फोटो साभार- विपिन कपूर सैनी ( फोटो पोबितोरा वाइल्डलाइफ सेंचुरी , असम से हैं) 
वन्य जीव एवं जैव विविधता

जंगली जल भैंसा: तराई से गायब ‘इकोसिस्टम इंजीनियर’ को फिर से बसाने की कोशिश

तराई से लगभग गायब हो चुके जंगली जल भैंसे को काजीरंगा से कान्हा लाकर पुनर्स्थापित करने की पहल, शिकार, रोग और आवास विनाश से उजड़े ऐतिहासिक भू-दृश्य को फिर से जीवित करने की कोशिश

Vipin Kapoor Sainy, Jagadeesh Ramasamy, Dr. H Raja Mohan

एक ऐसे पशु की कहानी, जो गजेटियरों से गायब हो गया,  भारतीय पौराणिक परंपरा में महिष केवल एक पशु नहीं, बल्कि शक्ति, सामर्थ्य और उग्रता का प्रतीक रहा है। महिषासुर का भैंसे के रूप में चित्रण और देवी के साथ उसका युद्ध भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में इस पशु की असाधारण शक्ति को स्थापित करता है। यह कहना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा कि महिषासुर की कथा सीधे जंगली जल भैंसे (बुबालस अर्नी) पर आधारित थी। फिर भी एक रोचक सांस्कृतिक साम्य अवश्य दिखाई देता है।

जिन भू-दृश्यों में कभी जंगली जल भैंसों के विशाल झुंड विचरण करते थे, वहां आज उनकी उपस्थिति नहीं है। पशु स्वयं लुप्त हो गया, पर उसकी स्मृति लोककथाओं, साहित्य और पुराने प्रशासनिक अभिलेखों में कहीं-कहीं अब भी दिखाई देती है।

ब्रिटिश भारत के जिला गजेटियरों में दर्ज उन संक्षिप्त टिप्पणियों को पढ़ना आज लगभग अविश्वसनीय लगता है। कुछ पंक्तियां मात्र यह बताती हैं कि अमुक जिले में हाथी अब नहीं पाए जाते और जंगली भैंसा भी समाप्त हो चुका है। प्रशासनिक भाषा में लिखी गई ये पंक्तियां उस समय शायद केवल एक तथ्य थीं; आज वे एक खोए हुए पारिस्थितिक संसार का दस्तावेज हैं।

लगभग सवा सौ वर्ष बाद, उसी प्रजाति को भारत के एक दूसरे ऐतिहासिक भू-दृश्य मध्य भारत में फिर से स्थापित करने का प्रयास हुआ है। अप्रैल 2026 में काजीरंगा से कान्हा तक जंगली जल भैंसों का स्थानांतरण केवल एक संरक्षण अभियान नहीं था। यह उस प्रश्न की वापसी भी थी, जिसे तराई ने एक शताब्दी से अधिक पहले खो दिया था।

क्या जंगली जल भैंसा फिर से अपनी पुरानी भारतीय तराई में लौट सकता है?

इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है। लेकिन इसके पक्ष में इतिहास भी है, पारिस्थितिकी भी और अब पुनर्स्थापना विज्ञान का अनुभव भी।

तराई की सर्दियां कभी शिकार अभियानों के लिए प्रसिद्ध थीं। नवंबर आते ही, जब वर्षा और बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतर जाता और मलेरिया का मौसम पीछे छूट जाता, खीरी, पीलीभीत और बहराइच के वन क्षेत्रों में हाथियों की कतारें दिखाई देने लगती थीं। घास इतनी ऊंची होती कि कई स्थानों पर वह हाथी की पीठ पर बैठे व्यक्ति से भी ऊपर निकल जाती। हाथियों के पीछे तंबू, सामान, अग्निशमन दल और प्रशासनिक अधिकारी चलते थे।

इन अभियानों का उद्देश्य केवल वन्यजीवों को देखना नहीं था। बड़े शिकार उस समय प्रतिष्ठा, मनोरंजन और औपनिवेशिक शासन-संस्कृति का हिस्सा थे।

बाद में जिला गजेटियरों में इन अभियानों का उल्लेख सूखे प्रशासनिक विवरणों के रूप में दर्ज हुआ। उनमें बाघ, बारहसिंगा, सांभर, भालू, गैंडा और बार-बार एक विशालकाय पशु का नाम आता है- जंगली जल भैंसा।

आज लखीमपुर-खीरी के गन्ने के खेतों के बीच खड़े होकर उन विवरणों की कल्पना करना कठिन है। लेकिन आर. ए. स्टरंडेल की नेचुरल हिस्ट्री ऑफ द मेमलिया ऑफ इंडिया एंड सायलन  (1884), उस समय के शिकार साहित्य और जर्नल ऑफ द बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के प्रारंभिक अभिलेख एक ऐसे भू-दृश्य की ओर संकेत करते हैं जो आज लगभग समाप्त हो चुका है।

उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक ऊपरी गंगा के मैदानी क्षेत्रों की जलोढ़ सवाना घासभूमियों में जंगली जल भैंसों के झुंड सामान्य दृश्य हुआ करते थे। शारदा नदी के पार, वर्तमान नेपाल के शुक्लाफांटा क्षेत्र में भी बड़े झुंडों के उल्लेख मिलते हैं।

फिर वह पशु धीरे-धीरे गायब हुआ। एच. आर. नेविल की खीरी- ए गजेटियर (1905) में दर्ज विवरण बताता है कि जिले के वन्यजीवों की संख्या में भारी गिरावट आ चुकी थी। उसी प्रशासनिक विवरण में हाथी के जिले से गायब हो जाने और जंगली भैंसे के समाप्त हो जाने का उल्लेख मिलता है जबकि कभी दोनों सामान्य थे।

गोरखपुर के गजेटियर में विवरण और भी स्पष्ट है। वहां दर्ज है कि जंगली भैंसा समाप्त हो चुका था और अंतिम जंगली जल भैंसा 1896 में देखा गया था।

इन दो अभिलेखों को साथ रखकर देखें तो उत्तर प्रदेश में इस प्रजाति के इतिहास की अंतिम रेखा लगभग स्पष्ट दिखाई देती है, 1896 में गोरखपुर में अंतिम ज्ञात जंगली जल भैंसा और उसके कुछ वर्षों बाद खीरी में आधिकारिक रूप से दर्ज उसकी अनुपस्थिति।

तराई के खेतों में तब भी भैंसे मौजूद थे, लेकिन वे जंगली जल भैंसे नहीं थे। वे पालतू भैंसे थे, उसी प्राचीन जंगली वंश के घरेलू रूप, जिसे इस भू-दृश्य ने खो दिया था।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक हिमालय की तलहटी के साथ उत्तर प्रदेश से दक्षिणी नेपाल तक फैली तराई भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे विशाल सतत घासभूमि और आर्द्रभूमि प्रणालियों में से एक थी।

खीरी के पुराने अभिलेख उल्ल नदी के उत्तर के भू-दृश्य को बदलती नदी धाराओं, मौसमी जलभराव और ऊँची जलोढ़ भूमि पर साल के जंगलों तथा निचले हिस्सों में घनी घासों से भरे क्षेत्र के रूप में वर्णित करते हैं। खैरगढ़ वन क्षेत्र के खैरगढ़, भाड़ी, मुजेला, बांकी और कनवास जैसे जलाशयों और दलदली क्षेत्रों के नाम आज भी मानचित्रों पर मिलते हैं।

यह केवल वन नहीं था। यह एक ऐसा जीवित भू-दृश्य था जिसे पानी, आग और बड़े शाकाहारी पशु मिलकर आकार देते थे। इस व्यवस्था के केंद्र में जंगली जल भैंसा था।

एक वयस्क नर जंगली जल भैंसा कंधे तक लगभग 1.7–1.9 मीटर ऊंचा और 800–1,200 किलोग्राम तक वजनी हो सकता है। इसके विशाल, बाहर की ओर फैले और अर्धचंद्राकार सींग इसे दुनिया के सबसे प्रभावशाली जंगली बोविड्स में स्थान देते हैं।

लेकिन उसका महत्व केवल उसके आकार में नहीं है। जंगली जल भैंसा जलोढ़ घासभूमियों, दलदलों, मौसमी जलभराव वाले क्षेत्रों और नदी-तटीय वनस्पतियों से जुड़ा एक विशिष्ट चरने वाला मेगाहर्बिवोर है। वह ऊँची और मोटी घास को चरकर उसे छोटे, अधिक उत्पादक चराई क्षेत्रों में बदलता है। पानी और कीचड़ उसके व्यवहार का अभिन्न हिस्सा हैं।

स्थायी जल की अनुपस्थिति और लंबे समय तक शुष्क रहने वाले क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति कठिन हो जाती है। दूसरी ओर, घरेलू मवेशियों और भैंसों के साथ निकट संपर्क उसके लिए गंभीर रोग-जोखिम पैदा करता है। खुरपका-मुंहपका, रिंडरपेस्ट और ब्रुसेलोसिस जैसी बीमारियां जंगली बोविड आबादियों के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकती हैं।

यही बात जंगली जल भैंसे की पूरी कहानी को समझने की कुंजी है। उसका पतन केवल शिकार की कहानी नहीं था। वह एक पूरे भू-दृश्य के बदल जाने की कहानी थी। तराई से जंगली जल भैंसे का गायब होना किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। लगभग सात दशकों के दौरान तीन बड़े दबाव एक साथ बढ़े शिकार, रोग और आवास का रूपांतरण।

