गदरपुर, उधमसिंहनगर, उत्तराखंड।
“18 जून 2026, हरिपुरा बांध, समय सुबह 7:00 बजे, आठ नर और दो मादा फीन्स बया। नोट्स: पटेर घास पर वे घोंसले बना रहे थे। कसेरा घास से इन घोंसलो को बुन रहे थे।”
“...22जून 2026, समय सुबह 6:47 बजे, 10 नर और 7 मादा फीन्स”
“...5 जुलाई 2026, समय सुबह 7:02 बजे, दो नर फीन्स, दोनों ने अपने घोंसले तोड़ दिए”
“...6 जुलाई 2026, समय सुबह 5:30 बजे, कोई फीन्स बया नहीं दिखी”
ये किसी पक्षी विज्ञानी के नहीं बल्कि दसवीं के छात्र अंकित सिंह बिष्ट की नोटबुक में दर्ज फील्ड नोट्स हैं।
गदरपुर ब्लॉक में हरिपुरा बांध के किनारे बसे कुल्हा गांव के अंकित और उनके दो साथी, छठी कक्षा के जतिन सिंह और राघव सिंह नयाल मिलकर फीन्स बया और उसके प्राकृतिक आवास को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
स्कूल में स्थानीय जैव-विविधता को लेकर शुरू किए गए एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद चिड़ियों में इनकी दिलचस्पी बढ़ी। इसी कार्यक्रम के तहत इन्हें दूरबीन मिली, तो इसकी लेंस से दूर बैठी चिड़ियों को करीब से देखना फिर एक शौक भर नहीं रहा।
सुबह होते ही तीनों साथी अपनी दूरबीन और नोटबुक लेकर घर से निकल पड़ते हैं। ठीक सामने छोटी सी नहर को एक छलांग में पार करना, घास के मैदान में दौड़ते हुए सरपट बांध पर चढ़ना और फिर सामने हरिपुरा जलाशय और इससे लगे नरकुट (फ्रैग्माइटिस कार्का), कसेरा (सैकेरम स्पॉन्टेनियम), पटेर (टाइफा एलीफैन्टिना) जैसी दलदली मिट्टी में उगने वाली ऊंची घास का दृश्य। जलाशय के उस पार जंगल।
“सर्दियों में ये चिड़िया कहां चली जाती हैं, हमें नहीं पता, लेकिन अप्रैल-मई में बांध के किनारे ऊंची घास में घोंसले बनाना शुरू कर देती है। प्रजनन के समय नर चिड़िया की छाती पीली हो जाती है, तभी हम इन्हें पहचान पाते हैं,” अंकित पिछले तीन वर्षों से फीन्स बया की दुनिया में अपनी दूरबीन से झांक रहे हैं। उन्हें देख राघव और जतिन की भी इनमें दिलचस्पी बढ़ी।
“हरिपुरा में फीन्स को देखने दूर-दूर से बर्डवॉचर आते हैं। हमें जब पता चला कि फीन्स बया अब सिर्फ हमारे इलाके में ही बची हैं तो पहले बहुत गर्व हुआ। फिर लगा कि हमारे इलाके की चिड़िया विलुप्त हो जाए तो बड़े शर्म की बात होगी,” अंकित चिंता जताते हैं।
उधमसिंह नगर ज़िले के गदरपुर विकासखंड में सिंचाई के लिए भाखरा नदी पर बना हरिपुरा बांध, इससे सटा बौर नदी पर बना बौर बांध, और इनके आसपास की आर्द्रभूमि तराई का समृद्ध पक्षी आवास हैं।
कभी तराई के इलाकों में खूब पाई जाने वाली फीन्स बया अब उत्तराखंड में हरिपुरा जलाशय तक ही सीमित रह गई है। तराई की इसी पट्टी में ये नेपाल के शुक्लाफांटा क्षेत्र में भी पाई जाती है।
