फाइल फोटो: अंकुर तिवारी 
वन्य जीव एवं जैव विविधता

स्क्रीन और बाजार की चमक में खोती प्रकृति की सांस्कृतिक स्मृति

जलवायु परिवर्तन के समाधान में हमारी स्वदेशी जीवन शैली और पारंपरिक ज्ञान की अनदेखी क्यों हो रही है?

Kushagra Rajendra

आज जब वैश्विक उष्मण के सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं, मौसम का मिजाज भी अप्रत्याशित हो चला है, तब जलवायु परिवर्तन का सारा समाधान वातानुकूलित कमरों में बैठकर तकनीकी कारगुजारियो के सहारे बनाया जा रहा है।

जिनेवा, पेरिस और शर्म अल-शेख के भव्य सभागारों में वैज्ञानिक और नीति-निर्माता 'कार्बन क्रेडिट', 'नेट-जीराे उत्सर्जन' और 'क्लाइमेट फाइनेंस' जैसी जटिल तकनीकी शब्दावलियों में पृथ्वी को बचाने का गणित लगा रहे हैं। लेकिन साल दर साल हर प्रयास जमीन तक उतर नहीं पा रहे, हर साल हमारे ही बनाए लक्ष्य से दूरी बढ़ती ही जा रही हैं।

पिछले कुछ सालों से लगने लगा है कि ऊपर से थोपे गए नियम चर्चा तो बन सकते है पर इस संकट को टाल नहीं सकते। इस पूरे वैश्विक विमर्श में जो सबसे महत्वपूर्ण कड़ी गायब है, वह है हमारी स्वदेशी और देशज प्रकृति-केंद्रित जीवन शैली और पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक सामूहिक जैव-सांस्कृतिक स्मृति।

जैव-संस्कृति केवल कुछ रस्म और रीति-रिवाज नहीं होतीं। वे उन समुदायों की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक निरंतरता और अस्तित्व की पहचान भी होती हैं, जिन्होंने पीढ़ियों से समाज को उनके परिवेश में जीवित रखा है। आज जब हम इन परंपराओं को 'रूढ़िवादिता' कहकर खारिज कर देते हैं या उनका बाजारीकरण कर देते हैं, तो हम केवल एक त्योहार या परम्परा नहीं खोते, बल्कि हम प्रकृति के साथ जीने का वह आखिरी 'इकोलॉजिकल ब्लूप्रिंट' भी खो देते हैं जो हज़ारों वर्षों की कठिन परीक्षाओं में अब तक खरा उतरा था।

नक्षत्रों का लोक-विज्ञान 

आज से मात्र तीन-चार दशक पहले तक, भारत का एक साधारण गवई किसान भी रात में आसमान देखकर यह अंदाज़ लगा लेता था कि अभी साल का कौन सा नक्षत्र चल रहा है और अगले कुछ दिनों तक हवा और बादलों का रुख क्या होगा और उस मौसमी परिस्थिति के लिए क्या अनुकूल होगा खेती किसानी के लिए।

सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की आपसी गति के आधार पर तय होने वाले नक्षत्र (जैसे आद्रा, हथिया, उतरा, चित्रा, स्वाति), जिसकी संख्या सताइस निर्धारित है, उनके लिए कृषि और जीवन जापन के पथ प्रदर्शक थे। और यही पारम्परिक समझ समूचे भारत में लोकोक्तियों के रूप में सबके जुबान पर छाई रहती थी। उत्तर भारत में घाघ और भड्डरी ने इसे कालजयी स्वरुप दिया, जिसमे हवा के रुख, बादल की स्थिति, खेती की उपज, खाप पान के लिए निर्देश सब शामिल है।

"सावन सुक्ला सप्तमी, छिपकर ऊगे भान।

भड्डरी बोले सुनु भड्डरी, बिन बरसे नहीं जाय।"

ग्रामीण समाज को चींटियों के अंडे लेकर ऊंचे स्थान पर जाने, टिटहरी के अंडे देने के स्थान और महुआ के पेड़ पर आने वाले बौर को देखकर सूखे या बाढ़ भनक लग जाती थी।

उत्तर के साथ साथ मौसम की भारतीय समझ दक्षिण में भी समृद्ध हुई , जिसे क्रमशः तेलगू और कन्नड़ में वेमन्ना, सर्वज्ञ जैसे कवियों ने संग्रहित किया। भाषा की सीमाएं अलग थीं, लेकिन भारत के लोक-मानस की वैज्ञानिक चेतना एक जैसी थी।सदियों से चली आ रही ये लोक-कहावतें वास्तव में हमारा पारंपरिक क्लाइमेट साइंस थीं। 