तराई के शिकार अभियानों में जंगली जल भैंसा बाघ और गैंडे के बाद प्रतिष्ठित बड़े शिकारों में शामिल था। शिकार का सबसे अधिक दबाव बड़े और वयस्क पशुओं पर था। यह वही आयु-वर्ग है जिस पर धीमी गति से प्रजनन करने वाली बड़ी शाकाहारी प्रजातियों की आबादी की सामाजिक और प्रजनन संरचना निर्भर करती है।

केवल शिकार से शायद जंगली जल भैंसा पूरी तरह समाप्त न होता। लेकिन इसने आबादी के प्रजननक्षम केंद्र को कमजोर कर दिया और उसे दूसरे दबावों के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया।

खीरी के पुराने गजेटियरों में पशुधन में होने वाली महामारियों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। रिंडरपेस्ट, जिसे स्थानीय रूप से पोकना या रेज कहा जाता था, के साथ खुरपका-मुंहपका और रक्तस्रावी सेप्टीसीमिया भी गंभीर रोगों में शामिल थे। 1871 में खीरी के घरेलू मवेशियों की संख्या का लगभग एक-चौथाई समाप्त हो गया था।

1895 में रिंडरपेस्ट को फिर अत्यंत उग्र बताया गया। जंगली जल भैंसों के लिए जोखिम आकस्मिक नहीं था। जिले के घरेलू पशुओं को प्रतिवर्ष नेपाल सीमा के साथ और उसके पार स्थित जंगलों में ले जाया जाता था और वे लंबे समय तक वहीं रहते थे। इसका अर्थ था कि घरेलू और जंगली बोविड्स के बीच संपर्क नियमित और व्यवस्थित था।

एक ऐसी जंगली आबादी, जिसमें किसी रोग के प्रति पूर्व प्रतिरक्षा विकसित न हुई हो, उसके लिए रिंडरपेस्ट जैसी बीमारी विनाशकारी हो सकती थी। शिकार ने आबादी को कमजोर किया था। बीमारी ने उस कमजोरी को और गहरा कर दिया। तीसरा और निर्णायक दबाव आवास का परिवर्तन फिर तराई की घासभूमियां खेतों में बदलने लगीं।

दलदलों को धान और गन्ने के खेतों में बदला गया। जंगल की भूमि को साफ करने के लिए औपनिवेशिक काल में भूमि-पट्टे दिए गए। 1861 से 1879 के बीच खीरी के जंगलों पर क्रमिक रूप से नियंत्रण और आरक्षण की प्रक्रिया चली। 1890 में रेलवे के आगमन ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को एक बड़ा बाजार प्रदान किया।

गजेटियर के अनुसार, 1860 के राजस्व सर्वेक्षण में लगभग 7,93,942 एकड़ भूमि पर खेती का उल्लेख मिलता है, जो 1904 तक बढ़कर लगभग 8,42,000 एकड़ हो गई। जिस भू-दृश्य पर हल चला, वही जंगली जल भैंसे का भू-दृश्य था। जब गजेटियरों ने उसकी अनुपस्थिति दर्ज की, तब तक उसके आवास का बड़ा हिस्सा पहले ही बदल चुका था।

मध्य भारत में जंगली जल भैंसा कुछ अधिक समय तक टिका रहा। कान्हा में इसकी अंतिम पुष्टि 1979 में हुई। आज जंगली जल भैंसा अपने ऐतिहासिक वैश्विक क्षेत्र के लगभग 95 प्रतिशत हिस्से से गायब हो चुका है।

विश्व में इसकी संख्या 4,000 से कम मानी जाती है, जिनमें लगभग 2,500 प्रजननक्षम वयस्क बताए जाते हैं। इनका लगभग 90 प्रतिशत भारत में पाया जाता है। भारत में जंगली जल भैंसे की आबादी मुख्यतः दो भौगोलिक समूहों में विभाजित है। पूर्वोत्तर भारत की आबादी विशेषकर काजीरंगा, मानस और डिब्रू-सैखोवा आज इसकी सबसे महत्वपूर्ण आबादी है। अधिकांश आकलनों में विश्व के लगभग 99 प्रतिशत जंगली जल भैंसे असम में बताए गए हैं।

मध्य भारतीय आबादी की स्थिति इसके विपरीत अत्यंत चिंताजनक है। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया द्वारा समर्थित आकलनों में छत्तीसगढ़ के इंद्रावती, उदंती और पामेड क्षेत्रों के बीच केवल लगभग 39–47 जंगली जल भैंसे दर्ज किए गए। भैरमगढ़ से यह प्रजाति समाप्त हो चुकी थी और महाराष्ट्र के सिरोंचा क्षेत्र में लगभग 20 जंगली जल भैंसों की उपस्थिति बताई गई।

