पापुआ न्यू गिनी के दक्षिण-पूर्वी तट के पास खोजी गई शार्क की नई प्रजाति 'हेमिसिलियम डजियोनाई (Hemiscyllium dudgeonae)'; फोटो: जर्नल ऑफ द ओशियन साइंस फाउंडेशन  
वन्य जीव एवं जैव विविधता

समुद्र की उथली दुनिया में मिला अनोखा जीवन: पापुआ न्यू गिनी में खोजी गई ‘वाकिंग’ शार्क की नई प्रजाति

वैज्ञानिकों ने 'हेमिसिलियम डजियोनाई' नाम की शार्क की नई प्रजाति की पहचान की है, जो अपने अगले पंखों को पैरों की तरह इस्तेमाल कर समुद्र की तलहटी पर चल सकती है। पता चला है कि इसका प्राकृतिक आवास बेहद सीमित है।

Lalit Maurya

  • पापुआ न्यू गिनी के दक्षिण-पूर्वी तट के उथले समुद्री इलाकों में वैज्ञानिकों ने शार्क की एक ऐसी नई प्रजाति खोजी है, जो तैरने के साथ-साथ अपने पंखों को पैरों की तरह इस्तेमाल कर समुद्र की तलहटी पर चल सकती है।

  • हेमिसिलियम डजियोनाई (Hemiscyllium dudgeonae) नाम की इस वॉकिंग शार्क की पहचान मार्च 2025 में हुई, जब शोधकर्ता क्रिस्टीन डजियन ने रात में करीब एक मीटर लंबी शार्क को हाथ से पकड़ा। इसकी देह पर मौजूद सफेद धारियां और छोटे भूरे धब्बे पहले से ज्ञात वॉकिंग शार्क से बिल्कुल अलग थे।

  • अगले दो दिनों में टीम को तीन स्थानों से ऐसी 11 और शार्क मिलीं। पूरे जीनोम की आनुवंशिक जांच ने भी पुष्टि की कि यह एक अलग प्रजाति है। इसके साथ Hemiscyllium वंश में ज्ञात प्रजातियों की संख्या बढ़कर 10 हो गई है।

  • दिलचस्प यह है कि स्थानीय समुदाय इस शार्क को लंबे समय से ‘कदेदेकेदेवा’ के नाम से जानते हैं। वहीं, नई खोज का एक नमूना 1970 से संग्रहालय में मौजूद था, लेकिन उसकी सही पहचान करीब पांच दशक बाद हुई।

  • वैज्ञानिकों के लिए यह खोज जितनी रोमांचक है, इसके भविष्य को लेकर चिंता भी उतनी ही बड़ी है। इसका ज्ञात आवास महज करीब 7,000 वर्ग किलोमीटर है और तटीय विकास, मछली पकड़ने तथा प्रवाल विरंजन से इसके आवास पर खतरा बढ़ रहा है।

समुद्र की गहराइयों को अक्सर रहस्यों की दुनिया माना जाता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि कुछ अनजाने जीव समुद्र की उन उथली जगहों में भी छिपे हैं, जहां इंसान आसानी से पहुंच सकता है। पापुआ न्यू गिनी के दक्षिण-पूर्वी तट के पास वैज्ञानिकों ने शार्क की ऐसी ही एक नई अनोखी प्रजाति की खोज की है, जो तैरने के साथ-साथ समुद्र की तलहटी पर चल भी सकती है।

वैज्ञानिकों ने इस नई प्रजाति का नाम हेमिसिलियम डजियोनाई (Hemiscyllium dudgeonae) रखा है। इसे आम तौर पर डजियोन की वॉकिंग शार्क कहा जा रहा है। यह वॉकिंग शार्क के उस समूह का हिस्सा है, जिसकी प्रजातियां अपने मजबूत पेक्टोरल और पेल्विक यानी अगले पंखों को पैरों की तरह इस्तेमाल कर उथले पानी और रीफ पर आगे बढ़ती हैं।