उदाहरण के लिए, 'स्वाति नक्षत्र' की बरसात को लीजिए। कृषि विज्ञान और आर्थिक दृष्टिकोण से शरद ऋतु के अंत में होने वाली स्वाति की यह बारिश खेतों में खड़ी और पकी हुई धान की बालियों को पूरी तरह बर्बाद कर देती है।

फसल के नुकसान के लिहाज से यह एक त्रासद घटना है। लोक-कथाओं में यह सदियों से दर्ज था कि स्वाति की यही बूंद जब सागर में खुली सीप के मुंह में गिरती है तो 'मोती' बनती है, केले की जड़ में पड़े तो 'कपूर' बनती है, और चातक (पपीहा) पूरे वर्ष इसी बूंद को पीने के लिए प्यासा रहता है।

फिर भी स्वाति नक्षत्र की इतनी प्रतिष्ठा? ऐसा भी क्या है कि नुकसान के बाद भी इस नक्षत्र के लिए कोई दुर्भावना नहीं है लोक में? बात वही है, "जस- अपजस, हानि-लाभ, जीवन-मरण सब विधि हाथ" मानने वाले लोग प्रकृति से कभी नाराज नहीं हुए, प्राकृतिक मार के खिलाफ कभी प्रकृति से रार नहीं ठानी, न ही वे अवसाद में डूबे। उन्होंने इस उग्रता को भी एक सुंदर लोक-साहित्य में पिरो दिया।

सात सेवाती फूटे धान, चौदह पइया एक्के धान

यह विज्ञान की कसौटी पर कसकर उदास होने का नाम नहीं है, बल्कि यह उस ग्रामीण सहजता और सांस्कृतिक निरंतरता का हिस्सा है जो विनाश में भी सृजन का संगीत सुन लेती थी। आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने इस समृद्ध नक्षत्र-विज्ञान की जगह तकनीकी शब्दावली गढ़ लिया है, नतीजा यह है कि प्रकृति के साथ हमारा जो एक आत्मीय और सह-अस्तित्व का रिश्ता था, वह अब एक सपाट और व्यापारिक मुकाबले में तब्दील हो चुका है।

बीजों की संप्रभुता और 'अन्नपूर्णा' का संरक्षण

आधुनिक हरित क्रांति ने हमें कुछ हाइब्रिड बीजों पर निर्भर कर दिया, जिसने हमारी समूचे कृषि तंत्र को रैखिक बना दिया और जिनके लिए अब भारी मात्रा में हर साल नए बीजों और कीटनाशकों की ज़रूरत होती है।

इसके उलट, हमारे पारंपरिक ग्रामीण जीवन में बीजों को केवल 'रिसोर्स' नहीं, बल्कि 'अन्नपूर्णा देवी' माना जाता था। फसल काटने के बाद किसान अगले साल के लिए जरूरी बीज इकट्ठा कर उसे साल भर के लिए संरक्षित कर लेते थे।

बीजों को मिट्टी के बर्तनों या बड़ी कोठियों में पुआल की रस्सियों से हवा-बंद डिब्बे में रखा जाता था जिसमें बीज के अनुसार प्राकृतिक कीटनाशक मिलाया जाता था, जिसमे नीम के पत्तो से लेकर लाल सूखी मिर्च, लहसुन की कलियां या हल्दी के टुकडे लकड़ी के राख भी शामिल होते थे। कुछ बीजों को तो रसोईघर में रखा जाता था ताकि धुएं से कीड़े न लगे।

हर गाँव के पास अपनी मिट्टी और पानी के मिजाज के अनुकूल सैकड़ों स्वदेशी बीजों की किस्में थीं और उसके संरक्षण की सालाना विधि। जैसे बिहार और पूर्वी यूपी के जलजमाव वाले इलाकों के लिए 'सगरा' या 'करहनी' धान के बीज थे, जो बाढ़ के पानी में भी हफ्तों डूबे रहने के बाद सड़ते नहीं थे, बल्कि पानी बढ़ने के साथ-साथ उनकी लंबाई भी बढ़ जाती थी।