उदंती की अंतिम प्रजननक्षम मादा ‘खुशी’, जो प्रसिद्ध मादा ‘आशा’ की एकमात्र मादा संतान थी, 2021 में मर गई। यह केवल संख्या में कमी नहीं थी। यह उस अवस्था का उदाहरण था जहाँ किसी क्षेत्र में जंगली जल भैंसे मौजूद तो रहते हैं, लेकिन अगली पीढ़ी पैदा करने की क्षमता लगभग समाप्त हो जाती है।

पशु का जीवित रहना और आबादी का जीवित रहना दो अलग बातें हैं। जब भैंसा जाता है तो घासभूमि क्या खोती है? संरक्षण जीवविज्ञान में जंगली जल भैंसे जैसे बड़े शाकाहारियों को ‘इकोसिस्टम इंजीनियर’ कहा जाता है।

यह शब्द केवल रूपक नहीं है। वे अपने भोजन, आवागमन, चराई, कीचड़ में लोटने और मल-त्याग जैसी प्राकृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपने आसपास के भू-दृश्य की संरचना को बदलते हैं।

नेपाल के तराई क्षेत्र में बारदिया के घासस्थलों पर  करकी, झाला और खन्ना के वर्ष 2000 के अध्ययन ने दिखाया कि बड़े चरने वाले पशुओं द्वारा बनाए गए छोटे, खुले ‘ग्रेजिंग लॉन्स’ में पौधों की विविधता आसपास की ऊँची घासभूमियों की तुलना में अधिक थी।

इन चराई क्षेत्रों में नई और अधिक सुपाच्य घास उगती थी, जिसमें कच्चे प्रोटीन और सोडियम की मात्रा भी अधिक थी। जब लगभग 150 दिनों तक बड़े चरने वाले पशुओं को इन क्षेत्रों से बाहर रखा गया, तो ये लॉन्स धीरे-धीरे ऊँची और अधिक जैवभार वाली सामान्य घासभूमि जैसी बनने लगीं।

अर्थात यह खुला, छोटा और उत्पादक घासस्थल अपने आप नहीं बना था। उसे बड़े शाकाहारी बनाए रखते थे। जंगली जल भैंसा इससे भी आगे जाता है। कीचड़ में लोटने और जमीन खोदने से वह छोटे जलकुंड और गड्ढे बनाता है, जिनमें शुष्क मौसम तक पानी टिक सकता है। ऐसे जलकुंड उभयचरों, जलपक्षियों और दुधवा के प्रमुख शाकाहारी बारहसिंगा के लिए उपयोगी हो सकते हैं।

उसका गोबर मिट्टी में पोषक तत्व लौटाता है, बीजों के प्रसार में सहायता करता है और गोबर-भृंगों तथा उनसे जुड़े पक्षी समुदायों को संसाधन देता है।

उसका प्राकृतिक शव भी गिद्धों के लिए भोजन उपलब्ध करा सकता है और वह भोजन पशु-चिकित्सा में प्रयुक्त डाइक्लोफेनाक से दूषित नहीं होता।

2023 में  नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत की 12 ईकोरीजन के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए पाया कि मेगाहर्बिवोर की अधिक उपस्थिति देशी पौधों की अधिक विविधता और प्रचुरता तथा विदेशी पौधों की कम उपस्थिति से जुड़ी थी। तराई की आर्द्रभूमियों में आज जलकुंभी और मिकानिया जैसी आक्रामक वनस्पतियां फैल रही हैं।

वन विभाग हर वर्ष इनके नियंत्रण पर संसाधन लगाता है। जंगली जल भैंसा किसी खरपतवार नियंत्रण कार्यक्रम का विकल्प नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि बड़े शाकाहारी इन प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए जंगली जल भैंसे का विलुप्त होना केवल वन्यजीव सूची से एक प्रजाति का नाम मिट जाना नहीं था।

यह एक पारिस्थितिक प्रक्रिया का गायब हो जाना था। 28 अप्रैल 2026 की सुबह मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में स्थित कान्हा टाइगर रिजर्व के सुपखार क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण दृश्य सामने आया।

एक नर और तीन मादा कुल चार जंगली जल भैंसे- सॉफ्ट-रिलीज बाड़े से बाहर निकले। वे काजीरंगा से 2,000 किलोमीटर से अधिक की यात्रा करके कान्हा पहुँचे थे। 1979 के बाद पहली बार कान्हा की धरती पर जंगली जल भैंसे फिर खड़े थे। यह दृश्य केवल भावनात्मक नहीं था। इसके पीछे वर्षों का वैज्ञानिक अध्ययन और सावधानीपूर्वक तैयार की गई पुनर्स्थापना योजना थी।

