अंतरराष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस: हर साल 23 अक्टूबर को मनाया जाता है, ताकि संरक्षण और वैश्विक सहयोग के प्रति जागरूकता बढ़े।
वैश्विक वितरण: हिम तेंदुआ मध्य और दक्षिण एशिया के 12 देशों में पाया जाता है, जिनमें भारत, चीन और नेपाल प्रमुख हैं।
भारत में आबादी: 2019 से 2023 के आकलन के अनुसार, भारत में 718 हिम तेंदुए पाए गए, जिनमें 477 लद्दाख में थे।
प्रमुख खतरे: अवैध शिकार, आवास विखंडन, जलवायु परिवर्तन और जंगली शिकार की कमी हिम तेंदुए के अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं।
संरक्षण प्रयास: भारत ने 2009 में प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड शुरू किया, जबकि सीआईटीईएस परिशिष्ट-I अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक व्यापार पर कड़े प्रतिबंध लगाता है।
ऊंचे-ऊंचे बर्फीले पहाड़, चारों ओर फैली सफेद चादर और कड़ाके की ठंड। इसी कठिन वातावरण में एक ऐसा जीव रहता है, जिसकी खूबसूरती और फुर्ती देखकर प्रकृति पर गर्व होता है। यह है हिम तेंदुआ, जिसे बर्फीले पहाड़ों का राजा भी कहा जाता है। हर साल 23 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य इस दुर्लभ वन्यजीव के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना और दुनिया के देशों को इसके प्राकृतिक आवास बचाने के लिए साथ लाना है।
क्यों खास है 23 अक्टूबर?
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 12 दिसंबर 2024 को प्रस्ताव ए/आरईएस /79/143 अपनाकर 23 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय हिम तेंदुआ दिवस घोषित किया। वर्ष 2026 में यह दिवस आज, शुक्रवार को मनाया जा रहा है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि पहाड़ों की सुंदरता केवल बर्फ और चोटियों से नहीं, बल्कि वहां रहने वाले वन्यजीवों से भी है। हिम तेंदुए का बचना केवल एक प्रजाति को बचाना नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय पर्यावरण की रक्षा करना है।
बर्फ में जीवन का अनोखा हुनर
हिम तेंदुए का वैज्ञानिक नाम पैन्थेरा अनसिया है। यह मध्य और दक्षिण एशिया के ऊंचे पर्वतीय इलाकों में पाया जाता है। भारत में इसका प्रमुख आवास हिमालय और ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र हैं। दुनिया के 12 देशों - अफगानिस्तान, भूटान, चीन, भारत, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, मंगोलिया, नेपाल, पाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है।
हिम तेंदुए का शरीर प्रकृति की अद्भुत कारीगरी का उदाहरण है। इसका घना फर कड़ाके की ठंड से बचाता है। चौड़े पंजे बर्फ पर चलने में मदद करते हैं, जबकि लंबी और मोटी पूंछ खड़ी ढलानों पर संतुलन बनाए रखने के साथ शरीर की गर्मी बचाने में भी सहायक होती है। इसका धूसर-सफेद रंग इसे चट्टानों और बर्फ के बीच छिपने में मदद करता है। यही कारण है कि इसे देख पाना आसान नहीं होता।
पहाड़ों का संतुलन बनाए रखने वाला शिकारी
हिम तेंदुआ केवल सुंदर वन्यजीव नहीं, बल्कि पर्वतीय पारिस्थितिकी का अहम हिस्सा है। यह नीली भेड़ (भारल) और आइबेक्स जैसे जंगली शाकाहारी जीवों का शिकार करता है। इससे शिकार प्रजातियों की आबादी का प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। यदि ऐसे शिकारी कम होने लगें, तो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है।
अस्तित्व पर मंडराते खतरे
आज हिम तेंदुए के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं। सड़कों, खनन और अन्य निर्माण गतिविधियों के कारण उसका प्राकृतिक आवास टूट रहा है। अवैध शिकार और वन्यजीवों के अंगों का गैरकानूनी व्यापार भी उसके लिए खतरा है।
इसके अलावा, जब जंगली शिकार की संख्या घटती है, तो हिम तेंदुए कभी-कभी भोजन की तलाश में पालतू पशुओं पर हमला कर देते हैं। इससे स्थानीय पशुपालकों को आर्थिक नुकसान होता है और बदले में तेंदुओं को मारने की घटनाएं हो सकती हैं। जलवायु परिवर्तन भी चिंता बढ़ा रहा है। तापमान, बर्फबारी और वनस्पति में बदलाव से उसके आवास और शिकार की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
भारत में संरक्षण की पहल
भारत ने हिम तेंदुए के संरक्षण के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वर्ष 2009 में शुरू की गई ‘प्रोजेक्ट स्नो लेपर्ड’ योजना का उद्देश्य ऊंचे हिमालयी इलाकों में हिम तेंदुए सहित अन्य वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना है।
भारत के हिम तेंदुआ आकलन (एसपीएआई) के तहत 2019 से 2023 के बीच किए गए अध्ययन में देश में लगभग 718 हिम तेंदुओं का अनुमान लगाया गया। इनमें से 477 लद्दाख में पाए गए। यह आकलन भविष्य में इनकी आबादी पर नजर रखने और संरक्षण योजनाएं बनाने के लिए महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। वन्यजीव सप्ताह 2025 के दौरान हिम तेंदुआ आबादी आकलन भारत 2.0 की शुरुआत भी की गई, जिसका उद्देश्य वैज्ञानिक निगरानी को और मजबूत करना है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रयास जारी हैं। हिम तेंदुआ साल 1975 से वन्यजीवों और वनस्पतियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (सीआईटीईएस) के परिशिष्ट-I में शामिल है। इससे इसके नमूनों के अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक व्यापार पर कड़े प्रतिबंध लागू होते हैं।
संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका जरूरी
हिम तेंदुए को बचाने की लड़ाई केवल वन विभाग या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। पशुओं के लिए सुरक्षित बाड़े, नुकसान पर उचित मुआवजा, जागरूकता अभियान और समुदाय आधारित निगरानी से मानव-वन्यजीव संघर्ष कम किया जा सकता है।
हिम तेंदुए की रक्षा, हिमालय की रक्षा है। यदि आज हम इसके आवास और भोजन की सुरक्षा सुनिश्चित करें तथा स्थानीय लोगों को संरक्षण का भागीदार बनाएं, तो आने वाली पीढ़ियां भी बर्फीले पहाड़ों में इस शानदार जीव की मौजूदगी देख सकेंगी।