इस जैव-विविधता की रक्षा गांव की महिलाएं  अपने मिट्टी के बर्तनों (कोठिला) में राख और नीम की पत्तियां मिलाकर करती थीं। पारंपरिक व्यवस्था में महिलाएं 'सीड कीपर्स' (बीज संरक्षक) थीं। उन्हें मिट्टी, नमी और बीजों के मिजाज की गहरी समझ थी। कोठिला में राख मिलाना कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक तरीका था जो नमी को सोखकर कीड़ों के अंडों को पनपने से रोकता था।

आधुनिक कृषि ने इस सामुदायिक ज्ञान को प्रयोगशालाओं और कॉर्पोरेट कंपनियों के हाथों में सौंप दिया है। यह स्वदेशी विज्ञान आज के 'क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर' का सबसे बड़ा उत्तर है।

डीहवार और क्षेत्रपाल: खेतों का मूक इकोलॉजिकल सुरक्षा कवच

आधुनिक कॉर्पोरेट और औद्योगिक खेती मिट्टी को केवल एक 'फैक्ट्री फ्लोर' मानती है, एक बेजान माध्यम, जिसमें रासायनिक खाद और ज़हरीले कीटनाशकों को इंजेक्ट करके ज़बरदस्ती अधिकतम फसल खींची जा सके। इसका परिणाम हमारे सामने है: बंजर होती मिट्टी, प्रदूषित भूजल और जैव विविधता का पूर्ण विनाश।

इसके विपरीत, पारंपरिक भारतीय ग्रामीण समाज ने खेत को एक जीवित और पवित्र इकाई माना था। हर गाँव की सीमा पर या खेत के एक कोने में 'डीहवार बाबा', 'क्षेत्रपाल' या 'बबुआ देव' का स्थान होता था। आमतौर पर यह किसी पुराने पेड़ के नीचे एक मिट्टी की पिंडी या एक साधारण सा पत्थर होता था। नियम यह था कि जब भी नई फसल कटेगी, अनाज का पहला हिस्सा (नेवैद्य) इन खेत के देवताओं को चढ़ाया जाएगा। मेरे अपने गाँव भतनाहिया में उत्तरी भू वाले खेत की सुरक्षा ‘लूक माई’ करती है। 

यह कोई अंधविश्वास नहीं था, बल्कि उस ज़मीन और प्रकृति के प्रति 'कृतज्ञता' व्यक्त करने का एक बेहद परिष्कृत सामाजिक तंत्र था। ग्रामीण मानस में यह गहरी धारणा थी कि यदि आपने खेत की मिट्टी के साथ बेईमानी की, या उसमें किसी जीव की बेवजह हत्या की, तो 'क्षेत्रपाल' रुष्ट हो जाएंगे। यह डर वास्तव में एक इकोलॉजिकल सेंसरशिप थी। धर्म और लोक-मान्यता को पर्यावरण संरक्षण का जरिया इसलिए बनाया गया था ताकि समाज का सबसे सामान्य व्यक्ति भी बिना किसी वैज्ञानिक डिग्री के प्रकृति के नियमों का सम्मान करे।

इसके अलावा, इन डीहवार और क्षेत्रपाल के स्थानों के आसपास का एक निश्चित हिस्सा (जिसे पवित्र उपवन या 'देवराही' भी कहा जाता था) पूरी तरह से अछूता रखा जाता था। वहाँ से कोई सूखी लकड़ी भी नहीं बीन सकता था। ये छोटे-छोटे स्थान गांवों के भीतर 'माइक्रो-प्रोटेक्टेड इको-ज़ोन' का काम करते थे। यहाँ स्थानीय पक्षी (जैसे उल्लू, चील और बगुले) घोंसले बनाते थे।

ये पक्षी खेतों में लगने वाले हानिकारक कीटों और चूहों को प्राकृतिक रूप से खा जाते थे, जिससे फसलों की सुरक्षा के लिए किसी केमिकल की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। आज हमने डीहवार के उन थानों को ट्रैक्टर से जोतकर खेत में मिला दिया और पक्षियों के ठिकाने उजाड़ दिए।

जल स्रोतों की शुचिता: 'वरुण देव' और तालाबों का अध्यात्म

आज शहर और गांव दोनों में जो जल संकट है, वह वास्तव में संसाधन की कमी से ज्यादा पानी के प्रति भारतीय दृष्टि में आई कमी है। गांव की संस्कृति में जल एक जीवित विधाता 'वरुण देव' थे। जब हमने पानी को एक जीवित देवता (वरुण देव) से बदलकर केवल एक कमोडिटी या 'वाटर सप्लाई' की पाइपलाइन मान लिया, तो उसके प्रति हमारा सम्मान और जिम्मेदारी दोनों खत्म हो गए।