19 मार्च से 10 अप्रैल 2026 के बीच काजीरंगा की सेंट्रल और ईस्टर्न रेंजों से सात सब-एडल्ट जंगली जल भैंसों को वैज्ञानिक निगरानी में पकड़ा गया। उनके स्वास्थ्य की जाँच की गई और उन्हें ऐसे बाड़ों में रखा गया जहाँ वे मानवीय हैंडलिंग, स्वास्थ्य परीक्षण और परिवहन की परिस्थितियों के अभ्यस्त हो सकें।

परिवहन के दौरान चारे, पानी और पशु-चिकित्सकीय देखभाल की व्यवस्था की गई। 600 किलोग्राम से अधिक वजन वाले इन बड़े पशुओं को लगातार वर्षा के बीच सुरक्षित रूप से संभालना अपने आप में एक चुनौती थी। पहला दल 25 अप्रैल को रवाना हुआ और 28 अप्रैल को कान्हा पहुँचा।

वर्तमान योजना के अनुसार चरणबद्ध रूप से 15 जंगली जल भैंसों को स्थानांतरित करने और आगे चलकर एक पर्याप्त संस्थापक आबादी विकसित करने की परिकल्पना की गई है। लेकिन इस अभियान की वास्तविक शक्ति उस वैज्ञानिक अध्ययन में है जिसने कान्हा को पुनर्स्थापना के लिए उपयुक्त बताया।

वाइल्ड इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के बोरा और उनके सहयोगियों ने 2024 में रेस्टोरेशन इकोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन में कान्हा की आवास उपयुक्तता, वनस्पति संरचना और चारे के जैवभार का मूल्यांकन किया। साथ ही जंगली और घरेलू भैंसों के माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में कान्हा में लगभग 390 वर्ग किलोमीटर उपयुक्त निम्न घासभूमि चिन्हित की गई।

यदि जंगली जल भैंसे के लिए दर्ज न्यूनतम प्राकृतिक घनत्व 0.5 पशु प्रति वर्ग किलोमीटर को आधार माना जाए, तो यह क्षेत्र लगभग 195 जंगली जल भैंसों को सहारा देने में सक्षम हो सकता है। अध्ययन का कार्यकारी अनुमान लगभग 200 पशुओं का था। महत्वपूर्ण रूप से, पूर्वोत्तर और मध्य भारतीय जंगली जल भैंसे माइटोजेनोमिक विश्लेषण में एक ही क्लस्टर में आए। इसी आधार पर असम की आबादी को मध्य भारत के लिए संभावित संस्थापक स्रोत माना गया।

कान्हा में अपनाया गया सॉफ्ट-रिलीज मॉडल महज परिवहन की सुविधा नहीं था। यह शिकारी-समृद्ध भू-दृश्य में एक छोटी संस्थापक आबादी को सुरक्षित रखने की रणनीति थी।

यदि कुछ ही संस्थापक जंगली जल भैंसों को सीधे खुले जंगल में छोड़ दिया जाए, तो बाघों द्वारा शिकार से शुरुआती आबादी पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। धीमी प्रजनन दर वाली प्रजाति के लिए ऐसी हानि की भरपाई आसान नहीं होती। इसलिए सुझाई गई रणनीति है- पहले प्राकृतिक आवास वाले शिकारी-रोधी बाड़े में संस्थापक (मुख्य) जंगली जल भैंसों को रखा जाए; उन्हें अनुकूलन और प्रजनन का अवसर दिया जाए; फिर पर्याप्त सामाजिक समूह बनने पर 15–20 पशुओं की इकाइयों में उन्हें खुले आवास में छोड़ा जाए, जबकि एक प्रजनन केंद्रक को सुरक्षित रखा जाए।

कान्हा में हार्ड-ग्राउंड बारहसिंगा की पुनर्स्थापना में भी इसी प्रकार की रणनीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जंगली जल भैंसे की आबादी की दीर्घकालिक सफलता का निर्णय एक-दो वर्ष में नहीं होगा। वास्तविक जनसंख्या व्यवहार्यता का आकलन करने में कम से कम एक दशक लग सकता है।

लेकिन कान्हा ने एक महत्वपूर्ण बात सिद्ध कर दी है, भारत में संकटग्रस्त जंगली जल भैंसे को एक राज्य से दूसरे राज्य में वैज्ञानिक निगरानी, बहु-संस्थागत सहयोग और बिना किसी पशु की मृत्यु के स्थानांतरित करना संभव है।

अब प्रश्न यह है कि क्या यही अनुभव तराई में भी दोहराया जा सकता है?

