चंबल के बीहड़—एक समय जिनका नाम सुनते ही भय, डकैत और वीरान जमीन की तस्वीर उभरती थी—आज एक नई कहानी लिख रहे हैं। यह कहानी है हरियाली की, आजीविका की और एक ऐसे औषधीय पौधे की जिसने बंजर धरती को उम्मीद में बदल दिया है। इस परिवर्तन के केंद्र में है गुग्गुल—आयुर्वेद की एक बहुमूल्य औषधि, जो कभी चंबल अंचल की पहचान हुआ करती थी, लेकिन लालच और अवैज्ञानिक दोहन के कारण लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई।
मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के बीहड़ों में जन्मे जाकिर हुसैन ने इस विलुप्त होती वनस्पति में संभावनाओं का बीज देखा। उन्होंने समझा कि यदि गुग्गुल को वैज्ञानिक ढंग से संरक्षित किया जाए, तो यह न केवल संकटग्रस्त प्रजाति को बचा सकता है, बल्कि हजारों हेक्टेयर बंजर भूमि की काया पलट सकता है।
चंबल नदी के तीव्र कटाव से बने बीहड़ मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तरप्रदेश की सीमाओं में फैले हैं। अकेले मुरैना जिले में लगभग 35,000 हेक्टेयर भूमि बीहड़ में तब्दील हो चुकी है। गहरी खाइयों, ऊबड़-खाबड़ ढलानों और जल-क्षरण से जूझती यह जमीन पारंपरिक खेती के लिए अनुपयुक्त मानी जाती रही है।
वर्षों तक यह इलाका डकैतों की शरणस्थली रहा। विकास योजनाएं कम ही पहुंचीं। स्थानीय किसानों के पास सीमित संसाधन थे और आजीविका के अवसर भी कम। ऐसे में गुग्गुल की वापसी केवल पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि लोगों के लिए भी फायदेमंद है।
गुग्गुल एक कंटीली झाड़ीदार वनस्पति है, जो शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पनपती है। वर्षा ऋतु में इसमें पत्तियां आती हैं, जबकि गर्मी और सर्दी में इसके पत्ते झड़ जाते हैं। इसी दौरान गोंद निकलती है।
जाकिर बताते हैं कि गुग्गल को औषधियों का राजा कहा गया है। महायोगराज गुग्गुलु, कैशोर गुग्गुलु, त्रिफला गुग्गुल और चंद्रप्रभा वटी जैसी प्रसिद्ध औषधियां इसी से तैयार होती हैं। आधुनिक शोध भी इसके कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण, सूजन-रोधी और जोड़ों के दर्द में उपयोग करते हैं। इसलिए इसकी वार्षिक मांग लगभग 3000 टन है, जबकि घरेलू उत्पादन 10 टन के आसपास ही है। परिणामस्वरूप भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है। कभी चंबल क्षेत्र इस उत्पादन का महत्वपूर्ण केंद्र था, लेकिन अवैज्ञानिक दोहन ने इसकी जड़ों को कमजोर कर दिया।
चार-पांच दशक पहले बीहड़ों में गुग्गुल प्रचुर मात्रा में पाया जाता था। स्थानीय समुदाय रासायनिक तकनीकों से पेड़ों में गहरा चीरा लगाकर अधिक मात्रा में गोंद निकालने लगे। एक बार में डेढ़ किलो तक गोंद मिल जाता था, लेकिन इससे पौधा मर जाता था। तत्काल लाभ की यह प्रवृत्ति दीर्घकालिक नुकसान में बदल गई। कुछ ही वर्षों में हजारों पौधे नष्ट हो गए। गुग्गुल धीरे-धीरे लुप्तप्राय श्रेणी में पहुंच गया।
2004 में जाकिर हुसैन ने सुजागृति समाज सेवी संस्था की स्थापना की। इसके दो लक्ष्य थे पहला, बीहड़ में कटाव रोकना और दूसरा गुग्गुल का संरक्षण और वैज्ञानिक विदोहन। सबसे पहले डोरबंदी (फेंसिंग) कर मिट्टी के कटाव को रोका गया। इसके बाद 10,000 से अधिक गुग्गुल पौधों का रोपण किया गया। किसानों को नर्सरी निर्माण, पौध तैयार करने, वैज्ञानिक चीरा तकनीक और गोंद संग्रहण का प्रशिक्षण दिया गया। 2008 से मुरैना में औपचारिक रूप से गुग्गुल संरक्षण परियोजना लागू की गई। धीरे-धीरे आसपास के गांवों में भी यह मॉडल अपनाया जाने लगा।
जाकिर बताते हैं कि गुग्गुल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। पशु इसे नहीं खाते, और यह शुष्क भूमि में भी जीवित रह सकता है। इसकी औसत आयु लगभग 70 वर्ष होती है। सबलगढ़ तहसील के बामसौली गांव में एक किसान ने 1 हेक्टेयर असिंचित भूमि पर 1000 गुग्गुल पौधे लगाए।
साथ में अश्वगंधा और अन्य औषधीय फसलें भी उगाईं। बिना अतिरिक्त पानी के यह मॉडल सफल हुआ और आय में चार गुना वृद्धि दर्ज की गई। संस्था ने औषधि कंपनियों से करार कर कलेक्शन सेंटर स्थापित किए।
2019 में जाबरोल गांव में पहला केंद्र शुरू हुआ। इससे किसानों को सीधे बाजार से जुड़ने का अवसर मिला। इससे इस इलाके में गरीब किसानों को आय का स्रोत मिला है, मिट्टी का कटाव कम हुआ, जैव विधिता का संरक्षण हुआ है, वहीं बीहड़ों की छवि भी बदल रही है।
सुजागृति इस मिशन में लगी है। सुजागृति अब तक 400 हेक्टेयर जमीन में दो लाख गुग्गल पौधों को तैयार कर चुकी है। संस्था को इस काम के लिए कई पुरस्कार भी मिले हैं।