गांव में तालाब या पोखरा खोदना केवल एक श्रमदान नहीं था, वह एक महायज्ञ था जिसे 'पुष्करिणी यज्ञ' या तालाब का विवाह कहा जाता था। यहां तक किस जगह पर कौन सा पेड़ लगेगा, इसका भी एक घोषित विधान था, तभी तो ये लोकगीत का भी हिस्सा बना। 

नीम लगाइहऽ आँगन के बिचवा, बरगद लगाइहऽ तनी दूर दुअरिया 

पिपरा लगाइहऽ पोखरा के भिड़िया, बसवा लगाइहऽ बसवार हो...

जब तक तालाब के किनारे पीपल या बरगद का पेड़ नहीं लगाया जाता था और उसकी प्रतिष्ठा नहीं होती थी, तब तक उसका पानी उपयोग में नहीं लिया जाता था। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती थी कि कोई भी व्यक्ति तालाब के पानी को गंदा न करे। पीपल, जामुन और बरगद की जड़ें पानी को प्राकृतिक रूप से फ़िल्टर करती थीं और गर्मियों में भी वाष्पीकरण को रोककर जल स्तर बनाए रखती थीं।

उग्र प्रकृति से समझौता: "नदी मां है, पानी की पाइपलाइन नहीं"

पाश्चात्य पर्यावरण इंजीनियरिंग का मूल दर्शन ही प्रकृति पर 'विजय प्राप्त करना' रहा है। वे नदियों को बांधते हैं, उनके प्राकृतिक बहाव को कंक्रीट के तटबंधों से रोकते हैं। लेकिन जब प्रकृति अपना हिसाब बराबर करती है और ये कृत्रिम ढांचे टूटते हैं, तो उसे 'प्राकृतिक आपदा' का नाम दे दिया जाता है।

भारतीय लोक-मानस ने कभी प्रकृति को नियंत्रित करने का दुस्साहस नहीं किया, बल्कि खुद को उसके सांचे में ढाला। बिहार की कोसी नदी, जिसे आयातित  शब्दावली 'बिहार का शोक' कहने लगी, या असम का विशाल ब्रह्मपुत्र; जब ये नदियां उग्र होती हैं और हजारों गांवों को अपनी लहरों में समेट लेती हैं, तब भी वहाँ के ग्रामीण का नजरिया दुनिया से अलग होता है।

बाढ़ के पानी के बीच ऊंचे लकड़ी के मचानों पर भूखा-प्यासा बैठा ग्रामीण भी नदी को कभी गाली नहीं देता। वह बाढ़ के पानी में एक छोटा सा मिट्टी का दीया जलाकर छोड़ता है और शांत मन से कहता है—"मइया अइली हैं, तनी कड़ा रूप देखइली हैं, फेरु शांत हो जइहें" (माँ आई हैं, थोड़ा उग्र रूप दिखाया है, फिर शांत हो जाएंगी)।

असम के माजुली द्वीप में 'मिसिंग' जनजाति के लोग ब्रह्मपुत्र (बोर लुइत) की इस उग्रता के साथ जीने की कला सदियों से जानते हैं। वे नदी से लड़ने के बजाय बांस के खंभों पर चंग घर बनाते हैं, ताकि बाढ़ का पानी उनके घरों के नीचे से शांति से निकल जाए। जैसे ही बाढ़ का पानी उतरता है, वे नदी को कोसने के बजाय 'अली-आय-लिगांग' त्योहार मनाते हैं।

वे नदी द्वारा छोड़ी गई अत्यंत उपजाऊ गीली मिट्टी (गाद) में नंगे पैर नाचते हैं और धान की बुआई का उत्सव मनाते हैं। वे जानते हैं कि नदी यदि एक हाथ से उनका घर छीनती है, तो दूसरे हाथ से उनकी मिट्टी को इतना उपजाऊ बना देती है कि बिना किसी खाद के अगली फसल सोना उगलती है। माँ यदि थप्पड़ भी मारे, तो संतान घर छोड़कर नहीं भागती, वह रोकर उसकी गोदी में ही दुबक जाती है।