तराई अगला तार्किक भू-दृश्य? तराई के पक्ष में तर्क यह नहीं है कि कान्हा का चयन गलत था। बल्कि तर्क यह है कि जंगली जल भैंसे का भविष्य केवल एक संरक्षण क्षेत्र पर निर्भर नहीं हो सकता।

2021 में वैज्ञानिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित अध्ययन मे झाला, कुरेशी और ब्लैक ने जंगली जल भैंसे तथा एक-सींग वाले गैंडे की ऐतिहासिक सीमा के भीतर पुनर्स्थापना की संभावनाओं का अध्ययन किया।

आवास मॉडल, क्षेत्रीय निरीक्षण, वन्यजीव प्रबंधकों से प्राप्त जानकारी और जनसंख्या-आवास व्यवहार्यता विश्लेषण के आधार पर विभिन्न स्थलों को आकार, आवास गुणवत्ता, सुरक्षा, प्रबंधन क्षमता, जैविक दबाव और मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना के आधार पर रैंक किया गया। जंगली जल भैंसे के लिए दो सीमा-पार भू-दृश्य सबसे महत्वपूर्ण उभरे चितवन–पर्सा–वाल्मीकि और दुधवा–पीलीभीत–शुक्लाफांटा–बरदिया।

यह निष्कर्ष तराई को विशेष महत्व देता है। लगभग 100 से अधिक जंगली जल भैंसों वाली आबादियां विलुप्ति के प्रति अपेक्षाकृत कम संवेदनशील मानी जाती हैं और कुछ हद तक प्राकृतिक या प्रबंधित पूरकता के माध्यम से नुकसान सह सकती हैं। दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि दुधवा में पुनर्स्थापना को व्यवहार्य माना गया, क्योंकि यहाँ एक-सींग वाले गैंडे के पुनर्स्थापना कार्यक्रम से सुरक्षा, निगरानी और प्रबंधन की संस्थागत क्षमता पहले से विकसित है।

यानी जिस प्रशासनिक और वैज्ञानिक आधारभूत संरचना की जंगली जल भैंसे को आवश्यकता होगी, उसका बड़ा हिस्सा दुधवा में पहले से मौजूद है। काजीरंगा और मानस के जंगली जल भैंसे पीढ़ियों से मौसमी रूप से जलमग्न जलोढ़ घासभूमियों में विकसित हुए हैं। उनकी शारीरिक संरचना, भोजन की आदतें और सामाजिक व्यवहार स्थायी जल, ऊँची  सेकेरम स्पोंटेनियम घास और वार्षिक बाढ़ चक्र वाले समतल भू-दृश्यों के अनुरूप हैं।

मध्य भारत में ऐसे आवास सीमित हैं। भारतीय तराई में उनका एक बड़ा हिस्सा अभी भी मौजूद है। दुधवा टाइगर रिजर्व जिसमें दुधवा राष्ट्रीय उद्यान, किशनपुर वन्यजीव विहार और कतर्नियाघाट वन्यजीव विहार शामिल हैं लखीमपुर-खीरी और बहराइच जिलों में लगभग 2,200 वर्ग किलोमीटर के भू-दृश्य में फैला है।

सुहेली, मोहाना और शारदा नदियों से जुड़ी दलदली फांटाएं और विस्तृत घासभूमियां इसे भारत में असम के बाहर जंगली जल भैंसे के लिए संभावित रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण भू-दृश्य बनाती हैं।

दुधवा में एक-सींग वाले गैंडे की पुनर्स्थापित आबादी पहले से मौजूद है। इन्हें 1984–85 में असम और नेपाल से लाया गया था। आज रिजर्व के पास बड़े शाकाहारियों की निगरानी, संरक्षण और पुनर्स्थापना का दशकों का अनुभव है। दुधवा उत्तर भारतीय बारहसिंगा की भारत में सबसे बड़ी आबादियों में से एक का भी आश्रय है। इसके साथ बंगाल फ्लोरिकन, स्वैम्प फ्रैंकोलिन और हिस्पिड हेयर जैसी घासभूमि-निर्भर प्रजातियां भी इस भू-दृश्य को विशेष महत्व देती हैं।

यहीं जंगली जल भैंसे की वापसी का महत्व बढ़ जाता है। 100 जंगली जल भैंसों की व्यवहार्य आबादी किसी एक छोटे संरक्षित क्षेत्र के भीतर स्थापित करना कठिन हो सकता है। लेकिन पीलीभीत से दुधवा और कतर्नियाघाट होते हुए नेपाल के शुक्लाफांटा और बारदिया तक फैला जुड़ा हुआ तराई भू-दृश्य एक अलग संभावना प्रस्तुत करता है। यहाँ लक्ष्य केवल एक संरक्षित क्षेत्र में जंगली जल भैंसे छोड़ना नहीं होगा।

लक्ष्य होना चाहिए, एक वास्तविक तराई मेटापॉपुलेशन का निर्माण।

“दुधवा, काजीरंगा के बाद भारतीय तराई में बचा ऐसा भू-दृश्य है, जो जंगली जल भैंसे के प्राकृतिक आवास से असाधारण समानता रखता है। यहाँ उसकी वापसी किसी अपरिचित भूमि पर आगमन नहीं होगी; यह उसके पुराने भू-दृश्य में लौटना होगा।”