आर्द्रभूमियों के लगातार सिकुड़ने के कारण फिन्स बया की घटती आबादी के चलते इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने इसे संकटग्रस्त पक्षी के तौर पर सूचीबद्ध किया है।
धान के खेत पर बैठी तीन रंगों वाली मुनिया का झुंड दिखाते हुए अंकित बताते हैं कि वे हरिपुरा के आसपास 250 से अधिक किस्म की चिड़िया देख चुके हैं। जिसमें बया की चारों प्रजातियां शामिल हैं।
प्रकृति शिक्षा
कुल्हा गांव के अंकित, राघव और जितिन गूलरभोज के जीके कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ते हैं। तीन साल पहले उनका स्कूल नेचर साइंस इनिशिएटिव (एनएसआई) के नेचर विद्या कार्यक्रम से जुड़ा।
“जब हम स्थानीय समुदाय को संरक्षण की जिम्मेदारी उठाने को कहते हैं तो ये उन पर थोपा हुआ लगता है। इसकी जगह बच्चों को प्रकृति से जोड़ना ज़्यादा प्रभावी है,” पारिस्थितिकी वैज्ञानिक डॉ. सौम्या प्रसाद ने बच्चों को उनके प्राकृतिक परिवेश से जोड़ने के लिए नेचर विद्या' और ‘हिमालय सस्टेनेबिलिटी चैंपियनशिप' जैसे पाठ्यक्रम शुरू किए।
इसी पहल के तहत 21 वर्षीय प्रकृति शिक्षक मुकेश कांडपाल बच्चों को उनके आसपास के पेड़-पौधों, खेतों, नदी-तालाबों और पक्षियों से जुड़ना सिखा रहे हैं, “हम उन्हें पक्षियों की पहचानना, उनके प्राकृतिक आवास, भोजन और व्यवहार को समझना सिखाते हैं और वे इसे अपनी नोटबुक में दर्ज करते हैं,” वह बताते हैं।
फीन्स की तलाश में
जुलाई की लगातार बारिश से हरिपुरा के बढ़े जलस्तर में फीन्स के खाली घोंसले दिखाई देते हैं। मुकेश याद करते हैं कि बच्चों के साथ वर्ष 2023 में पहली बार इन पर नजर रखनी शुरू की थी, तब सिर्फ हरिपुरा में 16 फीन्स दिखी थीं। “वर्ष 2024 में हमने यहां 22 फीन्स देखीं। लेकिन 2025 में हमें एक भी फीन्स नहीं दिखीं। उन्हें ढूंढ़ने के लिए हम नाव से हरिपुरा जलाशय के एक छोर से दूसरे छोर तक गए।”
इस साल अप्रैल के आखिरी हफ़्ते में अंकित ने अपने सभी साथियों को पीली बया दिखने का संदेश दिया। फिर सबने मिलकर तय किया कि जून में हरिपुरा समेत आसपास की आर्द्रभूमि का सर्वे करेंगे।
“हमने नानक सागर बांध से फीन्स को ढूंढ़ना शुरू किया। वहां पटेर, कसैरा और नरकुट तीनों घास थी। लेकिन ये चिड़िया नहीं दिखीं। फिर धौरा, बेगुल और बौर वेटलैंड का भी सर्वे किया। बाकी चिड़िया मिल रही थीं लेकिन फीन्स नहीं,” अंकित अचरज जताते हैं कि फीन्स सिर्फ हरिपुरा में ही घोंसले बनाती है।
घास बचेगी तो बया बचेगी
“फीन्स का प्राकृतिक आवास नरकुट, कसैरा और पटेर की ऊंची घास है। जिसे लोग अपने पशुओं को खिलाते हैं। नरकुट या कसैरा पर ये चिड़िया घोंसले बनाती है, इसका इस्तेमाल झोपड़ी बनाने में होता है। पटेर से वो घोंसला बुनती है और इससे लोग टोकरियां बनाते हैं,” अंकित घास का महत्व बताते हैं।
