मनुष्य की नजर में ततैया की पहचान उसके डंक से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाती है। लेकिन प्रकृति के लिए उसकी कहानी कहीं बड़ी है। वह दूसरे कीटों की आबादी को नियंत्रित करती है, कई पौधों के परागण में हिस्सा लेती है और खाद्य-श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी है।
हाल में हिमालय से आई एक वैज्ञानिक खोज ने ततैया की इसी अनदेखी भूमिका को सामने रखा है। पश्चिम बंगाल के सिंगालीला राष्ट्रीय उद्यान में बुरांस और हिमालयी एल्डर की पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले एक पतंगे के प्राकृतिक शत्रुओं की तलाश के दौरान वैज्ञानिकों को उसकी अंड अवस्था पर हमला करने वाली ततैया की एक नई प्रजाति मिली। इसे टेलेनोमस अल्टिकोलस नाम दिया गया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह ततैया इस पतंगे के अंडों को परजीवी बनाती है और इस तरह उसके जीवन-चक्र को नियंत्रित करने वाली प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा है।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है कि बुरांस और हिमालयी एल्डर को नुकसान पहुंचाने वाला पतंगा एक समस्या है, लेकिन उसी जंगल में उसकी संख्या को नियंत्रित करने वाली एक बेहद छोटी ततैया भी मौजूद है। यानी प्रकृति किसी कीट को केवल ‘हानिकारक’ या ‘लाभकारी’ के खांचे में नहीं रखती। एक जीव दूसरे के लिए भोजन है और वही संबंध किसी तीसरे जीव के लिए नियंत्रण की व्यवस्था बन सकता है।
भारत में ततैयों की विविधता कम नहीं है। 2020 में प्रकाशित वेस्पिडे परिवार की देशव्यापी सूची में 288 प्रजातियां, 60 वंश और पांच उपकुल दर्ज किए गए थे। ये प्रजातियां उस समय देश के 29 राज्यों और सात केंद्रशासित प्रदेशों से दर्ज थीं।
इसके मायने है कि ‘ततैया’ किसी एक तरह के कीट का नाम नहीं है। इनके जीवन-व्यवहार और आवास में काफी विविधता है। भारत में कुछ ततैयें सामाजिक हैं और कॉलोनियां बनाकर रहती हैं, जबकि कई अकेले जीवन बिताती हैं। कुछ शिकारी हैं, तो कुछ दूसरे कीटों के अंडों, लार्वा या प्यूपा पर निर्भर रहती हैं। फिर भी भारत में ततैयों के बारे में हमारी जानकारी अधूरी है।
अप्रैल 2026 में प्रकाशित पूर्वी हिमालय के तवांग जिले के अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 19 प्रजातियां, 10 वंश और तीन उपकुल दर्ज किए। इनमें एंटेपिपोना भूटानेंसिस को भारत में पहली बार दर्ज किया गया। इसी अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश में वेस्पिडे की 73 प्रजातियों और 27 वंशों की जानकारी भी सामने आई। एक तरफ नई प्रजातियां सामने आ रही हैं, दूसरी तरफ यह सवाल भी बना हुआ है कि इन प्रजातियों का प्राकृतिक आवास और मौसमी व्यवहार किस तरह बदल रहा है।
खेत में काम करती प्रकृति की एक व्यवस्था
ततैयों की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक प्राकृतिक कीट नियंत्रण है। अनेक शिकारी ततैयें दूसरे कीटों को पकड़कर अपने लार्वा को खिलाती हैं। कुछ प्रजातियां इल्लियों और दूसरे कृषि-कीटों का शिकार करती हैं। परजीवी ततैयें दूसरे कीटों के अंडों, लार्वा या प्यूपा में अपने अंडे देती हैं और उनकी संतानों का विकास उसी मेजबान पर निर्भर रहता है।
इस तरह खेत में मौजूद ततैया किसान को दिखाई न देने वाली एक सेवा दे सकती है। जिस कीट को किसान फसल के लिए नुकसानदेह मानता है, उसकी संख्या कम करने में कोई ततैया पहले से लगी हो सकती है। आधुनिक कृषि में जैविक कीट नियंत्रण की चर्चा इसी प्राकृतिक प्रक्रिया को समझने और उपयोग करने से जुड़ी है।