दुधवा की तैयारी कहां तक पहुंची है? दुधवा में इस दिशा में तैयारी का कार्य प्रारंभ हो चुका है। आवास आकलन पूरा किया जा चुका है। स्थल चयन, क्षमता समीक्षा और प्रस्ताव के लिए आवश्यक प्रारंभिक आधारभूत कार्य आगे बढ़ चुके हैं। उपलब्ध आकलन के अनुसार तैयारियों का लगभग एक-तिहाई भाग पूरा हो चुका है। अब आगे की प्रक्रिया मुख्यतः राज्य-स्तरीय परामर्श, आवश्यक अनुमोदन और मैदानी तैयारियों से जुड़ी है। यदि वर्तमान कार्यकारी कार्यक्रम के अनुसार प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो पहला जंगली जल भैंसा लगभग नवंबर 2027 तक दुधवा पहुँच सकता है। लेकिन यह तारीख अंतिम प्रतिबद्धता नहीं है।

वन्यजीव स्थानांतरण पशु-चिकित्सकीय स्वीकृति, स्रोत आबादी की उपलब्धता, बाड़े की तैयारी, परिवहन व्यवस्था और अंतर-सरकारी सहमति जैसे अनेक चरणों पर निर्भर करते हैं। इनमें किसी भी स्तर पर परिवर्तन से समय-सारणी बदल सकती है। फिर भी एक बात अब पहले से स्पष्ट है, दुधवा में प्रश्न केवल आवास की उपयुक्तता का नहीं रह गया है।

अब प्रश्न यह है कि इस वापसी के लिए आवश्यक वैज्ञानिक, प्रशासनिक और सामाजिक कदम किस क्रम में पूरे किए जाएँ। दुधवा में जंगली जल भैंसे की पुनर्स्थापना पारिस्थितिक दृष्टि से आशाजनक हो सकती है, लेकिन संचालन की दृष्टि से यह एक जटिल परियोजना होगी।

इसमें उत्तर प्रदेश वन विभाग, स्रोत राज्य, भारत सरकार, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून और नेपाल के  राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव संरक्षण विभाग जैसे अनेक संस्थानों के बीच समन्वय की आवश्यकता होगी। किसी भी जंगली जल भैंसे को पकड़ने और स्थानांतरित करने से पहले कम से कम छह आधारभूत आवश्यकताओं पर स्पष्ट निर्णय होना चाहिए।

दुधवा की कुछ फांटाओं में लैंटाना और मिकानिया जैसी आक्रामक वनस्पतियां फैल चुकी हैं। जल-प्रवाह और आग प्रबंधन में बदलाव ने भी घासभूमि की संरचना को प्रभावित किया है। रिहाई से पहले लगभग 200 वर्ग किलोमीटर के स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाली दलदली घासभूमि के एक बड़े, सतत ब्लॉक की सक्रिय पुनर्स्थापना आवश्यक होगी।

गैंडा कार्यक्रम के अंतर्गत चल रहे प्रयास इस दिशा में आधार प्रदान कर सकते हैं, लेकिन जंगली जल भैंसे के लिए इसकी अलग से वैज्ञानिक समीक्षा आवश्यक होगी।

दुधवा के आसपास घरेलू मवेशी और भैंसे अभी भी रिजर्व की सीमाओं और बफर क्षेत्रों के संपर्क में आते हैं। इसलिए खुरपका-मुंहपका, ब्रुसेलोसिस, थिलेरियोसिस और बोवाइन ट्यूबरकुलोसिस जैसे रोगों की निगरानी अनिवार्य होगी। रिहाई से पहले पशु-चिकित्सकीय स्क्रीनिंग, प्रभावी पशु-बहिष्करण व्यवस्था और दीर्घकालिक रोग निगरानी कार्यक्रम तैयार होना चाहिए।

यह आवश्यकता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि एक शताब्दी से अधिक पहले तराई में जंगली जल भैंसे के पतन में रोगों की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। संस्थापक जंगली जल भैंसों को ऐसे शिकारी-रोधी बाड़े में रखने की आवश्यकता होगी जहाँ घासभूमि, दलदल और स्थायी जल उपलब्ध हो।

सठियाना और दक्षिण सोनारीपुर संभावित क्षेत्रों के रूप में विचार किए जा सकते हैं। दुधवा का गैंडा पुनर्वास क्षेत्र पहले ही इस प्रकार के बड़े बाड़ों के संचालन की क्षमता प्रदर्शित कर चुका है। घरेलू भैंसों के साथ संकरण पुनर्स्थापना कार्यक्रम के लिए गंभीर आनुवंशिक जोखिम है। इसलिए प्रत्येक संस्थापक जंगली जल भैंसे की आनुवंशिक शुद्धता की पुष्टि, अनेक मातृवंशों का प्रतिनिधित्व और पर्याप्त संस्थापक संख्या सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। साथ ही भविष्य में नए जंगली जल भैंसों को जोड़कर अंतःप्रजनन के जोखिम को कम करने की योजना भी पहले से बनानी होगी।