'स्क्रीन-केंद्रित' सनातन और बाजार का छलावा

इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमारा प्रकृति के साथ जो आध्यात्मिक संबंध था, उसे उपभोक्तावाद और पॉप-कल्चर ने पूरी तरह खत्म कर दिया है। हम 'प्रकृति-केंद्रित' आस्था से फिसलकर 'स्क्रीन-केंद्रित' और धर्म के कॉर्पोरेटाइजेशन शिकार हो चुके हैं।

आज टीवी सीरियलों, फिल्मों और कॉरपोरेट विज्ञापनों ने करवा चौथ जैसे कुछ विशिष्ट क्षेत्रीय त्योहारों का ऐसा ग्लैमरस राष्ट्रीयकरण किया है कि वे अरबों रुपये के टर्नओवर वाले व्यापारिक इवेंट बन चुके हैं। कपड़ा, आभूषण और कॉस्मेटिक उद्योग इस एक दिन के उपवास पर टिके हैं। वहीं दूसरी ओर इस त्यौहार का जो मूल है जिसमे प्रकृति है, परस्पर सौहार्द है सब भूल चुके है।

छठ पूजा जिसके मूल में उर्जा के देवता सूर्य है, हमारी नदियां, पोखर तालाब है, अब सफाई सुचिता में अपना योगदान देने के बजाय एक तबका घर की छत्तों पर बने पानी के कृत्रिम पोखर की ओर मुड़ने लगा हैं। हमारे त्यौहार से प्रकृति और ऋतू चक्र से जुड़े उमग वाला हिस्सा धीरे-धीरे हाशिए पर ढकेले जा रहे हैं।

यही विडंबना हमारी धार्मिक यात्राओं में भी दिखती है। एक फिल्मी गीत "चलो बुलावा आया है..." ने वैष्णो देवी यात्रा का स्वरूप बदल दिया। अमरनाथ और केदारनाथ जैसी दुर्गम यात्राएं, जहाँ कभी गिने-चुने साधक जाते थे, अब 'मास-टूरिज्म' का हिस्सा बन चुकी हैं। हर साल लाखों लोग वहां पहुंच रहे हैं, और किसी भी कीमत पर दर्शन कर लेना चाहते है चाहे इसके लिए बर्फीले पहाड़ पर हेलीकाप्टर की क्यों ना दौड़ाना पड़े!  जिससे उन संवेदनशील पहाड़ी इकोसिस्टम पर कचरे और कंक्रीट का ऐसा बोझ बढ़ रहा है जो केदारनाथ जैसी त्रासदियों को जन्म देता है।

अजीब विरोधाभास है। हम पहाड़ों पर जाकर नदियों को प्रदूषित करने के लिए तैयार हैं, लेकिन अपने गांव के उस छोटे से 'काली थान' या डीहवार बाबा, पसाह नदी को भूल चुके हैं, जिसके पुजारी को कभी 11 या 21 रुपए का दान दिया जाता था।

हम मैरिज हॉलों की चकाचौंध में शादियां कर रहे हैं, जहां घर ही नहीं होता; तो भला 'गृहदेवता' और दीवारों पर बनने वाले पारंपरिक 'कोहबर' या 'थापा' (जो हमारे कुल और प्रकृति के मिलन के प्रतीक थे) की पूजा कैसे हो? हम बाज़ार के हाथों मैनिपुलेट हो रहे हैं, रिश्तों में तलाक बढ़ रहे हैं, और हम इसका दोष अपनी परंपराओं को दे रहे हैं।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान केवल कार्बन क्रेडिट की खरीद-फरोख्त या कागजी संधियों में नहीं है। जब तक मनुष्य खुद को प्रकृति का 'मालिक' समझने का अहंकार नहीं छोड़ेगा, तब तक कोई तकनीक इस धरती को नहीं बचा सकती। हमें वापस अपने उन 'सांस्कृतिक संरक्षकों' की शरण में जाना होगा जो आज भी प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीना जानते हैं। हमारे ग्रामदेवता, कुलदेवता, स्थानीय नदियां और नक्षत्र कोई अंधविश्वास नहीं थे, बल्कि वे इंसानी लालच को नियंत्रित करने वाले सामाजिक और प्राकृतिक नियम थे। यदि हमें मानव जाति के अस्तित्व को बचाना है, तो हमें स्क्रीन के छलावे से बाहर निकलकर अपनी लोक-स्मृति की जड़ों को दोबारा सींचना होगा।