वर्ष 2021 में प्रकाशित अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ततैयों से मिलने वाली पारिस्थितिकी सेवाओं का अध्ययन करते हुए उन्हें प्राकृतिक कीट नियंत्रण, परागण, जैव-संकेतक, अपघटन और बीज प्रसार जैसी भूमिकाओं से जोड़ा। अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया कि मधुमक्खियों और तितलियों की तुलना में ततैयों की इन सेवाओं पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है।
इसका मतलब यह नहीं कि खेत में दिखाई देने वाली हर ततैया को बचाना या हर घोंसले को वहीं रहने देना जरूरी है। जहां मनुष्यों के लिए डंक का जोखिम हो, वहां सावधानी स्वाभाविक है। लेकिन खुले प्राकृतिक क्षेत्र या खेत में हर ततैया को नुकसानदेह मान लेना भी ठीक नहीं। कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल उन कीटों को भी प्रभावित कर सकता है जो स्वयं फसल को नुकसान नहीं पहुंचा रहे, बल्कि नुकसान पहुंचाने वाले दूसरे कीटों को नियंत्रित कर रहे हैं।
मधुमक्खी का नाम आते ही शहद और परागण याद आते हैं। ततैया का नाम आते ही डंक। यह फर्क केवल हमारे अनुभव का नहीं, हमारी सामाजिक धारणा का भी है।
वास्तव में अनेक ततैया फूलों पर जाती हैं और परागण में भूमिका निभाती हैं। 2021 की समीक्षा में भी परागण को ततैयों की महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी सेवाओं में शामिल किया गया है। हालांकि इस क्षेत्र में उपलब्ध शोध मधुमक्खियों की तुलना में अभी काफी कम है। इसलिए ततैया को उपयोगी साबित करने के लिए उसे मधुमक्खी जैसा देखने की जरूरत नहीं है। उसका महत्व उसकी अपनी भूमिका में है। प्रकृति में किसी जीव का अस्तित्व इस बात से तय नहीं होता कि वह मनुष्य को प्रत्यक्ष रूप से क्या देता है।
ततैयों की कहानी को बदलते मौसम से अलग करके देखना भी संभव नहीं है। तापमान, बारिश, नमी, भोजन की उपलब्धता और वनस्पति का मौसमी चक्र इनके जीवन पर असर डालता है। सामाजिक ततैयों में रानी का सर्दी के बाद बाहर निकलना, घोंसला बनाना, शुरुआती लार्वा को पालना और फिर कामगारों की संख्या बढ़ना—इन सभी चरणों का संबंध मौसम से है।
ब्रिटेन में 2026 की गर्मियों में ततैयों की कम मौजूदगी के संबंध को लेकर वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर सेरियन समन ने जुलाई में लिखा कि उन्हें और उनके छात्रों को शोध के लिए सामान्य से बहुत कम ततैये मिल रहे थे। कीट नियंत्रण से जुड़े लोगों ने भी इस साल ततैयों के घोंसलों को हटाने के अनुरोध कम मिलने की बात कही।
दिलचस्प यह है कि एक साल पहले वहां तस्वीर उलट थी। गर्म और शुष्क वसंत तथा गर्मियों में ततैयों की बहुत अधिक मौजूदगी की खबरें थीं। 2026 में गर्म और शुष्क शुरुआत के बाद असामान्य गर्मी, ठंडे-नम दौर और फिर गर्म हवाओं का क्रम देखने को मिला। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसी चरम परिस्थितियां नई रानियों के घोंसले स्थापित करने और कॉलोनियों के विकास को प्रभावित कर सकती हैं। अत्यधिक तापमान की स्थिति में कीटों की भोजन जुटाने की क्षमता और लार्वा का विकास भी प्रभावित हो सकता है।
ततैया को लेकर हमारी सबसे बड़ी भूल शायद यही है कि हम उसे उसके डंक से पहचानते हैं, उसकी भूमिका से नहीं।