दुधवा के आसपास रहने वाले थारू और गैर-थारू समुदाय रिजर्व के साथ लंबे समय से जुड़े हुए हैं। पलिया, बेलरायां, भीरा और संपूर्णानगर क्षेत्र के गाँव इस व्यापक भू-दृश्य का हिस्सा हैं। जंगली जल भैंसा एक विशाल और शक्तिशाली मेगाहर्बिवोर है। इसलिए संभावित फसल क्षति और मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिए पहले से स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक होगी। मुआवजा प्रणाली, पूर्व एवं सूचित परामर्श तथा स्थानीय युवाओं को निगरानी और संरक्षण कार्यों में शामिल करने की योजना पहली रिहाई से पहले तैयार होनी चाहिए। शुक्लाफांटा और बारदिया में जंगली जल भैंसे पहले से मौजूद हैं।

यदि तराई में वास्तव में दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित आबादी बनानी है, तो केवल भारतीय संरक्षित क्षेत्रों के भीतर पुनर्स्थापना पर्याप्त नहीं होगी। भारत और नेपाल के बीच एक साझा पुनर्प्राप्ति योजना आवश्यक होगी, ताकि उपयुक्त परिस्थितियों में जंगली जल भैंसों की आबादियां संरक्षित क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक रूप से फैल सकें और एक सीमा के भीतर सीमित न रह जाएँ। 28 अप्रैल 2026 को कान्हा के सुपखार क्षेत्र में छोड़े गए जंगली जल भैंसे उन आबादियों के वंशज हैं, जो डेढ़ सौ वर्ष पहले ऐसे भारत में विचरण करते थे जिसे आज पहचानना कठिन है।

उस समय तराई का क्षितिज गन्ने के खेतों से नहीं, बल्कि ऊँची घास, दलदलों, नदियों और बड़े शाकाहारियों से बना था।

आज वही भू-दृश्य खेतों, वृक्षारोपण, गाँवों और संरक्षित वन क्षेत्रों के मिश्रण में बदल चुका है। खीरी की पुरानी घासभूमियां अब मुख्यतः गजेटियरों के पन्नों में दिखाई देती हैं। पीलीभीत और तराई के दूसरे हिस्सों में भी उन्नीसवीं शताब्दी के विस्तार का केवल एक भाग शेष है।

दुधवा में जंगली जल भैंसे को वापस लाना अतीत को पूरी तरह वापस नहीं ला सकता। लेकिन यह उस पारिस्थितिक प्रक्रिया का एक हिस्सा फिर से स्थापित कर सकता है जो कभी इस भू-दृश्य को आकार देती थी। वह प्रक्रिया जिसमें बड़े शाकाहारी घास को चरते हैं, छोटे खुले चराई क्षेत्र बनाते हैं, जलकुंडों को बनाए रखते हैं, पोषक तत्व लौटाते हैं और घासभूमि तथा आर्द्रभूमि की संरचना को प्रभावित करते हैं।

यह वापसी केवल एक प्रजाति की वापसी नहीं होगी। यह एक पारिस्थितिक भूमिका की वापसी होगी। कान्हा ने दिखा दिया है कि भारत जंगली जल भैंसे को एक भू-दृश्य से दूसरे भू-दृश्य तक सुरक्षित रूप से पहुँचा सकता है।

अब अगला प्रश्न यह है कि क्या हम उस मानचित्र को पूरा कर सकते हैं?

ऐसे भू-दृश्य में दूसरी व्यवहार्य आबादी स्थापित करके, जिसके अपने पुराने अभिलेखों ने एक शताब्दी पहले यह दर्ज किया था कि जंगली जल भैंसा वहाँ से कब गायब हुआ था। खीरी, पीलीभीत, कतर्नियाघाट और नेपाल के शुक्लाफांटा तथा बारदिया की तराई.आज भी उसी प्राचीन भू-दृश्य की अलग-अलग कड़ियां हैं। 1905 में नेविल के गजेटियर में खीरी से जंगली भैंसे की अनुपस्थिति को केवल एक प्रशासनिक तथ्य की तरह दर्ज किया गया था।

आज वही एक पंक्ति हमारे सामने एक प्रश्न की तरह खड़ी है। क्या आने वाली पीढ़ियां उस पंक्ति को इतिहास बना देंगी? यदि ऐसा हुआ, तो अरना की वापसी केवल एक जंगली जल भैंसे की वापसी नहीं होगी। वह उस तराई की वापसी होगी, जिसे हमने कभी खो दिया था।

लेखक दुधवा टाइगर रिजर्व, उत्तर प्रदेश वन विभाग से संबद्ध हैं। विपिन कपूर सैनी फील्ड बायोलॉजिस्ट हैं