कैसे दूसरों से अलग है यह नई प्रजाति

वैज्ञानिकों के मुताबिक यह शार्क इंसानों के लिए खतरनाक नहीं है। यह मुख्य रूप से रात में सक्रिय रहती है और छोटे समुद्री तथा रीढ़विहीन जीवों को खाती है।

इस नई प्रजाति की पहली बार पहचान मार्च 2025 में हुई थी। ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ द सनशाइन कोस्ट की शोधकर्ता क्रिस्टीन डजियन और उनकी टीम पापुआ न्यू गिनी की मिल्ने बे के आसपास वॉकिंग शार्क की एक पहले से ज्ञात प्रजाति की तलाश कर रही थी।

रात के समय, जब समुद्र लगभग अंधेरे में डूबा हुआ था, डजियन को करीब एक मीटर लंबी एक शार्क दिखाई दी। उन्होंने उसे हाथ से पकड़ लिया। पहली नजर में उन्हें लगा कि यह वही माइकल्स या मिल्ने बे वॉकिंग शार्क (Hemiscyllium michaeli) है, जिसकी टीम तलाश कर रही थी। लेकिन जब नाव पर रोशनी में इस शार्क को ध्यान से देखा गया तो कहानी बदल गई।

इस शार्क के बारे में अधिक जानकारी वैज्ञानिकों ने जर्नल ऑफ द ओशियन साइंस फाउंडेशन में प्रकाशित की है।

अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता जेसिका-ऐनी ब्लेकवे ने देखा कि शार्क के शरीर पर बने निशान पहले देखी गई वॉकिंग शार्क से बिल्कुल अलग थे। इसकी भूरी देह पर तेंदुए जैसे बड़े धब्बों के बजाय सफेद धारियां, छोटे भूरे धब्बे और डैश जैसे निशान थे। ब्लेकवे के मुताबिक, ये निशान उन्हें ब्रेल या मोर्स कोड जैसे दिखाई देते थे।

पापुआ न्यू गिनी के दक्षिण-पूर्वी तट के पास खोजी गई शार्क की नई प्रजाति 'हेमिसिलियम डजियोनाई (Hemiscyllium dudgeonae)'; फोटो: जर्नल ऑफ द ओशियन साइंस फाउंडेशन

हालांकि एक शार्क देखकर वैज्ञानिकों ने तुरंत इसे नई प्रजाति नहीं माना। टीम ने अगले दो दिनों तक इसी तरह के जीवों की तलाश जारी रखी। उन्हें तीन अलग-अलग स्थानों से 11 और शार्क मिलीं। इनमें नर और मादा दोनों थे और कुछ वयस्क थीं, जबकि कुछ अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई थीं। कुल 12 शार्क मिलने के बाद वैज्ञानिकों को भरोसा होने लगा कि वे किसी एक असामान्य जीव को नहीं, बल्कि एक पूरी नई प्रजाति को देख रहे हैं।

डीएनए ने भी दी नई प्रजाति की गवाही

शार्क उथले समुद्री घास वाले इलाकों और प्रवाल भित्तियों के आसपास पाई गईं। इनका ज्ञात आवास करीब 7,000 वर्ग किलोमीटर तक सीमित है, जो अब तक ज्ञात सभी वॉकिंग शार्क प्रजातियों में सबसे छोटे क्षेत्रों में से एक है।

सिर्फ शरीर पर बने निशान नई प्रजाति की पहचान के लिए पर्याप्त नहीं थे। इसलिए वैज्ञानिकों ने आनुवंशिक जांच की।

दिलचस्प बात यह रही कि शुरुआती डीएनए जांच इस शार्क को अलग प्रजाति के रूप में पहचान नहीं सकी। इसके बाद वैज्ञानिकों ने पूरे जीनोम में हजारों आनुवंशिक संकेतकों की जांच की। इस विस्तृत विश्लेषण में नई शार्क अपनी निकट संबंधी H. michaeli से स्पष्ट रूप से अलग दिखाई दी।