गांववालों को घास काटने से रोकने के लिए बच्चों एनएसआई की मदद से 5 जून को वन विभाग के साथ अपने स्कूल में बैठक रखी। हमारे माता-पिता और गांववाले बैठक में आए। हमने उन्हें फीन्स बया पर मंडराते खतरे के बारे में बताया और घोंसलों के नजदीक घास न काटने का अनुरोध किया।”
बैठक में शामिल रही जतिन की मां राधा देवी मिट्टी, घास और लकड़ी से बनी अपनी झोपड़ी दिखाती हैं। आंगन में एक तरफ नरकुट घास का ढेर और दूसरी ओर पशुओं का चारा रखने के लिए घास से बनी छोटी झोपड़ी थी।
राधा कहती हैं, “छत की मरम्मत के लिए बांध से घास और मिट्टी लाते हैं। जानवरों का चारा भी लाते हैं। लेकिन बच्चों ने हमें घोंसले के पास की घास काटने से मना किया तो हमने वहां जाना छोड़ दिया।”
अंकित के मुताबिक फीन्स बया के घोंसलों के आसपास करीब 300 मीटर दूरी तक ग्रामीणों ने घास नहीं काटी और इसका असर तुरंत दिखा, “हमने इस साल अब तक की सबसे ज्यादा 35 फीन्स एक साथ गिनी।”
वर्किंग प्लान में फीन्स शामिल’
तराई केंद्रीय वन प्रभाग की सहायक वन संरक्षक शशि देव कहती हैं, “लकड़ी या घास काटने पर वन विभाग रोकटोक करता है तो ग्रामीण नाराज़ होते हैं। लेकिन अपने बच्चों के समझाने का अलग असर हुआ।”
“बच्चे बिना हलचल किए फीन्स की गतिविधियां समझ रहे हैं। हमें डेटा मिल रहा है कि पहले यहां कितनी चिड़िया थी और अब कितनी हैं। मैंने तराई केंद्रीय वन प्रभाग के वर्किंग प्लान में फीन्स बया के संरक्षण पर काम करने का सुझाव लिखा है। इससे ये आधिकारिक दस्तावेज़ में आ जाएगा और यहां तैनात होने वाले हर अधिकारी की ज़िम्मेदारी बन जाएगा,” शशि देव इसका श्रेय बच्चों के प्रयास को देती हैं।
'वर्किंग प्लान' दस वर्षों के लिए वन और जैव विविधता के संरक्षण और प्रबंधन की रूपरेखा तय करता है।
‘हम बर्ड वॉचिंग करेंगे तो हमारी चिड़िया बचेगी’
बच्चे दूरबीन की लेंस से मोबाइल फ़ोन को सटाकर ली गई फीन्स की तस्वीरें दिखाते हैं। “हमारे माता-पिता को लगता था कि हमारी पढ़ाई खराब हो रही है। लेकिन हमें लगता है कि हम बर्ड वॉचिंग करेंगे तो हमारी चिड़िया बचेगी,” अंकित से अब उनकी मां बबीता देवी भी सहमत हैं।
“चिड़ियों की खातिर बच्चे अच्छा काम कर रहे हैं और कुछ नया सीख रहे हैं। ये आगे भी इनके काम आएगा,” बबीता खुशी जताती हैं।
“...31 जुलाई 2026, समय सुबह 7:30, 7 नर फीन्स बया दोबारा दिखीं, घोंसले से करीब 300-400 मीटर दूर”
5-6 जुलाई के आस-पास हरिपुरा और इसके आसपास अपने घोंसले छोड़ उड़ गई फीन्स बया तीन हफ्ते से ज्यादा समय बाद दोबारा दिखीं। अंकित की नोटबुक में ये तारीख दर्ज हो गई।
“बच्चे जो काम कर रहे हैं वो शायद पीएचडी छात्र भी न कर पाए। क्योंकि वे भी उसी पारिस्थितकीय तंत्र का हिस्सा हैं। चिड़ियों, घास के मैदानों और जलाशय के साथ उनके भी संबंध हैं,” डॉ सौम्या मानती हैं कि संरक्षण की जगह साथी बनाने का ये मॉडल ज्यादा कारगर है।