार आज भी कानूनी है।

मानव गतिविधियों के कारण समुद्री तटों, नदियों और खुले समुद्र में उनके प्राकृतिक आवास लगातार प्रभावित हो रहे हैं। प्रदूषण और बदलती जलवायु इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।

नदी डॉल्फिन का महत्व

नदी डॉल्फिन केवल एक जलीय जीव नहीं, बल्कि नदी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं। नदी डॉल्फिन शीर्ष शिकारी के रूप में काम करती हैं और खाद्य श्रृंखला को संतुलित रखने में मदद करती हैं। जहां नदी डॉल्फिन की संख्या स्वस्थ होती है, वहां पूरे नदी तंत्र की स्थिति भी बेहतर मानी जाती है।

दुर्भाग्य की बात है कि दुनिया की सभी नदी डॉल्फिन प्रजातियां खतरे में हैं या विलुप्त होने के कगार पर हैं। ऐसे में उनका संरक्षण नदियों और उनमें रहने वाले दूसरे जीवों के भविष्य के लिए भी जरूरी है।

भारत में डॉल्फिन संरक्षण

भारत में भी डॉल्फिन संरक्षण को लेकर प्रयास किए जा रहे हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार, 2021-23 में किए गए पिछले देशव्यापी सर्वेक्षण में भारत में करीब 6,327 नदी डॉल्फिन होने का अनुमान लगाया गया था।

इनमें गंगा नदी डॉल्फिन की मौजूदगी गंगा, यमुना, चंबल, गंडक, घाघरा, कोसी, महानंदा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र में दर्ज की गई। वहीं, सिंधु नदी डॉल्फिन की एक छोटी आबादी ब्यास नदी में पाई जाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार में इनकी संख्या सबसे अधिक रही, जबकि पश्चिम बंगाल और असम भी इनके संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

संरक्षण का दायरा होगा और व्यापक

जारी सर्वेक्षण में पहले की तरह मानकीकृत पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस बार कुछ नए क्षेत्रों और नदी तंत्रों को भी शामिल किया गया है। इसके तहत सुंदरबन और ओडिशा में इरावाडी डॉल्फिन का भी आकलन किया जाएगा।

इससे डॉल्फिन की संख्या के साथ-साथ उनके सामने मौजूद खतरों और उनके आवास की स्थिति की बेहतर जानकारी मिल सकेगी। यह जानकारी ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ के तहत भविष्य की संरक्षण योजनाओं को मजबूत करने में मदद करेगी।

डॉल्फिन बचाना हमारी जिम्मेदारी

विश्व डॉल्फिन दिवस हमें याद दिलाता है कि डॉल्फिन की सुरक्षा केवल सरकार या संरक्षण संगठनों की जिम्मेदारी नहीं है। नदियों और समुद्रों को साफ रखना, प्लास्टिक और प्रदूषण कम करना तथा जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास को बचाना भी जरूरी है।

डॉल्फिन स्वस्थ नदियों और समुद्रों की पहचान हैं। इन्हें बचाना दरअसल हमारे जल स्रोतों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाना है। इसलिए इस विश्व डॉल्फिन दिवस पर डॉल्फिन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ उनके सुरक्षित भविष्य के लिए प्रयास करने का संकल्प लेना जरूरी है।