प्राकृतिक संसाधनों को बहाल करने के लिए 2030 तक तय लक्ष्य का केवल एक चौथाई ही पूरा हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रकृति को बचाने से जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संकट से निपटने में मदद मिलेगी।
‘नेचर्स कमबैक – स्केलिंग इकोसिस्टम रेस्टोरेशन फॉर पीपुल एंड प्लैनेट’ नाम से एक रिपोर्ट जारी
लक्ष्य को हासिल करने के लिए निवेश को 64 अरब डॉलर से बढ़ाकर 296 अरब डॉलर करना होगा।
मौजूदा रफ्तार से 2030 तक लक्ष्य का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं हो पाएगा।
दुनिया ने 2030 तक एक अरब हेक्टेयर उजड़े जंगलों, खराब हो चुकी जमीन, नदियों, तालाबों और समुद्री क्षेत्रों को फिर से प्राकृतिक स्थिति में लाने का लक्ष्य रखा था। इस लक्ष्य को तय हुए करीब आठ साल हो चुके हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की नई रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक 149 देशों में केवल 25.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में ही ऐसे प्रयास दर्ज किए गए हैं।
यानी लक्ष्य का करीब एक चौथाई ही पूरा हुआ है, जबकि इसे हासिल करने के लिए अब केवल चार साल बचे हैं। मौजूदा रफ्तार से काम जारी रहा तो 2030 तक लक्ष्य का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं हो पाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रकृति को फिर से संवारने के लिए सालाना निवेश को 64 अरब डॉलर से बढ़ाकर 296 अरब डॉलर करना होगा।
दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मार्च 2019 में वर्ष 2021 से 2030 तक के दशक को ‘पारिस्थितिकी तंत्र बहाली दशक’ घोषित किया था। इसका मकसद दुनिया भर में जंगलों, नदियों, आर्द्रभूमियों, समुद्री क्षेत्रों और खराब हो चुकी जमीन का लगभग 30 फीसदी हिस्से को फिर से प्राकृतिक स्थिति में लाने के प्रयासों में तेजी लाना है। यह लक्ष्य कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के तहत तय किया गया था।
यह पहल इसलिए शुरू की गई क्योंकि मानवीय गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों और जैव विविधता का तेजी से क्षरण हो रहा है। प्रकृति को हुए इस नुकसान से जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ता है, पानी और भोजन की सुरक्षा प्रभावित होती है और लाखों लोगों की आजीविका पर संकट पैदा होता है।
संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि पारिस्थितिकी तंत्रों को फिर से संवारना जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव विविधता बचाने और सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जरूरी है।
29 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी), खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (सीबीडी) के सचिवालय ने ‘नेचर्स कमबैक – स्केलिंग इकोसिस्टम रेस्टोरेशन फॉर पीपुल एंड प्लैनेट’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। इसे संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (कॉप17) के दौरान आयोजित एक उच्चस्तरीय कार्यक्रम में जारी किया गया।
यह दुनिया भर में प्रकृति को फिर से संवारने के प्रयासों की प्रगति का पहला व्यापक वैश्विक आकलन है, जो संयुक्त राष्ट्र के पारिस्थितिकी तंत्र बहाली दशक (2021–2030) के मध्य में प्रकाशित की गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 149 देशों में 25.2 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में प्रकृति को फिर से संवारने के प्रयास दर्ज किए गए हैं और इससे 10 लाख से अधिक हरित रोजगार पैदा हुए हैं। हालांकि, 2030 तक तय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन प्रयासों में तेजी लाने और प्रकृति की बहाली पर सालाना निवेश को 64 अरब डॉलर से बढ़ाकर 296 अरब डॉलर करने की जरूरत है।
कार्यक्रम के दौरान चीन, कोलंबिया, इथियोपिया, इटली और अमेरिका की पांच उल्लेखनीय पहलों को यूएन वर्ल्ड रेस्टोरेशन फ्लैगशिप के रूप में सम्मानित किया गया। इन पहलों के जरिए दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पारिस्थितिकी तंत्र की सफल बहाली के प्रयासों को रेखांकित किया गया।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के महानिदेशक क्यू डोंग्यू ने कहा कि पारिस्थितिकी तंत्र को फिर से संवारने के प्रयास कारगर हैं। अब जरूरत है कि जमीन, पानी और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में इन प्रयासों को शामिल किया जाए। कृषि और खाद्य उत्पादन की व्यवस्था में भी बदलाव जरूरी है। उनका कहना है कि प्रकृति को बचाने से बेहतर उत्पादन, पोषण, पर्यावरण और लोगों के जीवन में सुधार हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने कहा कि दुनिया भर में प्रकृति को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास हो रहे हैं, लेकिन इनकी गति और दायरा अभी जरूरत के मुताबिक नहीं है। उन्होंने कहा कि 2030 तक छोटे-छोटे प्रयासों को बड़े स्तर पर लागू करना होगा। ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित करनी होगी, जो प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के साथ-साथ नष्ट हो चुके जंगलों, नदियों और दूसरे प्राकृतिक क्षेत्रों को फिर से बेहतर बनाने पर ध्यान दे।
