भारत में गिद्धों की आबादी में अब तक स्पष्ट सुधार नहीं, संरक्षण विशेषज्ञों ने जारी गिरावट पर चिंता जताई है।
पशु चिकित्सा में डाइक्लोफेनाक पर 2006 में प्रतिबंध के बावजूद कुछ दवाओं का गलत इस्तेमाल अब भी चुनौती बना हुआ है।
दुनिया में गिद्धों की 23 प्रजातियां हैं, जिनमें करीब 16 प्रजातियां अलग-अलग स्तर पर संरक्षण संकट का सामना कर रही हैं।
बिजली के तार, विंड टर्बाइन, जहरीले शव और आवास में बदलाव गिद्धों के लिए गंभीर खतरे बने हुए हैं।
गिद्ध मृत पशुओं के शव खाकर पर्यावरण साफ रखते हैं और बीमारियों के फैलाव को रोकने में मदद करते हैं।
हर साल सितंबर के पहले शनिवार को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इस साल यह दिवस पांच सितंबर को मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य गिद्धों के महत्व के बारे में लोगों को जागरूक करना और इन पक्षियों के संरक्षण के लिए प्रयासों को बढ़ावा देना है। गिद्धों को अक्सर उनकी शक्ल और मृत जानवरों को खाने की आदत के कारण गलत नजर से देखा जाता है। लेकिन वास्तव में ये पक्षी प्रकृति के लिए बेहद जरूरी हैं।
पर्यावरण के सफाईकर्मी हैं गिद्ध
गिद्ध मृत जानवरों के शवों को तेजी से खाकर पर्यावरण को साफ रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर शव लंबे समय तक खुले में पड़े रहें तो उनमें कई तरह के हानिकारक जीवाणु और वायरस पनप सकते हैं। गिद्ध इन शवों को खाकर ऐसे संक्रमणों के फैलने की संभावना कम करते हैं। इस तरह वे वन्यजीवों, पशुओं और इंसानों के स्वास्थ्य की रक्षा में भी अप्रत्यक्ष रूप से मदद करते हैं।
गिद्धों के पेट में बहुत तेजाब पाया जाता है। इसकी वजह से वे सड़े-गले मांस को भी पचा सकते हैं और कई हानिकारक रोगाणुओं का सामना कर सकते हैं। यही विशेषता उन्हें प्रकृति का एक बेहद प्रभावी सफाईकर्मी बनाती है।
भारत में अब भी चिंता की स्थिति
भारत में गिद्धों की संख्या में पिछले कुछ दशकों में भारी गिरावट आई है। खास तौर पर 1990 और 2000 के दशक में पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा डाइक्लोफेनाक को गिद्धों की मौत का एक प्रमुख कारण माना गया। पशुओं के लिए डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर भारत ने 2006 में प्रतिबंध लगा दिया था।
इसके बाद सरकार ने पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली कुछ अन्य दवाओं, जैसे एसेक्लोफेनाक, केटोप्रोफेन और हाल में निमेसुलाइड पर भी रोक लगाई है। हालांकि संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिबंधों को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करना अभी भी बड़ी चुनौती है। इंसानों के लिए बनी कुछ दवाओं का पशुओं के इलाज में गलत इस्तेमाल भी चिंता का विषय है।
गिद्धों की संख्या में सुधार के संकेत नहीं
स्टेट ऑफ इंडिया’स बर्ड्स से जुड़े हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश में गिद्धों की आबादी में अभी तक स्पष्ट सुधार के संकेत नहीं मिले हैं। सेविंग एशिया’स वल्चर्स फ्रॉम एक्सटिंक्शन यानी सेव से जुड़े सलाहकार ने भी भारत में गिद्धों की संख्या में जारी गिरावट को चिंता का विषय बताया है।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी द्वारा 2024 में प्रकाशित सड़क मार्गों पर किए गए सर्वेक्षण के आंकड़ों में भी हाल के वर्षों में गिद्धों की आबादी में स्पष्ट सुधार दिखाई नहीं दिया।
दवाओं के अलावा भी कई खतरे
गिद्धों के सामने खतरा केवल जहरीली दवाओं का नहीं है। बिजली के तारों से करंट लगना, बिजली के ढांचे और विंड टर्बाइनों से टकराना, शव खाने वाले स्थानों पर इंसानी गतिविधियों से होने वाली परेशानी और जहरीले शवों को खाना भी इनके लिए गंभीर खतरे हैं।
अप्रैल 2026 में उत्तर प्रदेश के दुधवा टाइगर रिजर्व में 25 से अधिक हिमालयी गिद्धों की मौत की खबर सामने आई थी। बताया गया कि इन गिद्धों ने उन कुत्तों के शव खाए थे, जिनकी मौत जहर से हुई थी। यह घटना बताती है कि जहरीले पदार्थों का इस्तेमाल किस तरह दूसरे वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है।
दुनिया में 23 प्रजातियां
वर्ल्ड वल्चर डे के अनुसार, दुनिया में गिद्धों की 23 प्रजातियां पाई जाती हैं। ये ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका को छोड़कर दुनिया के कई हिस्सों में मिलती हैं। अफ्रीका, एशिया और यूरोप में मुख्य रूप से ओल्ड वर्ल्ड गिद्ध पाए जाते हैं, जबकि अमेरिका में न्यू वर्ल्ड गिद्ध पाए जाते हैं।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) ने गिद्धों की करीब 16 प्रजातियां ऐसी हैं जिन्हें संरक्षण की दृष्टि से खतरे में माना है। दुनिया की लगभग 70 प्रतिशत गिद्ध प्रजातियां किसी न किसी स्तर पर संकट का सामना कर रही हैं।
संरक्षण के लिए लगातार प्रयास जरूरी
गिद्ध लंबे समय तक जीवित रहने वाले और धीमी गति से प्रजनन करने वाले पक्षी हैं। इसलिए इनकी संख्या में गिरावट जल्दी दिखाई दे सकती है, लेकिन आबादी को दोबारा बढ़ने में कई साल लग सकते हैं। ऐसे में लगातार निगरानी, सुरक्षित पशु चिकित्सा दवाओं का इस्तेमाल, जहरीले पदार्थों पर नियंत्रण और बिजली के ढांचे को पक्षियों के लिए सुरक्षित बनाना जरूरी है।
गिद्धों को बचाना केवल एक पक्षी प्रजाति को बचाना नहीं है। इनके संरक्षण से पर्यावरण साफ रहेगा, बीमारियों के फैलने का खतरा कम होगा और प्रकृति में संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस हमें याद दिलाता है कि जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, वे प्रकृति के लिए सबसे महत्वपूर्ण जीवों में से एक हो सकते हैं।