भारत में बाघों की जनसंख्या केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, पीआईबी
वन्य जीव एवं जैव विविधता

स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट रिपोर्ट: बाघों के व्यवहार में आ रहा है बदलाव

सीएसई–डाउन टू अर्थ की वार्षिक स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट रिपोर्ट में इंसानों व बाघों के बीच बढ़ रहे संघर्ष पर महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है

DTE Staff

क्या बाघ अपने भोजन के लिए इंसानों का शिकार जान बूझकर कर रहे हैं? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और डाउन टू अर्थ पत्रिका द्वारा आज यहां जारी 2026 स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट (एसओई 2026) रिपोर्ट में पहले से उपलब्ध रिपोर्ट और अध्ययनों का विश्लेषण किया गया है और इस बात की पुष्टि हुई है कि बाघ सच में ऐसा कर रहे हैं।

यह रिपोर्ट आज बुधवार को अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 में जारी की गई। इस सम्मेलन में देशभर के पत्रकार भाग ले रहे हैं।

डाउन टू अर्थ के वरिष्ठ संवाददाता हिमांशु नितनवरे (जिन्होंने एसओई 2026 के विश्लेषण में योगदान दिया है) कहते हैं, “बड़ी बिल्ली अपने रंग-रूप बदल रही है। उनके प्राकृतिक आवासों की पारिस्थितिकी में बदलाव और गिरावट, इंसानी दखल और गलत संरक्षण नीति की वजह से भारत के बाघों के व्यवहार में बदलाव आ रहा है जिनमें से कुछ मामूली हैं और कुछ महत्वपूर्ण।"

इंसान पर बाघों के बढ़ते हमले

एसओई 2026 कहती है कि पूरे भारत में जनवरी-जून 2025 की अवधि के दौरान टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाकों में कम से कम 43 लोग मारे गए हैं। 2024 में इन्हीं महीनों में, 44 लोगों ने बाघों के हमलों में अपनी जान गंवाई थी। 2025 के 43 हमलों में से चार में, बाघों ने अपने शिकार के कम से कम कुछ हिस्सों को खाया था।

बाघ मजबूरी में ही नरभक्षी बनते हैं। बाघ मनुष्यों पर दो स्थितियों में और अधिक हमले करते हैं। जब ये जंगली बिल्लियां बूढ़ी हो जाती हैं या चोटिल होती हैं और भोजन के लिए शिकार करने में असमर्थ होती हैं या जब उनके प्राकृतिक शिकार का आधार गायब हो जाता है। विशेषज्ञों और वन्यजीव निरीक्षकों के अनुसार, बाघों द्वारा तेजी से मनुष्यों को निशाना बनाने का एक कारण बाघों के प्राकृतिक आवासों से मनुष्यों की निकटता है। रिपोर्ट बेंगलुरु स्थित संरक्षण जीवविज्ञानी के. उल्लास कारंत के हवाले से कहती है कि इसका एक अन्य कारण “बड़ी बिल्लियों में इंसानों का डर खत्म हो जाना” हो सकता है।

बाघों की संख्या बढ़ रही है और साथ-साथ जंगलों के पास रहने वाली मानव आबादी भी बढ़ रही है। रिपोर्ट में एक हालिया अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि देश में बाघों की आबादी वाले 20 राज्य हैं, इन राज्यों में बाघ जिन इलाकों में रहते हैं, उनमें से लगभग 40 प्रतिशत हिस्से में 6 करोड़ लोग रहते हैं। आरक्षित क्षेत्रों के भीतर बाघों की संख्या अपनी अधिकतम सीमा तक पहुंच चुकी है। परिणामस्वरूप, बड़ी बिल्लियां यानी बाघ संरक्षित क्षेत्रों से बाहर शिकार पर निकल रहे हैं। एसओई 2026 में एक अन्य विशेषज्ञ को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि बाघों के आवासों के पास अत्यधिक भीड़, आवास की हानि और मानवीय गतिविधियां बाघों के व्यवहार में बदलाव के पीछे के कारण हैं।

लैंटाना का आकर्षण

एसओई 2026 में बाघों की कहानी में एक और नया दिलचस्प मोड़ भी पेश किया गया है। बाघ अब खुले जंगलों और घास के मैदानों, जहां वे शिकार किया करते थे, को छोड़कर लैंटाना की घनी झाड़ियों वाले इलाकों में चले गए हैं।

यह एक सजावटी हेज प्लांट है जो 19वीं सदी में भारत में आया था। आज, यह पौधा भारत में पाई जाने वाली ‘इनवेसिव’ (आक्रामक) प्रजातियों में सबसे खतरनाक बन गया है और इसने जंगलों, झाड़ियों और गांवों की शामलात यानी सामुदायिक भूमि (कॉमन्स) के आधे हिस्से पर कब्जा कर लिया है।

जहां भी लैंटाना उगता है, वह वहां की उन प्राकृतिक घास और पौधों को दबा देता है, जो जंगली शाकाहारी जानवरों का खाना होते हैं। इस वजह से चीतल, सांभर जैसे जानवर इन इलाकों में नहीं आते। चूंकि ये इलाके अक्सर खेती-बाड़ी वाले इलाकों का हिस्सा होते हैं, इसलिए ये पालतू जानवरों के चरने की पसंदीदा जगह बन जाते हैं।

डेनमार्क के औहुस विश्वविद्यालय में जीवविज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर और अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 के वक्ताओं में से एक निनाद मुंगी कहते हैं, “लैंटाना की घनी झाड़ियों वाले क्षेत्रों में दृश्यता कम होने और शिकार के लिए भागने के मार्ग सीमित होने के कारण बाघों को उचित ‘कवर’ मिलता है, साथ ही यहां मवेशी भी बहुतायत में होते हैं। लैंटाना ने ऐसे क्षेत्रों में, जहां शिकार कम है, शिकारियों के लिए अनुकूल आवास तैयार कर दिया है।”

रिपोर्ट बताती है कि मवेशियों का बाघों द्वारा शिकार हमेशा से किया जाता रहा है और अपने बड़े आकार (उदाहरण के लिए चीतल की तुलना में) के कारण मवेशी उच्च कैलोरी भोजन का स्रोत हैं। बांधवगढ़ और ताडोबा जैसी जगहों पर बाघ रिजर्व के बाहर लैंटाना की झाड़ियों को आवास एवं शिकार के मैदान के रूप मे उपयोग कर रहे हैं।

जब कोई बाघ मवेशी को मारता है तो मवेशी के मालिक को अक्सर पर्याप्त मुआवजा मिलता है। यह एक विरोधाभास पैदा करता है। इसलिए कुछ क्षेत्रों में बाघों के कारण होने वाले पशुधन के नुकसान को बहुत बुरा नहीं माना जाता है। इस तरह बाघ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अनकहा हिस्सा बन गया है, जो मरे हुए मवेशियों के बदले पैसे देता है। लेकिन मुंगी कहते हैं, “इससे बाघों का व्यवहार बदल सकता है। वे इंसानों के करीब आ सकते हैं और भोजन के लिए इंसानों पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं।”

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षण की रणनीतियां स्थानीय समुदायों की भागीदारी से बनाई जानी चाहिए। साथ ही, जिन इलाकों में बाघ अधिक हैं, वहां मानवीय हस्तक्षेप कम किया जाना चाहिए।ऐसा करने से मानव-बाघ संघर्ष की मौजूदा और संभावित स्थितियों को कम किया जा सकता है।