प्रकृति को बचाने और उसे फिर से संवारने का यह अभियान अब केवल सरकारों तक सीमित नहीं है। इसमें शहर, स्कूल, कारोबार और स्थानीय समुदाय भी शामिल हो रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के इस अभियान की शुरुआत के बाद से इससे जुड़े संगठनों की संख्या बढ़कर दुनिया भर में 300 से अधिक हो गई है।
एशिया अव्वल
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रकृति को फिर से संवारने के सबसे ज्यादा प्रयास एशिया में हो रहे हैं। यहां 19.22 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में ऐसे प्रयास दर्ज किए गए हैं। अफ्रीका में 3.63 करोड़, यूरोप में 91 लाख, उत्तर और मध्य अमेरिका में 58 लाख, दक्षिण अमेरिका में 54 लाख और ओशिनिया में 32 लाख हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है।
शोध के मुताबिक, दुनिया के सबसे जरूरी प्राकृतिक क्षेत्रों के सिर्फ 15 प्रतिशत हिस्से को बहाल करने से औद्योगिक क्रांति के बाद से हुए कार्बन उत्सर्जन का 30 प्रतिशत तक सोखा जा सकता है। इससे 60 प्रतिशत प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाने में भी मदद मिल सकती है।
संयुक्त राष्ट्र की प्रकृति बहाली से जुड़ी सफल पहलों में पूर्वी अफ्रीका के पर्वतीय गोरिल्ला, ब्राजील के जगुआर, किर्गिस्तान के हिम तेंदुए और भारत में गंगा नदी की डॉल्फिन के संरक्षण और उनकी आबादी में सुधार के प्रयास शामिल हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन पर खराब हो चुके प्राकृतिक क्षेत्रों को फिर से संवारने में अपेक्षाकृत ज्यादा प्रगति हुई है। 2030 तक ऐसे 30 प्रतिशत क्षेत्रों को बहाल करने के लक्ष्य की दिशा में दुनिया लगभग आधे रास्ते तक पहुंच चुकी है।
चीन में सबसे ज्यादा 12.74 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर बहाली के प्रयास दर्ज किए गए हैं। मंगोलिया और कजाखस्तान में भी बड़े पैमाने पर ऐसे प्रयास हो रहे हैं।
इसके मुकाबले नदियों, झीलों, समुद्र और तटीय क्षेत्रों को फिर से संवारने का काम काफी पीछे है। रिपोर्ट के अनुसार, 62 देशों में 1.1 करोड़ हेक्टेयर मीठे पानी के क्षेत्रों और 46 देशों में 57 लाख हेक्टेयर समुद्री व तटीय क्षेत्रों में बहाली के प्रयास दर्ज किए गए हैं। इन क्षेत्रों का तेजी से नुकसान भी हो रहा है।
हालांकि, आर्द्रभूमियों को बचाने और फिर से विकसित करने के प्रयास बढ़े हैं। वर्ष 2022 में जहां केवल 8 प्रतिशत देशों ने ऐसे कार्यक्रम लागू करने की जानकारी दी थी, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर 54 प्रतिशत हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जलीय क्षेत्रों से जुड़े आंकड़े कम उपलब्ध होने के कारण वहां हो रहे प्रयासों की वास्तविक स्थिति इससे बेहतर भी हो सकती है।
कंवेंशन ऑन बार्याडायवर्सिटी (सीबीडी ) के सचिवालय की कार्यकारी सचिव एस्ट्रिड शोमेकर ने कहा, “एक ओर प्रकृति को बचाने के प्रयास करना और दूसरी ओर उसे नुकसान पहुंचाना सही नहीं है। सरकारों को प्रकृति के नुकसान के कारणों को रोकना होगा और उसे बचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की निगरानी पर निवेश बढ़ाना होगा, ताकि इनके अच्छे नतीजे लंबे समय तक बने रहें।”
उनके मुताबिक 2030 के बाद भी प्रकृति को संवारने के प्रयास जारी रखने होंगे, ताकि जंगलों, नदियों और दूसरे प्राकृतिक क्षेत्रों को फिर से बेहतर बनाया जा सके, जैव विविधता लौट सके और स्थानीय समुदायों को लंबे समय तक लाभ मिल सके। इसके लिए स्थानीय लोगों को जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार देना, उन्हें फैसले लेने में शामिल करना और उनके पारंपरिक ज्ञान व अनुभव का सम्मान करना जरूरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अब प्रकृति को संवारने के काम को अलग-अलग परियोजनाओं तक सीमित रखने के बजाय ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे पर्यावरण को बचाने के साथ लोगों की आजीविका भी बनी रहे और लंबे समय तक आर्थिक लाभ मिल सके।
इस रिपोर्ट के आंकड़े सरकारों की ओर से वैश्विक स्तर पर दी गई जानकारी और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की फ्रेमवर्क फॉर इकोसिस्टम रेस्टोरेशन मॉनिटरिंग (एफईआरएम ) व्यवस्था के तहत प्रकृति को संवारने वाली पहलों से मिले आंकड़ों के आधार पर तैयार किए गए हैं।