यह वॉकिंग शार्क समूह में 2013 के बाद वर्णित पहली नई प्रजाति है और इसके साथ 'हेमिसिलियम' वंश में ज्ञात प्रजातियों की संख्या बढ़कर 10 हो गई है।

वैज्ञानिकों के लिए नई, स्थानीय समुदायों से है पुरानी पहचान

वैज्ञानिकों के लिए यह नई खोज हो सकती है, लेकिन पापुआ न्यू गिनी के स्थानीय समुदाय इस असामान्य शार्क से अनजान नहीं थे। वे इसे ‘कदेदेकेदेवा’ कहते हैं, जिसका अर्थ ‘आलसी शार्क’ या ‘डॉग शार्क’ है। इसका यह नाम इसके अनोखे अंदाज में चलने से जुड़ा है। यानी जिस जीव को वैज्ञानिकों ने अब नई प्रजाति के रूप में पहचाना है, उसे स्थानीय लोग लंबे समय से अपने समुद्र का हिस्सा मानते आए हैं।

यह बात इस खोज को और खास बनाती है, कई बार विज्ञान जिस जीवन को पहली बार दर्ज करता है, वह स्थानीय समुदायों की नजरों से बहुत पहले से हमारी दुनिया में मौजूद होता है।

1970 से संग्रहालय में रखी थी एक ‘अनजान’ शार्क

इस कहानी का एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। वैज्ञानिकों को पता चला कि नई प्रजाति का एक छोटा नमूना 1970 में पापुआ न्यू गिनी से एकत्र किया गया था और बाद में अमेरिका के नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में संरक्षित कर दिया गया था।

करीब चार दशक बाद, 2010 में इसे युवा Hemiscyllium michaeli के रूप में दर्ज किया गया। लेकिन नई खोज के बाद वैज्ञानिकों ने उस पुराने नमूने की दोबारा जांच की और पाया कि वह भी दरअसल नई प्रजाति का सदस्य था।

इसका मतलब है कि यह शार्क कम से कम 1970 से वैज्ञानिक संग्रह में मौजूद थी, लेकिन उसकी असली पहचान सामने आने में करीब पांच दशक लग गए।

नई खोज के साथ संरक्षण की चिंता

इस नई प्रजाति की खोज जितनी रोमांचक है, उसके भविष्य को लेकर चिंता उतनी ही गंभीर है।

वैज्ञानिकों को अभी यह पता नहीं है कि यह शार्क अपने पूरे प्राकृतिक क्षेत्र में कितनी संख्या में मौजूद है। इसका ज्ञात फैलाव सीमित है और इसके कुछ संभावित आवासों में किए गए सर्वेक्षणों में वॉकिंग शार्क दिखाई नहीं दी।

पापुआ न्यू गिनी में तटीय निर्माण, ताड़ बागान और प्रवाल भित्तियों के विरंजन जैसी गतिविधियों ने पिछले वर्षों में वॉकिंग शार्क के आवासों को नुकसान पहुंचाया है। मछली पकड़ना भी इनके लिए एक अतिरिक्त खतरा है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नई प्रजाति को भविष्य में 'संकटग्रस्त' श्रेणी में रखा जा सकता है, हालांकि इसके संरक्षण की औपचारिक स्थिति अभी तय नहीं हुई है।

डजियन के मुताबिक, उथले समुद्री इलाकों में भी आज नई प्रजातियां मिल रही हैं। यह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के बारे में हमारी जानकारी अभी कितनी अधूरी है। शायद इस खोज की सबसे बड़ी सीख यही है, जिस दुनिया को हम अच्छी तरह जानते हैं, उसके ठीक सामने भी अनगिनत जीवन अब तक हमारी नजरों से छिपा हो सकता है।